गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम में संशोधन हो

punjabkesari.in Thursday, Sep 15, 2022 - 05:31 AM (IST)

सुप्रीम कोर्ट को यह निर्देश देने में कम से कम 711 दिन लगे कि पत्रकार सिद्दिकी कप्पन जिसे हाथरस जाने के दौरान दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, जहां एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या की गई थी, उसे जमानत पर रिहा किया जाए।

कप्पन को कठोर गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यू.ए.पी.ए.) के साथ-साथ ब्रिटिश काल के राजद्रोह कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। हालांकि उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप एक राहत के रूप में आया है लेकिन तथ्य यह है कि इस तरह की राहत मिलने में लगभग 2 वर्ष लग गए। ऐसा होना हमारे सिस्टम पर एक दुखद प्रतिबिंब है। दूसरी ओर जब प्रसिद्ध या प्रभावशाली व्यक्तियों की बात होती है तो शीर्ष अदालत तत्परता से काम करती है। एक मामला प्रचारक पत्रकार अर्नब गोस्वामी का है। 

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्ट्सि यू.यू. ललित, जिन्होंने कप्पन की रिहाई का आदेश देने वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ का नेतृत्व किया, ने खुली अदालत में यह कह कर स्थिति को उभार दिया कि हर व्यक्ति को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार है। यह दिखाने की कोशिश की गई कि हाथरस पीड़ित को न्याय को जरूरत है जो एक आम आवाज उठाता है। क्या यह बात कानून की नजर में अपराध होगी? पीठ ने कहा कि वह अपीलकत्र्ता की हिरासत की अवधि और मामले के अजीबो-गरीब तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत दे रही है। 

उत्तर प्रदेश पुलिस जिसने कप्पन को गिरफ्तार किया था, ने आतंकवादियों के साथ उसके संबंध स्थापित करने के लिए बहुत कम जांच की और इस अवधि के दौरान कोई महत्वपूर्ण वसूली नहीं की गई। कप्पन, जो एक छोटे से मलयालम समाचार पोर्टल अझी मक्कम डॉट कॉम के लिए रिपोर्टिंग कर रहे थे। देश को झकझोर देने वाली घटना के नए कोणों और तथ्यों को खोजने के लिए वह उत्सुक थे। 

अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि कप्पन एक विरोध प्रदर्शन के दौरान खुद को बचाने के लिए एक पम्फ्लेट ले जा रहा था जिसमें ‘आरामदायक कपड़े पहने’ और ‘ग्लूकोज पिएं’ जैसे सुझाव थे। उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार यह पर्याप्त सबूत था कि वह खुद को दंगों के बारे में शिक्षित कर रहे थे। तथ्य यह है कि पम्फ्लेट के कुछ हिस्सों के मैटर को उठाया गया था जिसमें कहा गया था कि कैसे किसी को ढीले कपड़े पहनने चाहिएं जहां दंगों की संभावना हो और ऐसी स्थिति में पीने योग्य पानी कैसे ले जाना चाहिए। फिर भी पुलिस ने आरोप लगाया कि कप्पन धार्मिक कलह को भड़काने और देश में आतंक फैलाने, पुलिस से बचने का मास्टर माइंड और आपराधिक प्रक्रिया को विफल करने के लिए कानूनी खामियों का उपोग करने के तरीके से अच्छी तरह से वाकिफ है, कि एक बड़ी साजिश का हिस्सा था। 

कई वरिष्ठ न्यायाधीशों और विशेषज्ञों की राय व्यक्त करने के बावजूद कि यू.ए.पी.ए. में संशोधन किया जाना चाहिए। इसे मानवाधिकार कार्यकत्र्ताओं, वकीलों और पत्रकारों के खिलाफ और भी अधिक बार उकसाया जा रहा है। ‘पोटा’ का अतीत में लगभग सभी सरकारों द्वारा दुरुपयोग किया गया है।

यू.ए.पी.ए. मामले व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज करने की प्रवृत्ति हाल के दिनों में और विशेष रूप से भाजपा द्वारा शासित राज्यों में तेजी से बढ़ी है। और क्योंकि इनमें से कुछ सरकारों में नागरिकों को मामूली बहाने से बुक करने की प्रवृत्ति है तो ऐसे मामलों में सजा की दर बहुत कम है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले साल अगस्त में संसद को सूचित किया था कि 2019 में यू.ए.पी.ए. के तहत 1948 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें से केवल 34 व्यक्तियों को कानून के तहत दोषी ठहराया गया था। यह भी स्वीकार किया गया कि वर्ष 2016-2019 के बीच यू.ए.पी.ए. के तहत दर्ज किए गए केवल 2.2. प्रतिशत मामले अदालतों द्वारा दोष सिद्धि में समाप्त हुए। 

सुप्रीमकोर्ट के कई वरिष्ठ सेवानिवृत्त और सेवारत न्यायाधीश कानून में संशोधन की आवश्कता के बारे में बोलते रहते हैं। हालांकि न्यायालय विरोधाभासी टिप्पणियों और निर्णयों को दे रहे हैं। यह उचित समय है कि देश की शीर्ष अदालत कानून का अध्ययन करने के लिए एक बड़ी पीठ का गठन करे और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के साथ सामने आए। साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे कानूनों के तहत झूठे या प्रेरित मामले दर्ज करने वालों पर भी मुकद्दमा चलाया जाए और बरी होने के मामले में दंडित किया जाए। यह झूठे और कुछ मामले दर्ज करने वालों के लिए एक निवारक के रूप में कार्य करेगा।-विपिन पब्बी


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