अखिलेश अब एक परिपक्व राजनीतिज्ञ बन चुके हैं

punjabkesari.in Tuesday, Jan 18, 2022 - 05:32 AM (IST)

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव राज्य में फरवरी में होने वाले चुनावों में भाजपा के विरुद्ध प्रमुख चुनौती दाता के तौर पर उभरे हैं और अब चुनावी परिदृश्य मुखर हो उठा है। 10 फरवरी से 7 मार्च तक चुनाव 7 चरणों में आयोजित किए जाएंगे। 10 मार्च को खुलासा होगा कि कौन विजेता बनेगा। 

युवा यादव की चुनावी रैलियों में उमड़ रही भीड़ अखिलेश की बढ़ रही लोकप्रियता का सबूत है। अधिकांश  चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि ये चुनाव अब समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच द्वि-धु्रवीय बन गए हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके बढ़ते समर्थन आधार बारे टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘लाल टोपी’ उत्तर प्रदेश के लिए ‘लाल रोशनी’ (रैड लाइट) है।

जूनियर यादव अपने पिता तथा पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की छाया से काफी समय पहले बाहर आ गए थे और आज वह अपनी पार्टी के लिए एकमात्र नेता हैं। अपने दो दशक के राजनीतिक जीवन में अखिलेश कई उतार-चढ़ावों से गुजरे हैं। गठबंधन के लिए चुनाव प्रचार का नेतृत्व करते हुए आज वह कहीं अधिक परिपक्व राजनीतिज्ञ हैं। 

समाजवादी पार्टी की राजनीतिक रणनीति अच्छी तरह से बनाई गई है। प्राथमिकता के तौर पर अखिलेश ने खुद को पार्टी के भीतर मजबूत किया है तथा अपने चाचा शिवपाल यादव के साथ अपनी लड़ाई का समाधान किया जो अब वापस समाजवादी पार्टी में लौट आए हैं। चाचा तथा भतीजे ने अपने मतभेदों को दफन कर दिया है और चाचा उनकी विजय रथ यात्रा में शामिल हुए हैं। 

अखिलेश ने अकेले ही गठबंधन तैयार किए हैं विशेष तौर पर जयंत चौधरी नीत राष्ट्रीय लोकदल के साथ। जो चीज सपा के हित में काम कर रही है वह है पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान समुदाय की ओर से मिलने वाला समर्थन। वे लगभग एक वर्ष से भाजपा से निराश हैं क्योंकि 2019 में संसद में पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ उनके प्रदर्शनों पर केंद्र ध्यान नहीं दे रहा था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का दबदबा है और वे रालोद को समर्थन देते हैं। 

जूनियर यादव ने चतुराईपूर्वक खुद को अपने पिता के विश्वसनीय मुस्लिम-यादव फार्मूले से दूर करके बड़े सामाजिक गठबंधन के साथ एक नई तरह की सामाजिक इंजीनियरिंग तैयार की है। अखिलेश ने बड़ी मेहनत करके सबक सीखे हैं। उन्होंने कई मिश्रणों के साथ प्रयोग किए हैं। जैसे कि 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस से हाथ मिलाया तथा 2019 के चुनावों में बसपा के साथ लेकिन वांछित परिणाम प्राप्त करने में असफल रहे।

अब वह जाति आधारित छोटे क्षेत्रीय दलों पर निर्भर हैं, विशेषकर जिनका गैर-यादव ओ.बी.सी. आधार है। उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल, महान दल, संजय सिंह चौहान की डैमोक्रेटिक (सोशलिस्ट) पार्टी, कृष्णा पटेल के अपना दल (सा यवादी), राजेश सिद्धार्थ के राजनीतिक न्याय तथा राम राज सिंह पटेल की अखिल भारतीय किसान सेना जैसे छोटे दलों को अपने पाले में किया है। 

दिलचस्प बात यह है कि सपा प्रमुख ने वायदा किया है कि यदि सत्ता में आए तो जाति आधारित जनगणना करवाएंगे। यद्यपि पिछड़े वर्गों की पार्टियां उत्तर प्रदेश में 1990 के दशक के शुरू से ही सत्ता में हैं। उनके पूर्ववर्तियों ने कोई जोखिम नहीं उठाया। उनकी गणनाएं समाजवादी पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षणों पर आधारित हैं, जिनसे खुलासा हुआ है कि 2017 के चुनावों में 50 प्रतिशत ओ.बी.सीज ने भाजपा के लिए वोट डाले जबकि लगभग 15 प्रतिशत ने सपा का समर्थन किया। अखिलेश ने भाजपा को बाहर करने के लिए उनके साथ शामिल होने हेतु सभी दलों तथा वर्गों को खुला निमंत्रण दिया है। 

अपनी पार्टी का सामाजिक आधार व्यापक बनाने के लिए उन्होंने भाजपा से कई ओ.बी.सी. नेताओं का सफलतापूर्वक शिकार किया है जिनमें स्वामी प्रसाद मौर्य शामिल हैं। चुनावों की घोषणा होने से कुछ दिन पहले 2 प्रभावशाली मंत्रियों तथा कुछ विधायकों ने भाजपा छोड़ दी तथा सपा में शामिल हो गए। शक्तिशाली ओ.बी.सी. (अन्य पिछड़ा वर्ग) नेता तथा 5 बार के विधायक स्वामी प्रसाद मौर्य बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को छोड़ कर 2016 में भाजपा में शामिल हुए थे। योगेश वर्मा, मिठाई लाल भारती जैसे कई अन्य बसपा को छोड़ कर पहले ही सपा का रुख कर चुके हैं।

जहां तक कमंडल की राजनीति का सामना करने की बात है, अखिलेश ने भाजपा की राजनीति का सामना करना के लिए ‘मी टू’ की प्रक्रिया को गले लगाया है। उन्होंने विष्णु नगर की स्थापना करने तथा पूर्वांचल एक्सप्रैस-वे पर भगवान परशुराम की विशाल प्रतिमा लगाने का भी वायदा किया है। उन्होंने कोविड से निपटने, विकास, कानून-व्यवस्था, घटिया स्वास्थ्य ढांचा, आरक्षण तथा महंगाई जैसे अन्य मुद्दे भी उठाए हैं। वह गोरखपुर, हाथरस तथा उन्नाव में विवादास्पद घटनाओं के मुद्दों को भी उठा रहे हैं। 

भाजपा वोट प्राप्त करने के लिए मोदी पर निर्भर है। योगी विधानसभा के लिए पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसा दिखाई देता है कि भाजपा अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए 2017 की तरह जाट वोटों के धु्रवीकरण पर भरोसा कर रही है। समाजवादी पार्टी की जातीय रणनीति का सामना करने के लिए भाजपा ने 44 ओ.बी.सी. उ मीदवारों को टिकट दिए हैं जिनमें 16 जाट शामिल हैं, जिनके बाद 43 उच्च जातियों तथा 19 अनुसूचित जातियों से हैं। सूची यह संकेत देती है कि भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के वोट प्राप्त करने के लिए आशान्वित है जहां ग्रामीण समुदाय केंद्रित हैं। 

प्रियंका गांधी वाड्रा, जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का नेतृत्व कर रही हैं, को महिलाओं के वोटों पर भरोसा है तथा उन्होंने हर तरह की मुफ्त चीजों का वायदा किया है। बसपा प्रमुख मायावती अभी अधिक सक्रिय नहीं हैं लेकिन 2017 तथा 2019 में अपनी पार्टी की दयनीय कारगुजारी के बाद से चुपचाप काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश को जातीय आधार पर मतदान के लिए जाना जाता है। इन चुनावों में अखिलेश की मंडल राजनीति काम करेगी या भाजपा की कमंडल राजनीति, यह एक बहुकरोड़ी प्रश्न है।-कल्याणी शंकर
 


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