अग्निपथ : सशस्त्र सेनाओं के आधुनिकीकरण की ओर एक कदम

punjabkesari.in Wednesday, Jun 22, 2022 - 04:07 AM (IST)

जीवन में केवल परिवर्तन ही स्थिर है। यह बात सशस्त्र सेनाओं में साढ़े 17 वर्ष से 23 वर्ष के युवकों की भर्ती हेतु एक महत्वाकांक्षी ‘अग्निपथ’ योजना का सार है। इस योजना की घोषणा 14 जून  को की गई। आशानुरूप इस योजना को लेकर देश में धु्रवीकरण हुआ। कुछ राज्यों में हिंसा हुई। आग में घी डालते हुए विपक्षी दलों ने यह कहते हुए इसे और भड़काया कि इससे सेनाओं की युद्धक क्षमता प्रभावित होगी और यह योजना स्थायी नौकरी और पैंशन के बिना एक अल्पकालिक करार होगा। 

निश्चित रूप से हिंसा उचित नहीं और इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। साथ ही यह बताता है कि देश में बेरोजगारी संकट कितना बढ़ रहा है। यह भी सच है कि राज्य इस ङ्क्षहसा से निपटने के लिए तैयार नहीं थे और उन्होंने इस तरह की हिंसा का पूर्वानुमान नहीं लगाया। शायद प्रशासन को इस संबंध में और विचार-विमर्श करना चाहिए था। बेरोजगारों की संख्या को ध्यान में रखते हुए इस योजना पर पूर्णत: विचार करना और राजनीतिक दलों और राज्यों को विश्वास में लेना चाहिए था। किंतु यह इस बात को भी दर्शाता है कि सुधार आरंभ करना कितनी बड़ी चुनौती है। 

अग्निपथ का विरोध करने वाले लोग वे समूह हैं जो यथास्थिति से लाभ उठाते हैं और जो हमारी सशस्त्र सेनाओं के अतीत के अनुभव पर विचार नहीं करते। वर्ष 1977 तक सैनिकों को केवल 7 वर्ष के लिए भर्ती किया जाता था, जिसे बाद में बदलकर 17 वर्ष किया गया। इसका तात्पर्य है कि 1962 में चीन के साथ युद्ध, 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध उन सैनिकों ने जीता जिन्हें 7 वर्षों के लिए नियुक्त किया गया था। 

कुछ लोगों का मानना है कि ये विरोध प्रदर्शन न केवल सेवाकाल कम करने को लेकर है, अपितु सैनिकों को पैंशन और चिकित्सा सुविधा न देने को लेकर भी है। जो सेना 0.5 प्रतिशत से कम जन शक्ति को नियुक्त करती है, उसका पैंशन बिल बहुत भारी है। वर्ष 2010-11 में सेना पैंशन पर अपने कुल रक्षा व्यय का 1 प्रतिशत खर्च करती थी, जो वर्ष 2020-21 में बढ़कर 26 प्रतिशत तक पहुंच गया जिसके चलते हम रक्षा उपकरणों और हथियारों पर कम खर्च कर पा रहे हैं, इसलिए पैंशन सुधार भी आवश्यक है। 

अमरीका में भी सैन्यकर्मियों को केवल 4 वर्ष के लिए लिया जाता है उसके बाद उन्हें 4 वर्ष की आरक्षित सेवा करनी पड़ती है जिस दौरान उन्हें आवश्यकता पडऩे पर सेना की सेवा में बुलाया जा सकता है। चीन में सेना में 3 वर्ष और नौसेना और वायु सेना में 4 वर्ष के लिए सैनिकों को नियुक्त किया जाता है। रूस में एक वर्ष की सेवा है और उसके बाद उन्हें आरक्षित सेना में रखा जाता है। फ्रांस में स्वयंसेवी एक साल के करार पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, जिसे 5 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। इसराईल में 30 माह की अनिवार्य सेना सेवा है। 

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये सुधार आवश्यक हैं, क्योंकि इससे प्रौद्योगिकी और विज्ञान का सेना में उपयोग होगा, जो भारत की व्यापक जटिल और बहुआयामी सरक्षा के लिए आवश्यक है। हमारी सक्रिय सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा के चुनौतीपूर्ण खतरों के मद्देनजर हमें हर समय संचालनात्मक तैयारी बनाए रखनी होगी, क्षमता का निर्माण करना होगा, युद्धक सेना की औसत आयु कम करनी होगी, सेना में अधिक युवाओं को भर्ती करनी होगा और बढ़ते पैंशन बिल पर अंकुश लगाना होगा। 

नि:संदेेह प्रौद्योगिकी से खुफिया क्षमता भी बढ़ेगी, जो राष्ट्र के समक्ष खतरों का मूल्यांकन करने के लिए आवश्यक है। इसके अलावा वह आतंकवाद जैसे विशेष खतरों का मूल्यांकन करने में भी सहायक होगी, जिसका मुकाबला परंपरागत युद्धक सेनाओं से नहीं किया जा सकता। इसके अलावा इससे हथियारों की खरीद की लागत कम होगी। स्वस्थ प्रौद्योगिकी अवसंरचना का निर्माण होगा और औद्योगिक क्षमता बढ़ेगी जो भारत की रक्षा तैयारियों और उभरते खतरों का सामना करने के लिए आवश्यक है। 

आपको ध्यान होगा कि बालाकोट में वायु सेना द्वारा किए गए हमले में पाकिस्तान के लॉचिंग पैड्स का पता लगाने के लिए सैटेलाइट इमेजों का प्रयोग किया गया था। इसी तरह अमरीका ने पाकिस्तान के एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन का पता लगाने के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया और ईरान के सुरक्षा प्रमुख का पता लगाने और उसको मारने के लिए ड्रोन का उपयोग किया। 

इस तरह की उच्च युद्धक तैयारी के लिए अधिक निवेश की आवश्यकता है क्योंकि उभरती प्रौद्योगिकियां समय की आवश्यकता है। इसके साथ-साथ सुयोग्य और समॢपत युवकों को वास्तविक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, उनमें रणनीतिक दक्षता लाई जानी चाहिए, उन्हें आधुनिक उपकरण दिए जाने चाहिएं और उनकी क्षमताओं का विस्तार किया जाना चाहिए। दीर्घकाल में भारत को रासायनिक और जैविक आक्रमण से रक्षा, इलैक्ट्रोनिक युद्ध का मुकाबला करने के लिए तैयार रहना होगा। 

इसके अलावा उसे ऊर्जा उपकरणों, कम्प्यूटिंग, सॉफ्टवेयर सिमुलेशन, और सैंसर, ह्यूमन सिस्टम्स इंटरफेस, कमांड कंट्रोल और कम्युनिकेशन आदि के मामले में क्षमताएं बढ़ानी होंगी, और साथ ही युद्ध में जीवन और उपकरणों के नुक्सान को कम करना होगा। ऐसे वातावरण में जहां पर प्रौद्योगिकी ने वर्तमान प्लेटफार्मों के बेहतर प्रदर्शन से युद्ध क्षेत्र का परिदृश्य बदल दिया है, संभावित अग्निवीरों को खुला मन रखना होगा। उन्हें भारत की रक्षा के साथ राजनीति करना बंद करना और अपने रुख में लचीलापन लाना होगा। 

युद्धक्षेत्र मेंं जीत के लिए आवश्यक है कि किसी सूचना को संग्रहित करने, उसका विश्लेषण करने और उसे सेना तक पहुंचाने की क्षमता हो। प्रौद्योगिकी आवश्यकता यह सुनिश्चित करने के लिए भी है कि कोई भी दुश्मन देश की सूचना प्रणाली को बाधित न करे। सेेना के एक सेवानिवृत वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, आधुनिक युद्धों पर दूर से निगरानी किए जाने तथा युद्धक सामग्री के आवागमन और भंडारण पर नजर रखने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें बेहतर सैंसर की आवश्यकता है जो रासायनिक और जैविक एजैंटों की पहचान कर सके। क्रूज और बैलेस्टिक मिसाइलों को निशाना बनाने के लिए उनके लांच पैड का पता लगाने हेतु राडार और सैंसर चाहिएं। 

अंतरिक्ष, साइबर, इलैक्ट्रोनिक, आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस प्रौद्योगिकी और विज्ञान में निवेश सैनिकों की ताकत कई गुना बढ़ा देगा और ये प्रौद्योगिकी देश की सेना को समय पर व्यापक और विस्तृत खुफिया सहायता उपलब्ध कराएगी, जिसके चलते टैंक, तोपखाना, युद्धक विमान जैसे हथियारों के प्लेटफार्म का कार्य निष्पादन त्वरित होगा और उसमें सुधार आएगा तथा सैनिक कमांडर सही निर्णय ले पाएंगे। 

इस समस्या का समाधान सभी हित धारकों के साथ विचार-विमर्श और पारस्परिक सहमति है। सभी को यह बताना होगा कि अग्निपथ एक अल्पकालिक करार नहीं है, अपितु यह भारत की सशस्त्र सेनाओं के आधुनिकीकरण का मार्ग है। सरकार को अग्निवीर की सेवाओं को 5 वर्ष तक बढ़ाने जैसे सुझावों को स्वीकार करना चाहिए। हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि पसीने से खून बचता है और खून से जीवन, किंतु मस्तिष्क और प्रौद्योगिकी दोनों को बचाती है।-पूनम आई.कौशिश 
 


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