वोटर लिस्ट के बाद जज मुकद्दमों का समय पर निपटारा करें

punjabkesari.in Monday, Feb 23, 2026 - 04:04 AM (IST)

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के विवादित वीडियो पर सुनवाई से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनावों से पहले नेताओं को अदालत में सियासी मुद्दे नहीं उठाने चाहिएं लेकिन वोटर लिस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश से हाईकोर्ट और जिला अदालतें भी नेताओं की सियासत में फंसती नजर आ रही हैं। राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच आरोप-प्रत्यारोप के दुर्भाग्यपूर्ण खेल की वजह से बढ़ रहे संवैधानिक संकट की ओर इशारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करने का आदेश पारित किया है। उसके अनुसार, हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की छुट्टी निरस्त करने के साथ वोटर लिस्ट से जुड़े विवादों के निपटारों के लिए 294 न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की है।

सुप्रीम कोर्ट के 9 फरवरी के आदेश के अनुपालन की बजाय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, सुप्रीम कोर्ट में अपनी बहस के वीडियो और होर्डिंग से सियासी बढ़त हासिल करने की कोशिश में जुटी हैं। विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल में नागरिकता से जुड़े आवेदनों की जांच और मंजूरी के लिए एक विशेष अधिकार प्राप्त समिति का गठन किया है। यह समिति नागरिकता अधिनियम 1955 और संशोधित नागरिकता कानून (सी.ए.ए.) के तहत नागरिकता का निर्धारण करेगी। सी.ए.ए. का कानून 2019 में बनाया गया, जिसके 5 साल बाद नियम बनाए गए। दिलचस्प बात यह है कि सी.ए.ए. कानून को चुनौती देने वाली 200 से ज्यादा लंबित पुरानी याचिकाओं पर चुनावी समर के दौरान सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई शुरू करने का निर्णय लिया गया है। 

गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि मतदाता सूची के शुद्धिकरण के बाद अब 5 साल के भीतर देश से सभी घुसपैठियों को बाहर निकाल देंगे। लेकिन बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के बाद कितने घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से निकाले गए, इसका अधिकृत आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आया। विपक्षी दलों की यह आशंका कि एस.आई.आर. की प्रक्रिया से दलित, पिछड़े और मुस्लिम समुदाय के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, उसके भी ठोस प्रमाण सामने नहीं आ रहे। पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर ए.आई. के इस्तेमाल से मतदाता फोटो पहचान पत्र से लेकर फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाने के मामले सामने आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले में सुनवाई के दौरान जजों ने कहा कि आधार कार्ड से लेकर सभी दस्तावेजों को फर्जी तरीके से बनाया जा सकता है।

आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस (ए.आई.) के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के सफल आयोजन के बाद वोटर लिस्ट से जुड़े विवाद में तकनीक और ए.आई. का व्यावहारिक इस्तेमाल नहीं होना, दुखद होने के साथ पूरे देश में प्रशासनिक अराजकता को बढ़ा रहा है। मृत या डुप्लीकेट वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार वोटर लिस्ट बनाने और चुनाव करवाने के बारे में चुनाव आयोग को सभी अधिकार हासिल हैं। कोई भी राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार संवैधानिक व्यवस्था का पालन करने में विफल हो जाए तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के अनेक आदेशों का पालन करने में विफल पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को दंडित करने की बजाय न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति से अन्य राज्यों में भी ऐसी मांग उठ सकती है। 

चुनाव आयोग ने असम में विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) की बजाय सामान्य पुनरीक्षण का निर्णय लिया है। असम में भी अन्य राज्यों की तर्ज पर एस.आई.आर. की मांग करने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया है। मतदाता सूची में पुनरीक्षण पर अधिकांश विवाद विपक्ष शासित राज्यों में ही हो रहा है लेकिन राजनीति के इस गंदे खेल में अदालतों और जजों की बढ़ती भूमिका से आने वाले समय में कई चुनौतियां आ सकती हैं। बंगाल में 45 लाख से ज्यादा मामलों में न्यायिक अधिकारी जो आदेश पारित करेंगे, उनके खिलाफ अब सिर्फ हाईकोर्ट में ही सुनवाई हो सकती है। 

तीसरे चरण में दिल्ली, हरियाणा और पंजाब समेत 22 राज्यों में एस.आई.आर. की प्रक्रिया शुरू करने और वोटरों की मैपिंग के लिए चुनाव आयोग ने पत्र लिखा है। मिड डे मील, जनगणना, वोटर लिस्ट और चुनावों में शिक्षकों की ड्यूटी से शिक्षा प्रभावित हो रही है। अब वोटर लिस्ट से जुड़े विवादों के समाधान के लिए मैजिस्ट्रेट और जजों की नियुक्ति से अदालतों में लंबित मुकद्दमों का मर्ज बढ़ सकता है। अन्य राज्यों में भी वोटर लिस्ट से जुड़े विवाद भी अब सुप्रीम कोर्ट के सामने आएंगे। इसलिए इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट की बजाय राज्यों के हाईकोर्ट में सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार फैसला चाहिए। पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों को एक सप्ताह के भीतर 45 लाख से ज्यादा मामलों का निष्पादन करना होगा। यदि यह काम समय पर सफलतापूर्वक पूरा हो जाए तो उसके बाद सभी जिला अदालतों के जजों को मुकद्दमों के समयबद्ध निष्पादन के लिए सुप्रीम कोर्ट को आदेश पारित करना चाहिए।-विराग गुप्ता(एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट)
 


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