जंग जरूरी है खाने में मिलावट करने वालों के खिलाफ
punjabkesari.in Tuesday, Jul 21, 2026 - 05:22 AM (IST)
जरा कल्पना करो कि सुबह आप चाय में दूध डालते हो लेकिन उस दूध में पानी और कुछ कैमिकल मिला हुआ है। या फिर मिर्च पाऊडर में सिंथैटिक कलर मिला है। अफसोस कि यह भारत में रोजमर्रा की हकीकत है। खाने के सामान में मिलावट आज देश की एक बड़ी समस्या बन चुकी है। यह सिर्फ पैसे बचाने का लालच नहीं, बल्कि लाखों लोगों की सेहत से खिलवाड़ है। भारत में खाने की मिलावट की जड़ें काफी गहरी हैं। एफ.एस.एस.ए.आई. (खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण, भारत) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026 में टैस्ट किए गए हर 6 खाद्य नमूनों में से 1 फेल हो गया। मतलब करीब 16-17 फीसदी सैंपल स्टैंडर्ड पर खरे नहीं उतरे। दूध, घी, मसाले, पनीर, तेल, चाय पाऊडर, ये सब आम टार्गेट हैं।
महाराष्ट्र में हाल ही में एफ.डी.ए. की रेड के दौरान ट्रक वाले दूध फैंकने लगे क्योंकि उन्हें डर था कि मिलावट पकड़ी जाएगी। शोलापुर में 37,000 लीटर से ज्यादा मिलावटी दूध जब्त और नष्ट किया गया। अब तक 359 गिरफ्तारियां, 235 एफ.आई.आर. और करोड़ों के सामान जब्त किए गए। दूध कलैक्शन 20-25 प्रतिशत तक गिर गया, जो दिखाता है कि पहले कितना घोटाला चल रहा था। दिल्ली-यू.पी. में पनीर की हालत और खराब है। 83 फीसदी सैंपल फेल, 40 फीसदी हानिकारक। पाम ऑयल, यूरिया और कैमिकल मिलाकर बनाया जाता है फेक पनीर। मसालों में सिंथैटिक डाई, मछली में फॉर्मेलिन, घी में वनस्पति तेल आदि। लिस्ट लंबी है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक, छोटे दुकानदार से लेकर बड़ी सप्लाई चेन तक यह फैला हुआ है। गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है क्योंकि वे सस्ता सामान खरीदते हैं। दिल्ली में नवरात्रि के समय मिलावटी आटा खाने से सैंकड़ों लोग अस्पताल पहुंच गए। पंजाब में घी और मिठाइयों की रेड में हजारों किलो सामान जब्त किया गया।
दुष्परिणाम क्या हैं : खाने की मिलावट के नुकसान 2 तरह के हैं। पहला-पेट दर्द, उल्टी, डायरिया, फूड प्वॉइजङ्क्षनग। लंबे समय में लिवर-किडनी डैमेज, कैंसर, हार्मोनल प्रॉब्लम, न्यूरोलॉजिकल जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनियाभर में मिलावटी खाने की चीजों से 60 करोड़ लोग बीमार हो रहे हैं या जान गंवा रहे हैं। भारत में ये आंकड़े और भयावह हैं। सिंथैटिक कलर वाली मिर्च से पेट की बीमारियां बढ़ रही हैं। डिटर्जैंट मिले दूध से बच्चों का शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है और हड्डियों को कमजोर कर रहा है। दूसरा, लंबे समय तक इस तरह के खाद्य पदार्थों के सेवन से डायबिटीज और दिल की बीमारियां बढ़ रही हैं।
सरकार की कोशिशें : पर अब सरकार लडऩे के मूड में है। एफ.एस.एस.ए.आई. की तरफ से भारत नियमित सैंपङ्क्षलग, रेड, जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। यह भारत सरकार का वह मुख्य संगठन है जो पूरे देश में खाने-पीने की चीजों की सुरक्षा, गुणवत्ता और मानकों की देखभाल करता है। राज्यों में एफ.डी.ए., हैल्थ डिपार्टमैंट रेड कर रहे हैं। पैनल्टी, जेल और खराब सामान को नष्ट किया जा रहा है। स्कूलों में फूड सेफ्टी एजुकेशन के अभियान चलाए जा रहे हैं। लेकिन चुनौतियां हैं। संसाधन कम हैं, ग्रामीण इलाकों में पहुंच मुश्किल है पर प्रयास हो रहे हैं। उदाहरण के रूप में दिल्ली- हरियाणा सीमा पर भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय का संस्थान है नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ फूड टैक्नोलॉजी एंटरप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमैंट (निफ्टेम)। यहां खाद्य अनुसंधान और विश्लेषण केंद्रों में खाने की मिलावट डिटैक्शन, खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता पर काम किया जा रहा है। इधर रैपिड टैस्टिंग्स किट्स, एडवांस्ड एनालिसिस टैक्निक्स, खाद्य सुरक्षा मानकों पर अनुसंधान किया जाता है। प्रख्यात वैज्ञानिक और निफ्टेम के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय कहते हैं कि हम ‘थोड़ा कम, ईट राइट’ के विचार को आगे लेकर जा रहे हैं। हमारे वैज्ञानिकों की टीम उद्योगों के साथ मिलकर नई तकनीकेें विकसित और सांझा करती है। मतलब, नई मशीनें और तरीके फैक्टरियों तक पहुंचा दिए जाते हैं। इसके अलावा वैज्ञानिक कई रिसर्च करके उन्हें किताबों और जर्नल में छापते हैं। इससे दूसरे लोग भी सीख पाते हैं।
विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस पर निफ्टेम खास कार्यक्रम आयोजित करता है। इनमें सड़क के ठेले वाले विक्रेताओं को ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें साफ-सफाई, सही तरीके से खाना रखने और मिलावट न करने की जानकारी दी जाती है। डॉ. ओबेरॉय कहते हैं कि हमें भारत को एक इस तरह के देश के रूप में विकसित करना है, जहां खाने-पीने की वस्तुओं में कतई मिलावट न हो। दरअसल खाने की मिलावट से निपटने के लिए सस्ती और तेज टैस्ट किट्स बनाई जा रही हैं। इनसे गांव-शहर में कहीं भी आसानी से चैक किया जा सकता है। दूसरे, ये रिसर्च एफ.एस.एस.ए.आई. को बेहतर नियम बनाने में मदद करती हैं। तीसरे, फैक्टरियों को साफ-सुथरी प्रोसैसिंग तकनीक दी जाती है, जिससे मिलावट करने की जरूरत ही कम पड़ती है। चौथे, जागरूकता कार्यक्रमों और ट्रेनिंग से पूरी सप्लाई चेन मजबूत होती है। इससे किसान से लेकर दुकानदार तक सब सतर्क रहते हैं। पांचवें, लंबे समय में लोगों की बीमारियां कम होंगी, स्वास्थ्य पर खर्च घटेगा और भारत का खाना विदेशों में भी ज्यादा बिकेगा।
उदाहरण के तौर पर, अगर निफ्टेम की तकनीक से मसाले या दूध की जांच सिर्फ 10 मिनट में हो जाए, तो अधिकारी तुरंत छापा मार सकेंगे। ठेले वाले विक्रेता ट्रेङ्क्षनग लेकर साफ-सुथरा और असली खाना बेचेंगे, जिससे ग्राहक भी खुश रहेंगे। सबको अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। खरीदते समय लेबल अच्छे से पढ़ें, एफ.एस.एस.ए.आई. का लोगो देखें और अगर कुछ गड़बड़ लगे तो शिकायत जरूर करें। अगर हर स्तर पर ईमानदारी आए, तो स्वस्थ भारत का सपना सच हो सकता है। इस सपने को पूरा करने में निफ्टेम जैसे संस्थानों का अहम रोल होने वाला है। याद रखें, खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि सेहत बनाने के लिए होता है। आइए, मिलकर ‘ईट राइट’ अभियान को आगे बढ़ाएं!-विवेक शुक्ला
