लड़ी जा रही है एक बेमतलब की जंग

punjabkesari.in Friday, Mar 13, 2026 - 05:14 AM (IST)

अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प और इसराईल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू को लगा था कि ईरान को 4 दिनों में घुटनों पर ला दिया जाएगा। अयातुल्ला खामेनेई, उनके दामाद, बेटी, नाती, रक्षा मंत्री, सेना के सर्वोच्च कमांडर आदि को मार कर ऐसी संभावनाएं जग भी गई थीं लेकिन अब ट्रम्प खुद कह रहे हैं कि 4 दिन की जगह 4 हफ्ते लग सकते हैं। चार हफ्ते भी कम से कम। उधर ईरान चाहता है कि लड़ाई 4 महीने चले। दुनिया, खासतौर से खाड़ी देशों, यूरोपियन यूनियन और भारत के दिन इसी इंतजार में कट रहे हैं कि अब होगा युद्ध विराम, अब जंग खत्म होगी और बातचीत शुरू होगी। 

ट्रम्प कह चुके हैं और कह कर मुकर चुके हैं कि ईरान बात करना चाहता है लेकिन अमरीका ने कह दिया है कि बहुत देर कर दी। उधर ईरान ने पहले कहा कि वह अपनी तरफ से बातचीत की पहल नहीं करेगा। उसके बाद कहा कि पहले जंग खत्म हो फिर बात होगी। यानी साफ है कि दोनों देश कोई बीच का रास्ता तलाश रहे हैं लेकिन नाक की लड़ाई का भी ख्याल रख रहे हैं।  जब तक सूरत नजर नहीं आती तब तक कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ते रहेंगे, शेयर बाजार हिचकोले खाता रहेगा, महंगाई बढऩे की आशंका परेशान करती रहेगी, बहुत से देशों का बजट गड़बड़ाता रहेगा और आॢथक मंदी का साया मंडराता रहेगा। ईरान शायद चाहता भी यही है। लेकिन ट्रम्प क्या चाहते हैं, नेतन्याहू के दिल में क्या है साफ नहीं है। खामेनेई की मौत ने पूरे ईरान को एक कर दिया है। उनकी जगह लेने वाले, उनके बेटे को और भी ज्यादा कट्टर होना ही पड़ेगा। वह बातचीत के लिए तैयार हुआ तो विरोध का सामना करना पड़ेगा।

ट्रम्प का कहना कि 4 मकसद थे। एक, ईरान की नेवी का खात्मा करना। दो, ईरान के परमाणु ठिकानों को नेस्तनाबूद करना, तीन, ईरान की मिसाइल क्षमता को काफी हद तक सीमित करना और चार, सत्ता परिवर्तन करना। जानकारों का कहना है कि सत्ता परिवर्तन को छोड़ कर बाकी में वह काफी हद तक कामयाब हो चुका है। आई.ए.ई.ए. (अंतर्राष्ट्रीय एटॉमिक एनर्जी एजैंसी) कह ही चुका है कि ईरान परमाणु बम नहीं बना रहा। ईरान साफ कर चुका है कि अयातुल्ला खामेनेई का दिया ऐसे बम नहीं बनाने का फतवा उनकी मौत के बाद भी अमल में रहेगा। ऐसे में ट्रम्प कभी भी ऐलान कर सकते हैं कि ईरान का मिसाइल सिस्टम, नेवी और परमाणु ठिकाने बर्बाद किए जा चुके हैं और विश्व शांति के लिए युद्ध में जाने का उसका मकसद पूरा हो गया है (पूरी दुनिया इस पर राहत की सांस लेगी, शायद ही कोई उनके दावों को चुनौती देगा)। 

इसराईल चाहता है कि ईरान को कमजोर कर दिया जाए। इतना कमजोर कि खाड़ी देशों में उसकी कोई पूछ नहीं रहे और नेतन्याहू खाड़ी देशों के थानेदार बन जाएं। दोनों देशों की लगातार बमबारी ने पहले से कमजोर ईरान को और ज्यादा कमजोर किया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। नेतन्याहू अपनी इस जीत के बल पर अक्तूबर के चुनावों में उतर सकते हैं या फिर जल्द चुनाव करवा कर फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। ट्रम्प को चूंकि अगला चुनाव लडऩा नहीं है, लिहाजा वह भी चाहेंगे कि सैनिकों के ताबूतों की संख्या बढऩे से पहले वह पतली गली पकड़ लें। उधर ईरान 5 तरह की मिसाइलों और सस्ते ड्रोन से अमरीका और इसराईल को हैरान-परेशान किए हुए है। ईरान का सस्ता ड्रोन सिर्फ 20,000 डालर (करीब 17 लाख रुपए) का पड़ता है, जबकि इस ड्रोन को हवा में ही मारने के लिए जो मिसाइल इंटरसैप्टर अमरीका दागता है, उसकी कीमत 4 मिलियन डालर (करीब 8 करोड़ रुपए)  बैठती है। अब ईरान के पास तो हजारों की संख्या में ऐसी मिसाइल और ड्रोन हैं, उसके दोस्त हमास के पास 30 से 40 हजार पुरानी मिसाइलें हैं लेकिन अमरीका के पास इंटरसैप्टर का टोटा है। अमरीका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने खुद स्वीकारा है कि ईरान हर महीने 100 मिसाइल बनाने की क्षमता रखता है, जबकि अमरीका में एक महीने में सिर्फ 6 इंटरसैप्टर बनाने की क्षमता है। 

ईरान ने पिछले साल जुलाई के 12 दिन के युद्ध से सबक सीखा और पूरे देश में 33 से ज्यादा ठिकानों पर मिसाइल लांचर तैनात कर दिए। इनमें से कुछ तो जमीन के अंदर भी हैं। ईरान इन्हीं के भरोसे 4 महीनों तक लड़ाई जारी रखना चाहता है, ताकि तब तक यूरोपीय देशों, खाड़ी के देशों और भारत जैसे देशों में त्राहि-त्राहि मच जाए और यही देश अमरीका पर सीजफायर के लिए दबाव डालने लगें। अमरीका और इसराईल इसे समझ रहे हैं और ईरान की मिसाइल कमांड पर हमले दर हमले कर रहे हैं। उधर ईरान खाड़ी देशों में स्थापित अमरीकी सैन्य ठिकानों पर लगे राडार नष्ट करने में लगा है जो ईरानी मिसाइल का पता लगाते हैं। हाल ही में ईरान ने कतर में ऐसे ही राडार को नष्ट किया, जिसकी कीमत 1 बिलियन डॉलर बताई जाती है। सारा खेल तकनीक का है। ईरान अमरीका के जी.पी.एस. सिस्टम पर काम नहीं करता। उसने चीन के जी.पी.एस. को लिया है जो अमरीका की पकड़ के बाहर है। 

साफ है कि इस युद्ध में ईरान की हार तय है। सबसे ज्यादा नुकसान भी ईरान को उठाना पड़ेगा लेकिन ईरान का वजूद कायम रहेगा, मौजूदा सत्ता बरकरार रहेगी। इसराईल के नुकसान की भरपाई अमरीका कर ही देगा लेकिन विनाश के बाद भी नेतन्याहू चुनाव हार गए तो बाकी जिंदगी जेल में बितानी पड़ सकती है या हो सकता है कि इस जंग की वजह से उन्हें सजा में छूट मिल जाए। ट्रम्प को आॢथक नुकसान झेलना होगा, अमरीकी जनता की नाराजगी झेलनी होगी, जो यह मानती है कि ट्रम्प इस जंग में गलत कूद गए। सिर्फ 25 फीसदी जनता उनके साथ है। ईरान जंग में हार का अपमान भूलेगा नहीं और हो सकता है कि परमाणु बम बनाने में कामयाब हो जाए। कुल मिलाकर एक बेमतलब की जंग लड़ी जा रही है जो जितनी जल्द खत्म हो, उतना ही बेहतर है।-विजय विद्रोही
 


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