बेबस दुनिया, क्या कोई युद्ध रुकवा सकता है?
punjabkesari.in Saturday, Mar 21, 2026 - 05:25 AM (IST)
एक ओर आइसलैंड, स्विट्जरलैंड और कोस्टारिका जैसे देश हैं, जिन्होंने शायद ही कभी युद्ध देखा हो, कुछ ने अपनी सेना ही समाप्त कर दी, अनेक जानते ही नहीं कि किसी देश से लडऩा क्या होता है? इसके विपरीत अमरीका, रूस, चीन, ईरान, इसराईल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे देश हैं, जो अगर किसी से युद्ध न करें तो उनका भोजन ही हज्म नहीं होता। आकार में छोटा और वैश्विक संदर्भ में मुट्ठी भर लोगों का देश ब्रिटेन, जिसके लड़ कर बनाए साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था। इसी तरह फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों का इतिहास है, जो भीषण तबाही के गवाह हैं। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि युद्ध इस कारण से नहीं लड़ा जाता कि कोई मजबूरी है, बल्कि इसलिए कि किसी भूभाग पर कब्जा कर सीमाओं का विस्तार करना है, किसी को नेस्तनाबूद करने की नीयत है या उसे काबू में रखना है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं अपना महत्व खोती जा रही हैं और लगभग कागजी बन गई हैं। जो ताकत थी, अब वही कमजोरी बनती जा रही है। वीटो पावर से वे अपने-अपने हितों के अनुसार किसी भी कार्रवाई को रोक सकते हैं। नतीजा यह कि जब कुछ करने की जरूरत सब से ज्यादा होती है, तो उसमें ही सबसे अधिक गतिरोध या रुकावट पैदा कर दी जाती है। युद्ध ही एकमात्र विकल्प रहने जैसा वातावरण बना दिया जाता है, वरना इस बात में क्या तुक है कि ईरान अगर परमाणु संपन्न देशों की पंक्ति में आ गया तो वह बम फोड़ेगा ही, इसलिए इसे बर्बाद कर दो। ताकतवर होने का अर्थ यह नहीं कि सोच में किसी का विनाश करने की बात आ गई तो लाव-लश्कर के साथ उसका अंत करने निकल पड़े और वह भी इसलिए कि आप अपने को दुनिया का सबसे महान शासक समझते हैं।
एक नई सोच की शुरुआत हो : अपील या निंदा से युद्ध नहीं रुक सकते, इसलिए किसी ऐसी संस्था का होना जरूरी है जो केवल सलाह नहीं बल्कि अंतिम आदेश दे सके कि युद्ध रोक देने का मतलब उसका रुकना ही है। इस संगठन में 5 नहीं, बल्कि सभी बड़े और मध्यम आकार के देशों के प्रतिनिधि शामिल हों। वीटो जैसा एकतरफा अधिकार न होकर एक ऐसा संतुलित, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित निर्णय हो, जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार बाध्यकारी हो और उसके न मानने का परिणाम सभी देशों द्वारा उस देश का सामूहिक बहिष्कार हो, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली और साधन-संपन्न क्यों न हो। किसी के भी द्वारा उल्लंघन करने का आरोप सिद्ध होने पर आर्थिक या जो भी उचित हो, वह दंड दिए जाने का प्रावधान हो। यह संस्था इतनी सशक्त हो कि अपने वैश्विक स्वरूप, आकार और स्वतंत्र अस्तित्व के कारण जो भी निर्णय ले, वह सभी को मानना ही पड़ेगा। कह सकते हैं कि कोई शक्ति संपन्न देश क्यों इस व्यवस्था को अंगीकार करने के लिए तैयार होगा क्योंकि वह इस नशे में रहता है कि वह नियम बनाता है, किसी दूसरे के बनाए नियमों पर चलने का उसका स्वभाव नहीं है। इसका जवाब यह है कि यह संस्था कोई संवाद मंच नहीं बल्कि ऐसा वैश्विक संगठन होगा जिसके निर्णय सामूहिक और बाध्यकारी हों। इस संस्था का परिचालन सभी सदस्य देशों के आर्थिक अनुदान से होगा, इसलिए कोई एक देश इसका सर्वेसर्वा न होकर सभी सदस्य देश होंगे।
युद्ध न करने की सोच बनेगी : इस प्रकार का संगठन यदि किसी भी प्रकार से संभव हो जाए तो यह एक प्रकार से वैश्विक सोच में परिवर्तन होगा। इसका प्रमुख कारण यह है कि आज कोई भी युद्ध केवल 2 देशों के बीच नहीं होता, बल्कि उसका असर सारी दुनिया, पूरी मानवता पर पड़ता है। यह शक्ति बनाम शांति है जो किसी भी कीमत पर स्थापित हो तो वह सस्ती होगी। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज युद्ध सैनिकों या सीमाओं में रहकर नहीं, बल्कि डाटा, साइबर हमले और आॢटफिशियल इंटैलीजैंस के जरिए लड़ा जाता है। यदि ऐसी किसी संस्था की स्थापना होती है तो यह वैज्ञानिक सोच और तकनीक के अनुसार होगी। इसकी सफलता स्वयंसिद्ध होगी क्योंकि 2 या अधिक देशों के मध्य सशस्त्र संघर्ष की संभावना होते ही स्वचालित हस्तक्षेप प्रणाली या ऑटोमैटिक इंटरफेयरिंग प्रोटोकॉल लागू हो जाएगा। यहां तक भी संभव है कि यदि कोई पक्ष अडिय़ल रवैया अपनाए तो उसके आधुनिकतम हथियारों का प्रक्षेपण रोका जा सकेगा। यह क्षमता ए.आई. संचालित होने और सब कुछ डिजिटल और डाटा नियंत्रित होने से कोई भी देश कितना भी शक्तिशाली हो, हमला करने में सफल नहीं हो सकेगा। यह एक नए युग में प्रवेश करने का संकेत होगा जिसमें युद्ध को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाने की जरूरत नहीं रहेगी।-पूरन चंद सरीन
