उपभोक्ता आन्दोलन की 40 वर्ष की यात्रा, कितनी न्यायकारी
punjabkesari.in Friday, Feb 13, 2026 - 03:51 AM (IST)
उपभोक्ता आन्दोलन का सूत्रपात 1986 में बने उपभोक्ता संरक्षण कानून के द्वारा हुआ, जिसमें उपभोक्ताओं के प्रति बऱती गई लापरवाहियों, जैसे खराब वस्तुओं की बिक्री या सेवाओं में किसी भी प्रकार की लापरवाही की जांच करके यथोचित आदेश पारित करने के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर न्यायालयों के गठन के लिए मार्ग प्रशस्त किए गए। वर्ष 2019 में इस कानून में अनेकों बदलाव भी लाए गए, किन्तु आज यदि 40 साल की इस उपभोक्ता संरक्षण यात्रा का आकलन करें तो ऐसा लगता है कि न्याय मांगने वालों को शीघ्र न्याय में विलम्ब तो देश के सामान्य न्याय व्यवस्था की तरह ही झेलना पड़ रहा है, जबकि दूसरी तरफ देशवासियों की बहुत बड़ी संख्या तो अभी तक अपने इस बहुमूल्य अधिकार के बारे में अंजान ही दिखाई देती है। इसलिए सबसे पहले तो उपभोक्ता संरक्षण अधिकार के प्रति अज्ञानता की इस मूल कमी को दूर करने के लिए इसे शिक्षा व्यवस्था के साथ जोड़ा जाना चाहिए। राजनीति विज्ञान में तो यह एक अच्छा विषय बनाया जा सकता है, बल्कि हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी, उर्दू सहित देश की सभी भाषाओं की पुस्तकों में मैट्रिक और इंटर स्तर पर भी कुछ न कुछ पाठ जोड़े जा सकते हैं। जब तक ऐसे पाठ्यक्रम सम्भव न हों, तब तक विद्यालयों में गोष्ठियों या नुक्कड़ नाटकों की तरह जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं। देश के गैर-सरकारी सामाजिक और धार्मिक संगठनों को भी ऐसे अभियानों में शामिल किया जा सकता है।
उपभोक्ता अदालतों के माध्यम से जो उपभोक्ता संरक्षण अभियान तीव्र गति से चलना चाहिए था, वह भी आज दिखाई नहीं दे रहा। कहने को उपभोक्ता अदालत व्यवस्था इस रूप में गठित की गई थी कि जिसमें एक सामान्य शिकायत पत्र पर कार्रवाई सम्भव हो सकती थी, परन्तु यहां भी सामान्य अदालतों की तरह छोटी सी राशि वाले मामले में भी वकील करना पड़ता है, मुकद्दमा तैयार होता है, दस्तावेज लगाए जाते हैं, फिर गवाहों की उपस्थिति से याचिका के तथ्यों को सिद्ध करना पड़ता है और अन्त में वकीलों की बहस और फिर आदेश की प्रतीक्षा। इतना ही नहीं, तीन स्तर की अपील पद्धति शिकायतकत्र्ता के लिए आशा के स्थान पर निराशा, थोड़ी सी राशि का दावा करने के स्थान पर उससे अधिक राशियां इस अदालत व्यवस्था की भेंट चढ़ाना और पल भर के निर्णय के स्थान पर दिन, महीने, साल यूं गुजरते जाएंगे तथा तारीख पर तारीख जैसे डायलाग उपभोक्ता अदालतों पर भी बोले जाते हैं।
सामान्यत: उपभोक्ताओं की शिकायत किसी घरेलू वस्तु या सेवा से सम्बंधित होती है। ऐसी छोटी-छोटी शिकायतों के निरीक्षण, परीक्षण में सामान्य विवेक का इस्तेमाल करते हुए भी शीघ्र निर्णय सम्भव है। एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को कुछ राशि का भुगतान करने के लिए चैक जारी किया। दूसरे व्यक्ति ने वह चैक अपने बैंक में जमा करवा दिया। बैंक द्वारा राशि प्राप्त होने पर वह राशि किसी गलत खाते में जमा कर दी गई। अब ऐसी सामान्य त्रुटि वाली शिकायत पर किस चीज का गम्भीर या गहरा परीक्षण किया जाना है। शिकायत के साथ व्यक्ति चैक जमा कराने की कॉपी और जिस बैंक से राशि निकली, उसका प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर देता है तो ऐसे मामलों में सारी अदालती प्रक्रिया को लम्बी अवधि की तारीखों के साथ निपटाने में यदि 1-2 वर्ष लग जाते हैं तो स्पष्ट प्रतीत होता है कि उपभोक्ता न्याय प्रणाली में विवेकशीलता या गतिशीलता का तो कोई स्थान ही नहीं है। सामान्य अदालतों की तरह अब उपभोक्ता अदालतों में भी ई-फाईलिंग अर्थात याचिका और सभी दस्तावेजों को पी.डी.एफ. के रूप में अदालतों के निर्धारित काऊंटर पर फाईल करना और इसी प्रक्रिया का अनुसरण जवाब, गवाहियां और लिखित बहस तक किया जाना किसी भी दृष्टि से उपभोक्ता संरक्षण अभियान को एक जन आन्दोलन बनने में सहायता नहीं कर सकता। सूचना के अधिकार ने भी एक आन्दोलन की तरह कानून का रूप लिया था।
नि:संदेह यह अभियान तीव्र गति से चल रहा है। हाथ से लिखकर किसी भी विभाग को सूचना उपलब्ध कराने के लिए प्रार्थना पत्र दिया जा सकता है। सामान्यत: 30 दिन के अन्दर उत्तर भी आ ही जाता है। संतोषजनक उत्तर न होने पर अपील भी हस्तलिखित दी जा सकती है और उसका निपटारा भी शीघ्र होता है। दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्रीय सूचना आयोग भी इसी प्रकार यथा सम्भव तीव्र गति और अनौपचारिक प्रक्रिया का पालन कर रहा है। मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि केन्द्रीय सूचना आयोग में सुनवाई के लिए 15-15 मिनट के स्लैब निर्धारित किए जाते हैं, जिससे पक्षकारों का समय व्यर्थ नहीं होता। वकील के माध्यम से बहस करो या पक्षकार स्वयं बहस करे। बहस किसी भी भाषा में की जा सकती है और यहां तक कि आवश्यकता पडऩे पर लिखित बहस के रूप में हाथ से ही संक्षिप्त बिन्दू लिखकर अदालत को दे दिए गए। उपभोक्ता आन्दोलन को भी सूचना के अधिकार जैसी पद्धति अपनानी चाहिए। इसके लिए आवश्यक नहीं कि सरकारें बार-बार कानूनों में संशोधन करें या अनुशासन की किसी कड़ी प्रक्रिया को लागू करें। वास्तव में उपभोक्ता अदालतों के न्यायाधीशों को स्वयं ही अपने अन्दर यह विवेक जागृत करना चाहिए कि जो आदमी अपने उपभोक्ता के अधिकार को कुछ हजार रुपए के रूप में लागू करवाना चाहता है, उसे उस अधिकार की राशि से अधिक राशि और लम्बा समय खर्च करना तो अपने आप में ही एक गम्भीर अन्याय है। औपचारिक अदालती प्रक्रियाओं को शीघ्रातिशीघ्र सम्पन्न करके सीधा याचिकाकत्र्ता से सम्वाद स्थापित करके उपभोक्ता आन्दोलन को वास्तव में न्यायकारी बनाया जा सकता है।-अविनाश राय खन्ना(पूर्व सांसद)
