Kundli Tv- युगल सरकार के सिंहासन का दर्शन करना है तो जाएं इस धाम

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चित्रकूट धाम की इतनी महिमा है कि इसके दर्शनमात्र से सभी निराशा, उदासी, विपदाओं तथा दुखों का हरण हो जाता है और दुखों के अंत हो जाने से प्रभु श्रीराम की कृपा से आनंद का अनुभव होने लगता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-


कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।
भगवान के भक्त, संत, महात्मा, सिद्ध, मुनि, योगीजन तथा भगवत्प्रेमी जिन स्थानों में निवास करते हैं अथवा प्रवेश करते हैं, वह भूमि तीर्थ बन जाती है- ‘तीर्थी कुर्वन्ति तीर्थानि।’ उनके चरणों की धूल से वहां की भूमि परम पावन बन जाती है और उनकी साधना से स्वर्ग जैसा वातावरण बन जाता है इसीलिए तीर्थों पर जाने की बहुत बड़ी महिमा शास्त्रों में बताई गई है। पू. संत दास जी महाराज भी कहते हैं-
सिध उधारे देह आपणी, साध उधारे देश। भौम पवितर संतदास जहां सत चरण परवेश।।

अर्थात जहां संत विराजते हैं, प्रवेश करते हैं वह भूमि पवित्र हो जाती है। चित्रकूट सदा से तपोभूमि रही है। वहां अत्रि मुनि का आश्रम था तथा बहुत से ऋषि-मुनि वहां रहते थे। इनमें महर्षि अत्रि सबसे श्रेष्ठ थे। यह भूमि महापुरुषों के चरणों की धूली से पवित्र है। तुलसीदास जी कहते हैं-
जहां बनु पावनो सुहावने बिहंग-मृग, देखि अति लागत अनंदु खेत-खूंट-सो।

सीता-राम-लखन-निवासु, बासु मुनिनको, सिद्ध-साधु-साधक सबै बिबेक-बूट-सो।।  (कवितावली 7/ 141)
जहां का वन अति पवित्र है और पशु-पक्षी बहुत सुहावने हैं तथा जिसे खेत के टुकड़े के समान हरा-भरा देखकर बड़ा आनंद होता है, जहां सीता, राम और लक्ष्मण का निवास था, जहां अनेक मुनिजन रहते हैं, जो सिद्ध, साधु और साधकों के लिए विवेक रूपी वृक्ष के समान है। कामदगिरि युगल सरकार का सिंहासन माना जाता है और उनका निवास स्थान होने  के कारण संसार भर के तीर्थ इसी के पास आकर बस गए हैं। भक्तों का विश्वास है कि अब भी भगवान यहीं विराजमान हैं-

चित्रकूट सब दिन बसत, प्रभु सिय लखन समेत।।
चित्रकूट की स्तुति का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी ने लिखा है-
सब सोच-बिमोचन चित्रकूट। कलिहरन, करन कल्याण बूट।।  (विनय-पत्रिका 23)


चित्रकूट सब तरह के शोकों से छुड़ाने वाला है। यह कलियुग का नाश करने वाला और कल्याण करने वाला हरा-भरा वृक्ष है। गोस्वामी तुलसी दास जी चित्रकूट जाने के लिए आतुर हैं-
अब चित्त चेति चित्रकूटहि चलु। (विनय-पत्रिका-24)

चित्रकूट जो कामतानाथ पर्वत है, वह हर इच्छा पूरी करने वाला चिंतामणि और कल्पवृक्ष है, जो युग-युग से पृथ्वी पर जगमगाता है। यूं तो चित्रकूट सभी के लिए सुखदायक है परन्तु हे तुलसीदास! तुझे तो विशेष रूप से उसी के विश्वास, प्रेम और बल पर निर्भर रहना चाहिए। चित्रकूट महिमा का जितना वर्णन किया जाए कम है-
देखत चित्रकूट-बन मन अति होत हुलास। सीता-राम-लखन-प्रिय, तापस-बूंद-निवास।। (गीतावली 2/47)

जो सीताराम और लक्ष्मण को बहुत प्रिय तथा तपस्वियों का निवास स्थान है, उस चित्रकूट वन को देखकर मन में बड़ा आनंद होता है। वहां बड़ी ही सुहावनी, पवित्रकारिणी एवं पापनाशिनी पयस्विनी नाम की नदी है जो सिद्ध, साधु और देवताओं से सेवित हैं और सभी मनोकामनाओं को पूरा कर देती है। कलियुग ने सारे संसार पर अपना जाल बिठा दिया है पर प्रभु की कृपा से चित्रकूट उससे मुक्त है।
यावता चित्रकूटस्य नर: शृङ्गण्यवेक्षते। कल्याणानि समाधत्ते न पापे कुरुते मन:।। (वा.रा.2/54/30)

अर्थात
जब मनुष्य चित्रकूट के शिखरों का दर्शन कर लेता है तब कल्याणकारी पुण्य कर्मों का फल पा लेता है और कभी पाप में मन नहीं लगता है। उदयाचल, अस्ताचल, मंदराचल, सुमेरू तथा हिमालय आदि श्रेष्ठ पर्वत जो देवताओं के रहने के स्थान हैं, वे भी चित्रकूट का यशोगान करते हैं-

उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।। सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहि तेते। (रा.च.मा. 2/138/6-7)
यहां ब्रह्मा, विष्णु, महेश-तीनों महाप्रभुओं को एक साथ (चंद्रमा, प्रभु दत्तात्रेय तथा दुर्वासा के रूप में) जन्म ग्रहण करना पड़ा था। यहां प्रवेश करते ही नल एवं युधिष्ठिर आदि का घोर क्लेश मिट गया था।

अनेक शास्त्रों में त्रिकूट का बहुत बड़ा महत्व सुंदर शब्दों में किया गया है। यह भगवान श्रीराम की नित्य-क्रीड़ाभूमि है। यहां भगवान राम सदा निवास करते हैं। यहां तपस्वी, भगवद्भक्त, विरक्त महापुरुष हमेशा से रहे हैं। यहां की कामदगिरि पहाड़ी पवित्र मानी जाती है। इस पर ऊपर नहीं चढ़ा जाता है। इस की परिक्रमा की जाती है। चित्रकूट के आस-पास अनेक तीर्थ हैं।
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