सांझ का टिमटिमाता दीया और ‘पच्छम के छराटे’

बाबा चमलियाल का नाम सरहद के आर-पार गूंजता है। जितने श्रद्धालु भारत की ओर बाबा जी का गुणगान और उन्हें सजदा करने वाले हैं, उतने ही पाकिस्तान की ओर भी हैं। बाबा जी की दरगाह सरहद के बिल्कुल किनारे पर स्थित है, जहां सीमा सुरक्षा बल (बी.एस.एफ.) की एक पक्की पोस्ट भी बनी हुई है। महीने में एक बार यहां श्रद्धालु बड़ी गिनती में जुटते हैं, जबकि इक्का-दुक्का तो रोज ही आते हैं। 

वर्ष में एक बार बहुत बड़ा मेला भी लगता है जब हजारों की संख्या में लोग नतमस्तक होते हैं। इस दरगाह को देखने का अवसर तब मिला जब 497वें  ट्रक की सामग्री बांटने के लिए ‘पंजाब केसरी’ की राहत टीम आर.एस. पुरा सैक्टर में गई थी। हैरानी की बात यह है कि चमलियाल की तरह ही बाबा जी की एक दरगाह पाकिस्तान के गांव सैदांवाली में बनी हुई है। दोनों दरगाहों पर एक ही दिन मेला लगता है। चमलियाल वाली दरगाह की महानता यह है कि यहां एक कुआं बना हुआ है जिसके पानी को ‘शरबत’ कहा जाता है। यह जल अत्यंत निर्मल, शुद्ध तथा पीने में मीठा है। इस स्थान की मिट्टी को ‘शक्कर’ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस ‘शक्कर’ का लेप शरीर पर करने तथा ‘शरबत’ पीने से कई तरह के रोग समाप्त हो जाते हैं। 

चमलियाल वाली दरगाह से ‘शरबत’ तथा ‘शक्कर’ प्राप्त करने पाकिस्तान के लोग भी आते हैं। पहले शायद वे खुद ही दरगाह तक पहुंच जाते थे लेकिन अब उनको ‘जीरो लाइन’ पर रोक दिया जाता है और भारतीय सुरक्षा अधिकारियों की निगरानी में उन तक बाबा जी का ‘आशीर्वाद’ पहुंचाया जाता है। पाकिस्तान के श्रद्धालुओं द्वारा दरगाह पर चढ़ाने के लिए लाई गई ‘चादरें’ भी भारतीय अधिकारी ही प्राप्त करते हैं। 

दरगाह का इतिहास : बाबा जी के संबंध में स्थानीय लोगों सेे मिली जानकारी के अनुसार उनका पूरा नाम बाबा दलीप सिंह था, जोकि चमलियाल वाले स्थान पर ही रहते थे। बाबा जी महान तपस्वी तथा प्रभु भक्ति के रंग में रंगे हुए थे, जिनके श्रद्धालुओं की बहुत बड़ी संख्या थी। कहा जाता है कि उनके आशीर्वाद से लोगों की मुरादें पूरी होती थीं। 

बाबा जी से ईष्र्या करने वाले कुछ लोगों ने उनको धोखे से सैदांवाली बुलाया जो चमलियाल से थोड़ी दूर स्थित है। ईष्र्यालु लोगों ने बाबा जी का सिर कलम कर दिया जो वहीं गिर पड़ा, जबकि ‘धड़’ चमत्कारिक ढंग से चमलियाल वाले स्थान पर पहुंच गया। श्रद्धालुओं ने दोनों गांवों में बाबा जी की दरगाहें बना दीं। सैदांवाली अब पाकिस्तान की ओर है। चमलियाल दरगाह पर हर समय एक दीया जलता रहता है, जो दोनों देशों के श्रद्धालुओं की सांझ का संदेश देता लगता है। यह सांझ कई दशकों से चली आ रही है और तब से ही इस मेले के प्रति सरहद के आर-पार बड़ा उत्साह बना रहा है। 

पाकिस्तान ने पहुंचाई ठेस :बाबा जी के प्रति दोनों देशों के श्रद्धालुओं में बनी श्रद्धा को पाकिस्तान द्वारा दरगाह क्षेत्र पर फायरिंग करके ठेस पहुंचाई गई थी। एक अधिकारी ने बताया कि चमलियाल वाले क्षेत्र पर पाकिस्तानी सैनिकों ने पहले कभी फायरिंग नहीं की थी, जिस कारण उधर से आने वाले श्रद्धालुओं के साथ पूरा सहयोग किया जाता था। एक वर्ष पूर्व पाकिस्तान ने एक घिनौनी हरकत करते हुए इस क्षेत्र की ओर भी गोले दाग दिए, जिस कारण अपनी ड्यूटी पर जा रहे 4 सुरक्षा कर्मी शहीद हो गए। 

उन्होंने बताया कि इस बार चमलियाल मेले पर आए पाकिस्तानी श्रद्धालुओं को ‘शक्कर’ तथा ‘शरबत’ के प्रसाद के बिना ही वापस लौटना पड़ा। इस तरह पाकिस्तान द्वारा की गई गोलीबारी का खमियाजा किसी हद तक वहां के लोगों को भी भुगतना पड़ा। उक्त घटना के पश्चात दरगाह तथा क्षेत्र के अन्य गांवों की सुरक्षा के लिए कड़े प्रबंध किए गए हैं ताकि इस ओर से श्रद्धालुओं को किसी तरह की मुश्किल न हो। 

गोलियों से बिंधी दीवारें :सुचेतगढ़ एक ऐसा गांव है जिसके पश्चिम की ओर पाकिस्तान की सरहद है। सरहद के किनारे ऐसे बहुत से गांव होंगे लेकिन सुचेतगढ़ की हालत ऐसी है कि उसके अधिकतर घरों की दीवारें गोलियों से बिंधी पड़ी हैं। इस गांव में पाकिस्तानी गोलियों के छराटे (बौछार) के  कारण जानी नुक्सान भी हुआ तथा दर्जनों लोग गम्भीर रूप से घायल हुए। गांव के एक व्यक्ति ने बताया कि पिछले वर्ष मोर्टार लगने से एक भैंस मर गई थी तथा कई अन्य पशु घायल हुए। किसानों के लिए न सिर्फ खेतों में काम करना मुश्किल है बल्कि कई बार तो अपने जानवरों के लिए चारा लाने का संकट भी पैदा हो जाता है। 

किसानों ने बताया कि खेतों में फसलों को पानी लगाना एक बड़ी समस्या है। तार-बाड़ के अंदर स्थित खेतों तक पानी ले जाने के लिए जो पुलियां बनी हुई हैं या पाइपें दबाई गई हैं, सुरक्षा के मद्देनजर उनको भी तारों के जाल से बंद कर दिया गया है। सुरक्षा अधिकारियों की स्वीकृति के बिना उन्हें छूना भी मना है। उन्होंने बताया कि सुचेतगढ़ का गत वर्षों में बहुत अधिक माली नुक्सान हुआ है। 

महबूबा के वायदे वफा न हुए :जब महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने सुचेतगढ़ के घायल लोगों तथा नुक्सान उठाने वाले लोगों को मुआवजा दिलाने का भरोसा दिया था, मगर महबूबा के ये वायदे आज तक पूरे नहीं हुए, जबकि अब गांववासी निराश होकर बैठ गए हैं क्योंकि सरकारी अधिकारियों की ओर से इस संबंध में कोई हामी नहीं भरी जा रही। 

सुचेतगढ़ चैक पोस्ट : सुचेतगढ़ गांव के बाहर सरहद पर चैक पोस्ट बनी हुई है जो जम्मू से वाया मीरा साहिब, आर.एस. पुरा तथा सुचेतगढ़ से स्यालकोट (पाकिस्तान) को जाने वाली सड़क पर स्थित है। इस रास्ते से अब सामान्य आवागमन बंद कर दिया गया है जबकि यू.एन. के अधिकारी आ-जा सकते हैं। कभी-कभार दोनों देशों के सुरक्षा अधिकारियों की बैठक भी इस रास्ते होती है। 

देश के विभाजन से पूर्व यह पोस्ट एक तरह से चुंगी के तौर पर ही जानी जाती थी, जहां से गुजरने वाले सामान या व्यापारिक वस्तुओं पर टैक्स वसूला जाता था। उस समय इस रास्ते से बसों तथा रेलों की आवाजाही भी होती थी। इस रास्ते पर रेल लाइन अंग्रेजों द्वारा 1890 में बिछाई गई थी। कहा जाता है कि जम्मू क्षेत्र की यह पहली रेल पटरी थी जिस पर रोज चार यात्री गाडिय़ां चलती थीं। विभाजन के बाद इस रेल लाइन को बंद कर दिया गया तथा भारत की ओर तो इसका कहीं नामोनिशान नहीं है। 

पुराने जम्मू में स्थित रेलवे स्टेशन को गिराकर वहां म्यूजियम बना दिया गया है, जबकि पाकिस्तान की ओर स्यालकोट से आगे इस पटरी पर रेल सेवा आज भी जारी है। हालांकि चैक पोस्ट वाले स्थान को भारत सरकार द्वारा पर्यटकों के लिए विकसित किया गया है और सरहद को देखने के लिए रोज बड़ी संख्या में लोग पहुंचते भी  हैं, इसके बावजूद सुविधाओं की बड़ी कमी खलती है।-जोगिन्द्र संधू

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