Kundli Tv- मइया के इस धाम दर्शन के लिए आज भी आते हैं आल्हा

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नवरात्र के दिनों में देश के समस्त दुर्गा मंदिरों में भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है साल में आने वाले चैत्र और शारदीय नवरात्र का समय बहुत ही शुभ माना जाता है। इसके अनुसार नवरात्र के नौ दिनों में देवी दुर्गा अपने भक्तों से बेहद प्रसन्न रहती हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। तो आइए शारदीय नवरात्र के इस खास मौके पर हम आपको एक एेसे मंदिर के बारे में बताते हैं, जो मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर के त्रिकूट पर्वत पर स्थापित हैं।


मैहर में त्रिकूट पर्वत माला पर विराजमान मां शारदा देवी मंदिर में सरस्वती पीठ स्थापित है। कहा जाता है कि यह पीठ सतयुग के प्रमुख अवतार नृसिंह भगवान के नाम पर 'नरसिंह पीठ' के नाम से भी विख्यात है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर आल्हखण्ड के नायक आल्हा व ऊदल दोनों भाई मां शारदा के बहुत बड़े भक्त थे। पर्वत की तलहटी में आल्हा का तालाब व अखाड़ा आज भी विद्यमान है।

यहां प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं किंतु वर्ष में दोनों नवरात्रों में यहां मेला लगता है जिसमें लाखों यात्रि मैहर आते हैं। मां शारदा के साथ स्थापित नृसिंह देव की पाषाण प्रतिमा आज से लगभग 1500 वर्ष पूर्व की है। देवी शारदा का यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ स्थल देश के लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है।

यह प्राचीन मंदिर समुद्र तल से करीब 1,200 फीट ऊंचाई पर त्रिकूट पर्वत पर स्थित है, जहां देवी मां शारदा विराजमान हैं। इनके दर्शन के लिए यहां देशभर से श्रद्धालु आते हैं। देवी के भक्त सुबह से ही 1,000 सीढ़ियों के सहारे चढ़कर मंदिर में दर्शन करने के लिए लाइनों में खड़े हो जाते हैं। यहां पर कई रोप-वे की भी सुविधा उपलब्ध है। इसके सहारे शरीर से असहाय श्रद्धालु भी देवी के दर्शन के लिए आसानी से पहुंच जाते हैं।

शक्तिपीठ
मान्यता के अनुसार माता सती के शरीर के हिस्से और धारण किए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्ति पीठ अस्तित्व में आ गए। शक्तिपीठों की संख्या विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग बताई गई है। तंत्र चूड़ामणि में शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गई है तो वहीं देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का उल्लेख है, देवीगीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है और देवीपुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। परम्परागत रूप से भी देवी भक्तों और साधुजनों में 51 शक्तिपीठों की विशेष मान्यता है।

कहा जाता है कि जब भगवान शिव मृत देवी मां के शरीर को ले जा रहे थे, उनका हार इस जगह पर गिर गया और इसलिए इस जगह का नाम मैहर यानि मैहर- माई का हार पड़ गया। कुछ अन्यों किवंदतियों के अनुसार यहां मां भगवती सती का उर्ध्व ओष्ठ गिरा था।
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