गम्भीर बन चुकी है आवारा पशुओं की समस्या

बाढ़,भूकम्प, सूखे तथा सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य हजारों सालों से जूझता आ रहा है। इन पर काबू पाने के लिए मनुष्य के प्रयास बेशक जारी हैं, मगर अभी भी प्रकृति के कहर के आगे मनुष्य बेबस होकर रह जाता है। कई मुश्किलें ऐसी हैं जो मनुष्यों ने खुद पैदा की हैं। आवारा पशुओं की बढ़ रही समस्या ऐसा ही एक संकट है जो लगातार बढ़ता जा रहा है। सड़कों, बाजारों, गलियों, खेतों में घूम रहे आवारा पशुओं के कारण हर रोज बेकसूर कीमती मानवीय जिंदगियां मौत के मुंह में जा रही हैं और बेटों से भी अधिक प्यारी किसानों की फसलें अनचाहे आवारा पशुओं की भेंट चढ़ जाती हैं। 

जब आवारा पशु कारों, मोटरसाइकिलों, बसों आदि से टकरा कर दुर्घटनाओं को जन्म देते हैं या तेज रफ्तार वाहन सड़क पर आवारा पशु को बचाते हुए किसी दूसरे वाहन या व्यक्ति से भिड़ जाता है तो भरे-पूरे परिवारों में मातम छा जाता है। यदि यही पशु किसान के खेतों में तशरीफ ले जाएं तो फिर फसल काटने के लिए किसी कम्बाइन की जरूरत नहीं पड़ती। 

आवारा पशु बने जानलेवा
अब तो हालत यहां तक पहुंच गई है कि मस्ते हुए आवारा पशु बच्चों सहित पैदल जा रहे लोगों को भी नहीं बख्शते। पहले से चल रही आवारा कुत्तों की समस्या को पिछले कुछ समय से आवारा पशुओं ने और अधिक गम्भीर व जानलेवा बना दिया है। ये आवारा पशु, जिनमें अधिकतर बूढ़ी, बीमार तथा दूध न देने वाली गऊएं तथा सांड होते हैं, खेतीबाड़ी के काबिल भी नहीं होते। रेहड़ा खींचने, भार ढोने जैसे अन्य कार्यों के लिए भी इनका इस्तेमाल नहीं किया जाता। ये केवल खाते ही हैं। हरा चारा, लोगों द्वारा डाली गई सूखी रोटियां, गलियों तथा बाजारों के गंदे लिफाफे, अन्य गंदी चीजें, जो भी मिले भूख की मजबूरी के कारण ये सब कुछ चट कर जाते हैं। जरूरत अनुसार पौष्टिक खुराक न मिलने के कारण इनका जीवन तरसयोग्य तथा मरना उससे भी डरावना है। कई बार दुकानदारों, रेहडिय़ों पर सब्जियां-फल बेचने वालों तथा किसानों को पशुओं से बचने के लिए मजबूरन लाठियों का इस्तेमाल करना पड़ता है। खेतों की रक्षा के लिए बहुत से किसानों ने निजी तौर पर

या गांव के समूह लोगों द्वारा वेतन पर पहरेदार रखे हुए हैं, जो आवारा पशुओं को एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे गांवों तथा कस्बों की ओर भगाने का काम करते हैं। इन पशुओं के प्रश्र पर कई बार आपसी झगड़े भी हो जाते हैं। 

‘गौरक्षा’ का बहाना
जब से केन्द्र तथा कई राज्यों में भाजपा सरकारें अस्तित्व में आई हैं तब से ‘गौरक्षा’ के बहाने जहां आवारा पशुओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, वहीं ‘गौहत्या’ के नाम पर तथाकथित ‘गौरक्षकों’ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) से जुड़े अन्य संगठनों द्वारा मुसलमानों, दलितों तथा आदिवासियों पर हमलों की गिनती खतरनाक हद तक पहुंच गई है। भीड़ तंत्र समाज में आम प्रवृत्ति बनती जा रही है। विश्व में, विशेषकर प्रगतिशील देशों में आवारा पशु नाम की समस्या का जिक्र करना भी हास्य का पात्र बनना है मगर आजकल भारत में यदि गऊ तथा इंसान की हत्या के संदिग्ध दोषियों में से अधिक कसूरवार ठहराने का सबब बन जाए तो ‘गऊ हत्या’ का दोषी अधिक खतरनाक समझा जाता है। 

आवारा पशुओं की सेवा-सम्भाल के लिए सरकार अथवा समाजसेवी/ धार्मिक संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही गौशालाएं, कांजी हाऊस आदि में से अधिकतर में पशुओं की हालत अत्यंत दयनीय है। आवश्यक खुराक, दवा तथा सफाई की कमी के कारण बड़ी संख्या में पशु मर जाते हैं। हालांकि इन संस्थाओं का संचालन करने वाले लोगों पर टैक्स भी लगाए गए हैं। 

बेशक हिन्दू धर्म में गऊ को आदर से देखा जाता है। गैर-हिन्दुओं द्वारा भी गऊओं से मिलने वाले अमृत रूपी दूध तथा उनके शावकों का कृषि व ढुलाई में इस्तेमाल करने के कारण इन्हें ‘गौधन’ के नाम से पुकारा जाता है। प्रश्र किसी की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है लेकिन यदि धार्मिक आस्था के परिणामस्वरूप आवारा पशु लोगों के लिए जानलेवा बन जाएं, किसानों की बेटों जैसी फसलें चट कर जाएं तो निश्चित तौर पर आवारा पशुओं के मुकाबले इंसानों की कीमती जानों की रक्षा की जानी चाहिए। जो कारण इंसान की मौत की वजह बनता हो उसको कभी भी ‘पुण्य’, ‘शुभ कार्य’ या परमात्मा को खुश करने वाली ‘मन्नत’ नहीं कहा जा सकता। 

समाज तथा सरकारों की जिम्मेदारी
यह जिम्मेदारी सरकारों तथा सारे समाज की है कि वे आवारा पशुओं के कहर से आम लोगों को बचाएं। इनकी सेवा-सम्भाल के लिए पूरी व्यवस्था की जाए या किसी भी ढंग से सामान्य लोगों को आवारा घूमते पशुओं से छुटकारा दिलाया जाए। सम्भालने वाले पशुओं में से उन पशुओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो दूध देने योग्य हों अथवा आगे अपनी वंश वृद्धि करने में सक्षम हों। इसके अतिरिक्त यदि आवारा पशुओं को खेतीबाड़ी से जुड़े या ढुलाई जैसे अन्य कार्यों में इस्तेमाल किया जा सके तो उनकी देखभाल की जानी चाहिए। एक ऐसे देश में जहां हर वर्ष हजारों लोग भूख से मरते हों, गरीब के लिए घर के गुजारे हेतु पालतू पशुओं के लिए चारा मोल लेना भी मुश्किल हो, वहां बड़ी संख्या में अनावश्यक आवारा पशुओं की हरे चारे से पेट भरने की व्यवस्था करना हवाई बातें करने के समान है। 

यदि गऊओं की तरह अन्य आवारा पशुओं तथा जानवरों को भी बाजारों तथा खेतों में घूमने की छूट मिल जाए तो समाज का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। आवारा पशुओं से छुटकारा पाने के उपाय को किसी भी धर्म या धार्मिक आस्था से नहीं जोडऩा चाहिए और न ही ऐसे मुद्दों पर वोटों की राजनीति की जानी चाहिए। बेवजह जंगलों की कटाई के कारण जंगली जानवरों (जैसे हाथी, शेर, बंदर, चीते आदि) द्वारा रिहायशी क्षेत्रों में आकर लोगों पर हमले करना तथा रेल पटरियों पर ट्रेन से कट कर मरने की घटनाएं पहले ही सभी की ङ्क्षचता का विषय बनी हुई हैं। इन चिंताओं, जो मनुष्य ने खुद पैदा की हैं, को हल करने की जरूरत है। कम से कम आवारा पशु तथा कुत्ते तो लोगों के लिए जानलेवा साबित न हों। हमारी सरकारों का स्वभाव मुसीबत आने पर ही जागने का बन गया है। यही हालत आवारा पशुओं के मामले में भी है। समाज के सांझे जख्मों को धर्मों या आस्था के चश्मे से देखने की बजाय पीड़ा महसूस करने की जरूरत है।-मंगत राम पासला

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