पं. डोगरा की बात मानते तो नहीं होती कश्मीर समस्या

दूरदर्शी सोच रखने वाले महान व्यक्तित्व पंडित प्रेमनाथ डोगरा की आज 47वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है। उनकी बातों पर अगर ध्यान दिया जाता तो कश्मीर जैसी जटिल समस्या उत्पन्न ही न होती किन्तु विडम्बना ही है कि उस समय के सत्ताधारियों ने उन्हीं को क्रूरता का निशाना बना डाला। उन पर कई तरह के मनघढ़ंत आरोप लगाए गए किन्तु वह एक चट्टान की भांति अपने दृष्टिकोण पर स्थिर रहे।

पंडित डोगरा का मानना था कि सम्प्रदाय ईश्वर की प्राप्ति का तरीका हो सकता है किन्तु जनता का बंटवारा और किसी राष्ट्र की बुनियाद नहीं बन सकता और फिर अगर इस नियम को मान लिया जाए तो भारत नाम का देश कहां रह पाता है। यहां तो ईश्वर की पूजा-पाठ के कितने ही तरीके हैं इसीलिए भारत को विश्व भर के अंदर एक गुलदस्ते का दर्जा प्राप्त है। पंडित जी का कहना था कि जिन लोगों ने सम्प्रदाय को आधार बनाकर पाकिस्तान बनवाया है उन्होंने मानवता के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है जिसके परिणाम अच्छे नहीं हो सकते। जम्मू-कश्मीर के संबंध में उनका एक स्पष्ट दृष्टिकोण था। इस राज्य और शेष भारत के बीच किसी भी तरह का भेदभाव घातक होगा। इस दृष्टिकोण पर पंडित डोगरा जीवन भर अडिग रहे।

भारत के पीड़ादायक बंटवारे से लेकर अंत तक वह इस बात के इच्छुक रहे कि इस राज्य और शेष भारत के बीच खड़ी की गई अलगाववाद की दीवारों को हटा दिया जाए। इस बात को लेकर उन्होंने कई आंदोलन किए और कुछ सफलताएं भी प्राप्त कीं किन्तु  दशक बीत जाने के पश्चात भी अभी बहुत कुछ निराला है जो तरह-तरह की मुसीबतों का कारण बन रहा है और लम्बी काली रात का जल्द अंत दिखाई नहीं देता। 

राज्य के विलय का विषय
भारत के बंटवारा कानून के अंतर्गत राजाओं और नवाबों को यह अधिकार प्राप्त था कि वे अपनी परिस्थितियों के अनुसार भारत या पाकिस्तान के साथ अपने-अपने राज्यों का विलय कर सकते हैं। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह एक धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण रखते थे, अत: देशभक्त होने के नाते वह स्वाभाविक रूप से भारत के साथ जाना चाहते थे किन्तु उनके रास्ते में कुछ सीमांत कठिनाइयों के अतिरिक्त बड़ी अड़चन स्वयं देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बन रहे थे।

उन्होंने यह शर्त रख डाली थी कि कश्मीर के विलय से पूर्व शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को मुक्त कर दिया जाए और राज्य की बागडोर उन्हें सौंपने के लिए रास्ता साफ किया जाए अर्थात नेहरू और शेख की मित्रता और उन दोनों की हरि सिंह के प्रति घृणा विलय के रास्ते में बड़ी रुकावट बन रही थी। एक दूरदर्शी नेता होने के नाते पंडित डोगरा ने भारत के कई बड़े नेताओं के साथ सम्पर्क किया ताकि महाराजा हरि सिंह को आश्वासन दिलाया जा सके कि नेहरू ही सारा भारत नहीं। जिन नेताओं से पंडित डोगरा ने सम्पर्क स्थापित किया उनमें आचार्य कृपलानी, श्री गुरु गोलवलकर, सरदार पटेल और कुछ अन्य शामिल थे।

इसी बीच नवनिर्मित राष्ट्र पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के लिए आक्रमण बोल दिया। हजारों की संख्या में आक्रमणकारी राज्य में प्रविष्ट हुए और स्थिति कुछ ऐसी बन गई कि महाराजा को नेहरू की शर्त पर ही विलय पत्र पर हस्ताक्षर करना पड़े। सत्ता की बागडोर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को ही सौंप दी गई किन्तु कुछ ही समय के पश्चात महाराजा के संदेह सही सिद्ध  हुए। महाराजा हरि सिंह को उनके राज्य से बाहर दूर मुम्बई में निर्वासन का जीवन व्यतीत करना पड़ा और उनके प्रिवीपर्स को विवादित बना दिया गया। 

संघर्ष विराम का विरोध
राज्य के विलय के पश्चात भारतीय सेना यहां पहुंची और आक्रमणकारियों को खदेडऩे का क्रम तीव्रता से जारी था। घाटी और कुछ अन्य क्षेत्रों से दुश्मनों के सफाए के साथ ही रहस्यमय रूप से संघर्ष विराम की चर्चा शुरू हो गई। पंडित प्रेमनाथ डोगरा ने इसे खतरनाक चाल बताया किन्तु तरह-तरह के षड्यंत्रों के अंतर्गत राज्य का 1/3 से अधिक भााग शत्रु के अतिक्रमण में छोड़ दिया गया। इस संघर्ष विराम का विरोध करने पर पं. डोगरा पर जंगबाज, शांति का दुश्मन और साम्प्रदायिक होने जैसे आरोप लगाए गए।

पंडित डोगरा और उनके साथियों ने बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रख कर प्रजा परिषद नाम का संगठन गठित किया तो शेख सरकार ने उन्हें बिना मुकद्दमा चलाए जम्मू से गिरफ्तार करके सख्त सर्दी के दिनों में श्रीनगर जेल में डाल दिया जिसकी राज्य में ही नहीं अपितु देशभर में कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई। आठ माह के लम्बे समय के पश्चात पंडित डोगरा को मुक्त कर दिया गया। 

अस्थायी धारा 370 और कश्मीर
जब देश के संविधान का निर्माण हो रहा था तो इस राज्य से नैशनल कांफ्रैंस के चार सदस्यों को इस बड़े संवैधानिक संस्थान में शामिल कर दिया गया। इन सदस्यों ने राज्य के लिए धारा 370 की मांग की। नेहरू ने अपने मित्र शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को खुश रखने के लिए बात मान ली और लम्बे सोच-विचार के पश्चात अस्थायी धारा 370 को संविधान में शामिल करने का निर्णय हुआ किन्तु संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डा. भीमराव अम्बेदकर ने इसे सदन में लाने से यह कह कर इंकार कर दिया कि मैं तो सारे देश का कानून मंत्री हूं।

मैं यह अन्याय कैसे कर सकता हूं कि कश्मीरियों को सारे देश में बराबर के अधिकार प्राप्त हों किन्तु इस राज्य में किसी गैर-राज्यीय को नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाए। डा. अम्बेदकर के इंकार पर इस धारा को सदन में पारित करवाने के लिए नेहरू ने अपने अन्य एक मंत्री गोपालास्वामी अयंगर को यह जिम्मेदारी सौंप दी। सदन के कई नाराज सदस्यों को नेहरू ने आश्वासन दिलाया कि यह एक अस्थायी पग है जो समय के साथ घिसते-घिसते घिस जाएगा।

राज्य में पंडित डोगरा और उनके साथियों ने नेहरू के इस आश्वासन को यह कह कर अस्वीकार कर दिया कि बुराई को अपनाया तो जा सकता है किन्तु छुटकारा पाना सरल नहीं। उन्होंने साथ ही राज्य के अलग संविधान, अलग झंडा और अलग सदर-ए-रियासत के निर्णय के विरुद्ध एक बड़े आंदोलन का बिगुल बजा दिया। यह आंदोलन कई महीनों तक जारी रहा, हजारों सत्याग्रही गिरफ्तार हुए, 16 युवकों को भारत का झंडा लहराने पर गोलियों का निशाना बनना पड़ा। इसी आंदोलन में देश के विपक्ष के नेता डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान रहस्यमय परिस्थितियों में निधन हो गया।

इस बड़े आंदोलन के कारण अलगाववाद की कई एक दीवारें तो समाप्त हो गईं किन्तु 70 वर्ष का लम्बा समय बीत जाने के पश्चात भी यह अस्थायी धारा अब भी बनी हुई है और कुछ तत्व इस धारा को स्थायी बनाने की बातें भी कर रहे हैं। पंडित डोगरा की पुण्यतिथि पर उनकी याद मनाने वालों का कहना है कि अगर दूरदर्शी पंडित जी की बातों पर गंभीरता से कान धरे जाते तो जम्मू-कश्मीर में दशकों से जारी खूनखराबे से बचा जा सकता था और इस राज्य की रक्षा के लिए इतना भारी बलिदान न देना पड़ता।-गोपाल सच्चर

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