विपक्ष को नहीं मिला मोदी का ठोस विकल्प

परम्परागत फॉर्मेट में 2019 के आम चुनाव की स्थिति का विश्लेषण गलत निष्कर्ष दे सकता है, 4 नए कारक हैं जो इस चुनाव के नतीजों पर गुपचुप लेकिन प्रभावी तरीके से असर डालेंगे। वे हैं-कृषि से निराश किसानों का पहली बार दबाव समूह के रूप में उभरना, जाति-आधारित क्षेत्रीय दलों का तालमेल और बढ़ती बेरोजगारी, लेकिन इनकी काट के रूप में होगा विपक्ष का एकजुट न होना, मोदी के बरअक्स किसी विपक्षी नेता की मकबूलियत का अभाव, यानी एक ओर भोगा हुआ यथार्थ है तो दूसरी ओर भावना, और भावना यथार्थ को लगातार पांच साल नहीं दबा सकती।

अगर किसान अपनी उपज की लगातार कम होती कीमतों से नाराज न भी होगा तो जाति वाली क्षेत्रीय पार्टी को वोट करेगा। प्रकारांतर से अगर एक ओर पुलवामा फिदायीन हमला और प्रतिक्रियास्वरूप बालाकोट बमबारी-जनित राष्ट्रवाद है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पांच साल का काम (और वादे भी) हैं तो दूसरी ओर देश में पहली बार जाति, उपजाति और धर्म से ऊपर उठ कर किसान एक दबाव समूह के रूप में उभरा  है जिसके लक्षण गुजरात चुनाव में मिलने लगे थे। 

दबाव समूह के रूप में उभरे किसान
युवा भारत माता की जय में हाथ तो उठा रहे हैं पर रोजगार के अभाव से ग्रस्त वे हाथ वोटिंग मशीन का बटन भी उसी भाव में दबाएंगे, यह स्पष्ट नहीं है। दलितों के पैर धोने का प्रधानमंत्री का टी.वी. चैनलों का विजुअल उन घटनाओं पर भारी नहीं पड़ पा रहा है जिनमें मदांध ठाकुर साहेबान ने शादी में घोड़ी पर चढऩे की हिमाकत करने वाले दलित दूल्हों को चेतावनी दी कि बारात उनके घर के सामने से नहीं निकाली जाए। उना (गुजरात) में एक दलित पर बैल्ट से लगातार प्रहार का अक्स जेहन में हमेशा के लिए चस्पा हो जाता है जबकि पैर धोने के टी.वी. विजुअल्स मोदी को अन्य नेताओं के मुकाबले सर्वे में अधिकांश मतदाताओं की पसंद तक ही प्रभाव छोड़ते हैं।

किसानों के पहली बार दबाव समूह के रूप में उभरने के संकेत गुजरात चुनाव से निकले परिणामों में मिले जब भारतीय जनता पार्टी ने राज्य की कुल 33 जिलों में से सात में एक भी सीट हासिल नहीं की और आठ में हर जिले में एक-एक यानी राज्य के 15 जिलों (लगभग आधा गुजरात) में मात्र 8 सीटें। ये सभी जिले ग्रामीण बाहुल्य थे (गुजरात में शहरीकरण 45  प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से 12 प्रतिशत ज्यादा) है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकारों ने कोई बड़ी गलती नहीं की थी और देखा जाए तो विकास के अधिकतर आंकड़े अच्छे संकेत दे रहे थे खासकर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में लेकिन दोनों में किसान और दलित साइलेंट किलर के रूप में उभरे।

फसल बीमा योजना पिछले दो सालों में विस्तार की जगह सिकुड़ती गई और वह भी गिरावट वाले दस बड़े राज्यों में, 8 भाजपा-शासित राज्यों में हैं। यानी मोदी का फ्लैगशिप कार्यक्रम उन्हीं के मुख्यमंत्रियों की उदासीनता का शिकार बना। थोक मूल्य सूचकांक में प्राथमिक खाद्य पदार्थ यानी किसानों को मिलने वाला मूल्य पिछले 18 सालों में तुलनात्मक रूप से सबसे कम इस वर्ष रहा। एन.एस. एसो. के आंकड़े जो केन्द्र ने रिलीज नहीं किए, के मुताबिक पिछले 48 सालों में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा इस वर्ष रही। 

उत्तर प्रदेश के समीकरण
उत्तर प्रदेश में मायावती-अखिलेश समझौता (यानी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) समाजवादी पार्टी (सपा) गठजोड़ 26 साल पहले सन् 1993 में हुए कांशीराम-मुलायम समझौते से अलग है। उस समय ग्रामीण सामाजिक संरचना में पिछड़ा वर्ग शोषक हुआ करता था और दलित शोषित क्योंकि खेती मानव-श्रम पर आधारित थी जबकि आज 93 प्रतिशत खेती मशीनों द्वारा की जाती है और फिर पिछड़ा वर्ग आरक्षण के कारण सरकारी नौकरी पा चुका है या पाने की फिराक में है, जो लिहाजा इन तमाम दशकों में शहरों या कस्बों में बस गया है और सवर्णों की तरह खेती बटाई पर दे कर आराम का जीवन व्यतीत कर रहा है।

ग्रामीण समाज में दलितों और पिछड़ों के बीच दुराव लगभग नहीं के बराबर है जबकि शहरों में या कस्बों में बढ़ती हिन्दू आक्रामकता के अलमबरदार उच्च जाति के लोग सशक्तिकरण की झूठी चेतना के नशे में न केवल गौ-रक्षक बन कर अखलाक, पहलू खान या जुनैद को मारने लगे, बल्कि दलितों के घोड़ी चढऩे पर भी उसी आक्रामकता का इजहार करने लगे, लिहाजा उत्तर प्रदेश में न केवल मायावती के दलित वोट समाजवादी पार्टी में शत-प्रतिशत ट्रांसफर होंगे, बल्कि पिछड़ा वर्ग भी बसपा के प्रत्याशी को वोट देंगे।

उत्तर भारत के कई राज्यों में गांवों में घूमने पर एक नया पहलू देखने में आया। गौ हत्या के खिलाफ उपजे आक्रोश के कारण गौवंश की खरीद बंद हो गई है। यहां तक कि बिहार के गांवों में नीलगाय भी नहीं मारे जा रहे हैं। नतीजतन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में किसानों की कड़ी मेहनत के प्रसादस्वरूप लहलहाती फसल दर्जनों छुट्टे जानवर चर जाते हैं। यानी भले ही किसान किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार न हुआ हो पर अचानक जब भोर में वह अपने खेत जाता है तो उसे मानव-निर्मित नई समस्या से दो-चार होना पड़ता है। बचने का रास्ता धर्मान्धता ने रोक रखा है जबकि सरकारें इसे लेकर राजनीतिक कारणों से कुछ भी न करने की स्थिति में आ गई हैं।

चूंकि भारत में 77 प्रतिशत किसान सीमान्त या लघु जोत (दो या दो हैक्टेयर से कम) वाला है, लिहाजा अपने खेत में बाड़ लगाना उसकी सामथ्र्य के बाहर है। इसमें प्रति तीन हैक्टेयर को घेरने में करीब डेढ़ लाख रुपए का खर्च आता है। एक सामान्य किसान के लिए फसल को महज छुट्टा जानवरों से बचाने के लिए इतना धन खर्च करना लगभग असंभव है। इससे किसानों में वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकारों के खिलाफ एक दबा रोष पैदा हो रहा है जो सही समय में व्यक्त हो सकता है। 

क्षेत्रीय दलों की आत्ममुग्धता
लेकिन इन सब के साथ एक नकारात्मक पहलू है जो शायद भारत के इतिहास में एक प्रमुख मुद्दा होगा- विपक्ष और खासकर क्षेत्रीय दलों की आत्ममुग्धता। ये छोटे दल उस बात को भूल रहे हैं कि चुनाव मायावती, ममता, अखिलेश, तेजस्वी यादव, चंद्रबाबू को फिर से मुख्यमंत्री चुनने का नहीं है, बल्कि 25 लाख करोड़ रुपए के बजट वाले देश का प्रधानमंत्री चुनने का है। इन पांचों नेताओं के दलों द्वारा सन् 2014 में जितने वोट हासिल किए गए थे, उनसे दोगुने वोट अकेले कांग्रेस के पास थे जबकि मोदी की लहर हुआ करती थी। लिहाजा भले ही एक बड़ा वर्ग मोदी के वादों पर भरोसा खो चुका हो लेकिन उसे सबल विकल्प अभी भी नहीं मिल पाया है।-एन.के. सिंह

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