श्री विजय कुमार चोपड़ा के नाम खुला पत्र

स्नेही विजय कुमार चोपड़ा जी, 1 सितम्बर के पंजाब केसरी में आपका सम्पादकीय पढ़ा, कुछ देर सोचता रहा- फिर उसे संभाल कर रख लिया। आपके सारगर्भित और विचारोत्तेजक सम्पादकीय ध्यान से पढ़ता हूं। आज उसे फिर पढ़ा। गंभीरता से सोचा और फिर आपको यह पत्र लिखने बैठ गया। देश में बढ़ती बेरोजगारी की विस्फोटक समस्या की ओर आपने ध्यान दिलाकर एक अत्यंत सराहनीय कार्य किया है। मैं आपको बधाई देता हूं और धन्यवाद भी करता हूं। परन्तु इस समस्या का मूल कारण एक और समस्या है उसी संबंध में अपनी बात आप तक पहुंचाना चाहता हूं। 

आपने जो आंकड़े दिए हैं उन्हें पढऩे और ध्यान से सोचने पर सिर चकरा जाता है। आपने ठीक इंगित किया है कि देश में सरकारी पदों की संख्या चौबीस लाख है और बेरोजगार युवकों की संख्या 3 करोड़ है। यदि सरकारी पदों की संख्या दोगुनी भी हो जाए तो भी सबको नौकरी नहीं मिल सकती। एक अनुमान के अनुसार प्रति वर्ष नई नौकरी पाने वाले लगभग 80 लाख उम्मीदवार होते हैं। सरकारी और गैर-सरकारी पदों पर लगभग 40 लाख को नौकरी मिल जाती है। हर वर्ष 40 लाख नए युवक बेरोजगारों की कतार में जुड़ जाते हैं। क्या यह चौंकाने वाली बात नहीं है कि पांचवीं और दसवीं की शिक्षा प्राप्त पदों के लिए लाखों उम्मीदवार होते हैं और उनमें बी.ए., एम.ए. ही नहीं पीएच.डी. तक भी होते हैं। मैं सोचता हूं कि यदि कहीं चपड़ासी पद पर पीएच.डी. को नौकरी मिल जाए तो वह उसे कैसे निभाएगा और यदि नौकरी न मिले तो निराशा के किस अंधेरे में खो जाएगा। 

नितिन गडकरी जी ने एक कड़वा सत्य कहने का साहस किया है कि कुछ लोग आरक्षण की मांग कर रहे हैं परन्तु नौकरियां कहां हैं। मैं इससे आगे एक और कड़वा सत्य कहने का साहस कर रहा हूं। नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि सरकार कई तरीकों से नौकरियों की संख्या बढ़ा रही है, यह बिल्कुल सत्य है। नौकरियां बढ़ रही हैं परन्तु बढ़ती आबादी के कारण उम्मीदवारों की संख्या उससे दोगुनी बढ़ रही है। कुल मिलाकर बेरोजगारी बढ़ रही है। पंजाब नशे की भयंकर समस्या से जूझ रहा है। युवा पीढ़ी नशे में लिप्त हो रही है। अब  यह बीमारी पड़ोसी हिमाचल प्रदेश में भी बढऩे लगी है। पंजाब के बहादुर लोग, जिन्होंने विश्व के  बहुत से देशों में जाकर ईमानदारी और परिश्रम से विकास की नई कहानी लिखी थी, आज उस पंजाब की युवा शक्ति नशे में डूब रही है। सबसे बड़ा कारण है युवा पीढ़ी के सामने भविष्य का निराशाजनक चित्र-गला काट स्पर्धा है। नौकरी के अवसर बहुत कम हैं। भविष्य की इस निराशाजनक तस्वीर के कारण ही निराश और हताश युवा नशे और अपराध की ओर जा रहे हैं। 

इन सब समस्याओं का मूल कारण बढ़ती हुई आबादी का विस्फोट है। हम 35 करोड़ से बढ़कर 136 करोड़ हो गए हैं। प्रति वर्ष 1 करोड़ 60 लाख आबादी बढ़ रही है। प्रकृति के साधनों की सीमा है। सरकारी विभागों की भी एक सीमा है। कम्प्यूटर और नई तकनीक के कारण रोजगार के अवसर कम हुए हैं। आदमी की जगह मशीन काम कर रही है, परन्तु भारत में आबादी बढऩे की कोई सीमा नहीं है। यदि चीन ने बढ़ती आबादी को नहीं रोका होता तो आज विश्व की महाशक्ति नहीं बन सकता था। वहां की आबादी 35 करोड़ और अधिक होती और वह बुरी तरह उलझ गया होता। चीन रुक गया, आबादी रोक ली, गरीबी भी दूर की और एक महाशक्ति बन गया। हम रुके नहीं और अब कुछ वर्षों में ही चीन से भी अधिक आबादी वाला देश भारत बन जाएगा। नौकरियां ही नहीं, प्रकृति के साधन भी कम होते जा रहे हैं। 

नीति आयोग ने पानी की समस्या के संबंध में एक अति महत्वपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें कहा गया है कि 60 करोड़ भारतीय पानी की भयंकर समस्याओं से जूझ रहे हैं। प्रति वर्ष शुद्ध पानी की कमी के कारण 2 करोड़ भारतीय मर जाते हैं। 70 प्रतिशत पेयजल इस्तेमाल करने योग्य नहीं है। गुणवत्ता की दृष्टि से विश्व के 122 देशों में भारत बहुत नीचे 120वें स्थान पर है। 25 प्रतिशत घरों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। 84 प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल से पानी की व्यवस्था नहीं है। पानी के 54 प्रतिशत कुओं का जल स्तर घट रहा है। 21 प्रमुख नगरों में 2020 तक पानी उपलब्ध नहीं होगा। 

यह रिपोर्ट भारत की सबसे अधिक अधिकृत नीति निर्धारत करने वाली सरकारी संस्था नीति आयोग की है। पूरे देश में इसकी बहुत चर्चा हुई। पूरी रिपोर्ट पढ़कर भविष्य का एक डरावना चित्र आंखों में घूम जाता है। देश में पेयजल एकदम कम नहीं हुआ है, कुछ और कारण भी हो सकते हैं परन्तु मुख्य रूप से बढ़ती आबादी के कारण ही पानी की यह समस्या पैदा हुई है। पानी ही नहीं, नदियों में रेत-बजरी भी कम हो रही है। बढ़ती आबादी के दबाव में अधिक मकान बनाने की आवश्यकता है। रेत की मांग अधिक है, रेत कम है। नदी-नालों की रेत तो निकाल ली अब उनकी आंतडिय़ां भी कुरेदी जा रही हैं। अधिक मांग होने के कारण अवैध खनन हो रहा है। न्यायालय रोक लगा रहे हैं, सरकार पूरी तरह से रोक नहीं पा रही। पूरे देश में रेत माफिया खड़ा हो गया। मारा-मारी इतनी है कि रेत माफिया कई जगह रोकने वाले सरकारी कर्मचारियों की हत्या तक कर रहा है। 

बढ़ती आबादी के दबाव में सारे देश में अवैध निर्माण हो रहे हैं। मकान ही नहीं, अवैध कालोनियां तक बस गईं। सब कुछ अवैध है। पर उन घरों को बिजली और पानी भी मिल जाता है, सड़कें भी बन जाती हैं। दिल्ली में सीलिंग की समस्या एक उपहास बन गई है। अवैध निर्माण का मामला न्यायालय में जाता है और न्यायालय के आदेश से करोड़ों के मकान बुल्डोजर से धराशायी किए जा रहे हैं। अवैध निर्माण को वैध कराने के लिए सारे राजनीतिक दल इकट्ठे हो जाते हैं। न्यायपालिका से टकराव तक हो जाता है। पूरे देश में सरकारी सम्पत्तियों पर अवैध कब्जे भी हुए और अवैध निर्माण भी बहुत अधिक हो गए। इसका एकमात्र कारण बढ़ती आबादी का दबाव, कुछ लोगों का लालच और प्रशासन का भ्रष्टाचार है।

बेरोजगारी की मार से निराश-हताश लोग आरक्षण की मांग कर रहे हैं। आरक्षण से बेरोजगारी दूर नहीं हो सकती क्योंकि नौकरियां हैं ही बहुत कम। राजनीति ऐसे निराश लोगों को आरक्षण का लाभ देकर इकट्ठा करती है, आंदोलन करवाती है। पूरे देश में आरक्षण के पीछे कोई सोच-समझ नहीं है। निराश युवा एक मृग मरीचिका के पीछे इकट्ठे हो जाते हैं और नेता अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करते हैं। पिछले 4 वर्षों से केन्द्र सरकार ने विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की हैं। विकास का लाभ पहुंचना भी शुरू हुआ है परन्तु बढ़ती आबादी का दानव उन योजनाओं से होने वाले लाभ को निगलता जा रहा है। 

देश में आर्थिक विकास हो रहा है, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है परन्तु उसके साथ आॢथक विषमता भी बढ़ रही है। एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के सर्वेक्षण में कहा गया है कि 2016 में भारत में कुल प्राप्त सम्पत्ति का 71 प्रतिशत केवल 1 प्रतिशत लोगों की जेब में गया। इसका अर्थ यह हुआ कि शेष 29 प्रतिशत 99 प्रतिशत लोगों में बंटा। विश्व में सबसे अधिक आर्थिक विषमता भारत में है। क्या यह शर्म की बात नहीं है कि भारत के एक अमीर प्रदेश और देश की राजधानी दिल्ली में एक गरीब घर में तीन बच्चियां भुखमरी के कारण मर गईं। कुछ गरीब प्रदेशों के गरीब घरों की बेटियां खरीदी जाती हैं, दिल्ली तक लाई जाती हैं और बेची जाती हैं। बढ़ती आबादी के कारण ही बेरोजगारी व भुखमरी पैदा हुई और उसी के कारण बेटियों को बेचने की नौबत आई। सब समस्याओं का सबसे बड़ा कारण बढ़ती जनसंख्या है। 

मैं इस पत्र द्वारा आपसे और पूरे देश के मीडिया व बुद्धिजीवियों से अपील करना चाहता हूं कि इस महत्वपूर्ण समस्या के समाधान के लिए पूरे देश में प्रबल जनमत जागृत करें। राजनीति तो केवल वोट बैंक तक सीमित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को इस संबंध में मैंने विस्तृत पत्र लिखा था। मिलकर बात भी की थी। मुझे प्रसन्नता है उन्होंने बड़े ध्यान से मेरी बात सुनी। इस प्रकार का राष्ट्रीय हित का साहस का काम वह ही कर सकते हैं। प्रबल जनमत जागृत करके हम उनकी सहायता कर सकते हैं।-शांता कुमार

Related Stories:

RELATED बेरोजगारी का कलंक झेल रही सविता को ''अर्जुन पुरस्कार'' की सिफारिश ने दी नई जिंदगी