भारतीय प्रतिभाएं देश में फलती-फूलती क्यों नहीं

punjabkesari.in Monday, Dec 06, 2021 - 04:36 AM (IST)

इन दिनों भारतीय मूल के पराग अग्रवाल और गीता गोपीनाथ के नाम सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं। जहां सोशल नैटवर्किंग प्लेटफॉर्म ट्विटर की कमान 37 वर्षीय पराग अग्रवाल को मिली है वहीं गीता गोपीनाथ को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) की पहली उप-प्रबंध निदेशक के रूप में भूमिका निभाने के लिए चुना गया है। यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में दूसरा सर्वोच्च पद है। 

इससे पहले गीता के नाम पर आई.एम.एफ. की चीफ इकोनॉमिस्ट बनने वाली पहली महिला होने का रिकॉर्ड था। जिस समय पूरी दुनिया कोरोना के कारण लॉकडाऊन से गुजर रही थी, तब इन्होंने विश्व को आर्थिक मंदी से बाहर निकालने में बड़ी भूमिका निभाई। पराग ने आई.आई.टी. बॉम्बे से 2005 में कम्प्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में बी.टैक की पढ़ाई की जिसके बाद उन्होंने अमरीका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट किया। दूसरी ओर गीता ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से मास्टर्स करने के बाद प्रिटस्न यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की। 

केवल ये दो ही नहीं, विश्व की दिग्गज बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की कमान भारतीयों के ही हाथों में हैं। इनमें आई.बी.एम. के सी.ई.ओ. अरविंद कृष्णा, गूगल के सी.ई.ओ. सुंदर पिचाई, मास्टरकार्ड के सी.ई.ओ. अजयपाल बांगा, अरिस्ता नैटवक्र्स की सी.ई.ओ. जयश्री उल्लाल, माइक्रोसॉफ्ट के सी.ई.ओ. सत्या नडेला आदि प्रमुख हैं। भारत से बाहरी जगत में भारतीयों की सफलता अवश्य प्रशंसनीय है परंतु इससे कई प्रश्न भी उठते हैं। जैसे कि अमरीका की वर्कफोर्स का केवल 1 प्रतिशत होने के बावजूद भारतीय वहां के टॉप लैवल तक कैसे पहुंचे? 

इसका एक कारण यह माना जाता है कि भारत से अमरीका के लिए वीजा ही उन छात्रों को मिलता है जो साइंटिस्ट या इंजीनियर हों। दूसरा कारण यह बताया जाता है कि चूंकि भारत में अक्सर सुविधाओं का अभाव रहता है और अक्सर छात्र आर्थिक तंगी का सामना करते हैं, इन हालात में वे हर तरह के संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं। ऐसे में वे पहले से ही चीजों का प्रबंधन करना और संतुलन स्थापित करना सीख जाते हैं। जैसा कि टाटा संस के पूर्व कार्यकारी निदेशक और ‘द मेड इन इंडिया मैनेजर’ नामक पुस्तक के सह-लेखक आर. गोपालकृष्णन ने कहा भी है, ‘‘दुनिया में कोई अन्य देश इतने नागरिकों को इस तरह ‘प्रशिक्षित’ नहीं करता जिस तरह भारत करता है।’’ 

प्रसिद्ध भारतीय कॉर्पोरेट रणनीतिकार सी.के. प्रह्लाद के हवाले से वह कहते हैं, ‘‘जन्म प्रमाण पत्र से लेकर मृत्यु प्रमाण पत्र तक, स्कूल में प्रवेश से लेकर नौकरी पाने तक, बुनियादी ढांचे की कमियों से लेकर अपर्याप्त क्षमता तक, भारतीय कुदरती रूप से ‘प्रबंधन’ में माहिर बन जाते हैं।’’  हर जगह प्रतिस्पर्धा और आपाधापी उन्हें समस्याओं को हल करने में भी कुशल बना देती है।

साथ ही यह तथ्य कि वे अक्सर निजी जीवन की तुलना में पेशेवर जीवन को प्राथमिकता देते हैं, अधिक काम करने के ‘अमरीकन ऑफिस कल्चर’ में उनकी मदद करता है। उनमें दुनिया के शीर्ष नेताओं जैसी विशेषताएं होती हैं। हालांकि, प्रश्न यह उठता है कि अगर वे भारत में रहते हुए ही इतना कुछ सीख जाते हैं तो अपने ही देश में क्यों नहीं रुकते और क्यों तरक्की के लिए अमरीका की ओर ही देखते हैं और उनके साथ ही पढऩे वाले जो अन्य छात्र यहीं रह जाते हैं, वे इतनी तरक्की क्यों नहीं कर पाते हैं?

इससे यह जरूर समझ में आता है एक स्तर तक तो भारत में शिक्षा जरूर अच्छी है परंतु आगे और उच्च शिक्षा के लिए वे अक्सर अमरीका जाते हैं और फिर वहीं की कम्पनियों में काम करना पसंद करते हैं। हमारे आई.आई.टी. जैसे शिक्षण संस्थान बेशक विश्व रैंकिंग में बहुत ऊपर नहीं हैं परंतु फिर भी वहां से हमारे छात्र इतने मेधावी होकर निकलते हैं। क्या इससे हमें यह सीख नहीं लेनी चाहिए कि हमारे 10-12 आई.आई.टी. ही काफी नहीं हैं। हमें इनकी संख्या बढ़ाने की जरूरत है। हाल के वर्षों में कुछ नए आई.आई.टी. खोले जरूर गए हैं जैसे कि श्रीनगर में परंतु वहां पर्याप्त संख्या में टीचरों की ही नियुक्ति नहीं हो सकी है। इन नए संस्थानों में पुराने आई.आई.टीज जैसा इंफ्रास्ट्रक्चर अभी तक उपलब्ध नहीं किया जा सका है। 

तो क्या अब आई.आई.टी. जैसे और शिक्षण संस्थान खोलने का समय नहीं आ गया है और उससे भी बढ़ कर अब हमें अपनी इकोनोमी में खुलापन लाने और उसे उस स्तर का बनाने के प्रयास नहीं करने चाहिएं जैसा कि अमरीका में है ताकि हमारे यहां के मेधावी छात्रों को टॉप स्तर की कम्पनियों में काम करने के लिए अमरीका का रुख न करना पड़े। 


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