न्यायपालिका को अपना भरोसा बहाल करने के लिए आत्मनिरीक्षण करना चाहिए
punjabkesari.in Thursday, Jan 22, 2026 - 04:38 AM (IST)
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने रविवार को कहा कि अगर किसी मामले में जल्द सुनवाई संभव नहीं है, तो जमानत नियम होना चाहिए। उन्होंने एक्टिविस्ट उमर खालिद को बार-बार जमानत न मिलने पर टिप्पणी करते हुए यह बात कही, जो सितम्बर, 2020 से बिना सुनवाई के जेल में है। पूर्व सी.जे.आई. 19वें जयपुर लिटरेरी फैस्टिवल में ‘न्याय के विचार’ शीर्षक वाले एक सैशन में बोल रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘संविधान के अनुसार, जमानत एक अधिकार होना चाहिए। हमारा कानून इस एक धारणा पर आधारित है कि हर आरोपी तब तक निर्दोष है, जब तक कि मुकद्दमे में वह दोषी साबित न हो जाए। मुकद्दमे से पहले हिरासत सजा का एक रूप नहीं हो सकती। अगर किसी व्यक्ति को सुनवाई से पहले 5 से 7 साल के लिए जेल में डाल दिया जाता है और फिर आखिरकार उसे बरी कर दिया जाता है, तो आप उस खोए हुए समय की भरपाई कैसे करेंगे?’’
उन्होंने आगे कहा, ‘‘जमानत तब मना की जाती है, जब आरोपी अपराध दोहरा सकता है, सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है, या भाग सकता है। अगर ये तीन अपवाद लागू नहीं होते हैं, तो जमानत नियम होना चाहिए। अब जिस समस्या का हम आज सामना कर रहे हैं, वह यह है कि हमारे बहुत से कानूनों, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कानून, में निर्दोषता की धारणा को लगभग अपराध की धारणा से बदलकर कानून को ही उल्टा कर दिया है।’’
जस्टिस चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख रहते हुए भी कई बार इसी तरह की टिप्पणियां की थीं। उन्होंने हाई कोर्ट और निचली अदालतों के जजों को निर्देश भी दिए थे कि जमानत याचिका पर सुनवाई और फैसला लंबे समय तक टाला नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा था, जमानत नियम है और जेल एक अपवाद है; यह सिद्धांत यू.ए.पी.ए. और पी.एम.एल.ए. कानूनों के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों पर भी लागू होता है। यह सच है कि उनके कई पूर्ववर्तियों और उत्तराधिकारियों ने भी ऐसी टिप्पणियां की थीं। हालांकि, स्थिति दयनीय बनी हुई है और वास्तव में और खराब हो गई है। कई सामाजिक कार्यकत्र्ताओं, बुद्धिजीवियों, छात्रों और पर्यावरणविदों को देशद्रोह के बिना साबित आरोपों में सालों तक हिरासत में रखा गया है, कई मामलों में कई सालों तक बिना सुनवाई के।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने विशेष रूप से जे.एन.यू. के छात्र नेता उमर खालिद का जिक्र किया, जिसे 2020 में दिल्ली पुलिस के स्पैशल सैल ने यू.ए.पी.ए. के तहत गिरफ्तार किया था। उसकी जमानत याचिका कई बार खारिज की जा चुकी है, इसके बावजूद कि पिछले 5 सालों से उसके खिलाफ कोई आरोप तय नहीं किए गए हैं। उसके मामले में 460 गवाह और 30,000 पन्नों की चार्जशीट शामिल है, जिसमें 4 सप्लीमैंट्री चार्जशीट भी हैं, जो कई और सालों तक उसकी हिरासत सुनिश्चित करती हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल के दौरान उसका मामला खुद क्यों नहीं उठाया, यह एक विचारणीय प्रश्न है।
फिर दिल्ली यूनिवॢसटी के 90 प्रतिशत शारीरिक रूप से विकलांग प्रोफैसर जी.एन. साईबाबा का मामला है। उन पर माओवादियों से कथित संबंधों का आरोप था और उन्हें 10 साल तक हिरासत में रखा गया था। उन्हें विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम-2016 के तहत बिना शर्त रिहा किया जाना चाहिए था, लेकिन न तो उन्हें पर्याप्त मैडीकल देखभाल मिली और न ही मैडीकल आधार पर जमानत दी गई। पिछले साल, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया और प्रोफैसर साईबाबा सहित 5 सामाजिक कार्यकत्र्ताओं को माओवादियों से कथित संबंधों के सभी आरोपों से बिना शर्त रिहा करने का आदेश दिया, जिसके तहत उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, उनके साथ किए गए अमानवीय व्यवहार ने उनकी स्वास्थ्य समस्याओं को और बढ़ा दिया तथा रिहाई के कुछ महीने बाद ही उनका निधन हो गया।
एक और मामला 84 वर्षीय पादरी और सामाजिक कार्यकत्र्ता स्टेन स्वामी का है, जिनकी गंभीर बीमारी और बुढ़ापे के बावजूद जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। उनकी न्यायिक हिरासत में मृत्यु हो गई।
मनमानी हिरासत और न्यायपालिका के हस्तक्षेप में विफलता का नवीनतम मामला लद्दाख के पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक का है। वह एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित पर्यावरणविद् हैं और एक देशभक्त नागरिक के रूप में उनकी साख बेदाग है। सरकार ने उनकी रिहाई की मांग पर ध्यान नहीं दिया और कठोर कानूनों के तहत उनकी हिरासत के लिए कोई सबूत देने से लगातार इंकार कर रही है।
ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें असहमति की आवाजों को दबाया गया है, जबकि सत्ताधारी दल से जुड़े लोग आसानी से बच निकले हैं। इनमें गैंगरेप के दोषी व्यक्ति भी शामिल हैं, जिन्हें रिहाई पर भाजपा समर्थकों ने मालाएं पहनाई थीं। जबकि न्यायपालिका ने कुछ हाई-प्रोफाइल मामलों में देर रात सुनवाई करने के लिए अपनी हदें पार कर दी हैं, वहीं उसने 1983 के सिख नरसंहार से संबंधित मामलों को अंतिम फैसले के लिए लंबित रहने दिया है। एक हाई कोर्ट जज के आवास से भारी मात्रा में करंसी नोटों का पता चलने जैसी घटनाएं, जिसके स्रोत के बारे में जनता अभी भी अनजान है, संस्था में जनता के विश्वास को कम कर रही हैं। न्यायपालिका अभी भी न्याय के लिए उम्मीद का आखिरी सहारा है लेकिन यह तेजी से अपनी विश्वसनीयता खो रही है। यह हमारे लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण और खतरनाक दोनों है। अब समय आ गया है कि न्यायपालिका खुद गहराई से सोचे और जनता का भरोसा बहाल करने के लिए गंभीरता से आत्मनिरीक्षण करे।-विपिन पब्बी
