‘जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में’ लोगों में बढ़ रही हिंसा की भावना!

punjabkesari.in Monday, Jul 13, 2026 - 03:09 AM (IST)

आज के भौतिकवादी समाज में लोगों की विचारधारा में आश्चर्यजनक बदलाव देखने में आ रहे हैं जिनका पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर पडऩे वाला प्रतिकूल प्रभाव भारी हिंसा का कारण बन रहा है। इस कारण जहां राजनीतिक हत्याएं हो रही हैं वहीं सामाजिक जीवन में वे लोग हिंसा का शिकार हो रहे हैं जिनका राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसके पिछले साढ़े 3 महीनों के चंद उदाहरण निम्न में दर्ज हैं : 

* 29 मार्च को ‘लुधियाना’ (पंजाब) के ‘तखरां’ गांव में कांग्रेस के ब्लाक प्रधान परमिंदर तिवारी की हत्या कर दी गई। 
* 5 मई को ‘बीरभूम ‘(पश्चिम बंगाल) के ‘नैनूर’ में तृणमूल कांग्रेस के एक कार्यकत्र्ता ‘अबीर शेख’ की हत्या कर दी गई।
* 6 मई को ‘उत्तर 24 परगना’ (पश्चिम बंगाल) में भाजपा नेता ‘शुभेंदु अधिकारी’ (वर्तमान मुख्यमंत्री) के निजी सहायक ‘चंद्रनाथ रथ’ की  बदमाशों ने ताबड़-तोड़ गोलियां चला कर हत्या कर दी। 
* 31 मई को ‘लखनऊ’ (उत्तर प्रदेश) में भाजपा युवा मोर्चा की जिला समिति के सदस्य ‘शिवम सिंह’ की किसी विवाद के चलते अज्ञात हमलावरों ने गोलियां मार कर हत्या कर दी।

* 14 जून को ‘देहरादून’ (उत्तराखंड) के विकासनगर में दो पक्षों के  बीच हुए विवाद में भाजपा के कार्यकत्र्ता ‘विनोद’ की हत्या कर दी गई।
* 21 जून को ‘मथुरा’ (उत्तर प्रदेश) में भूमि विवाद को लेकर ‘सपा’ के नेता ‘सेनापति कुंतल’ की लाठी-डंडों से बेरहमी से पिटाई कर हत्या कर दी गई। 
* 23 जून को ‘केंद्रपाड़ा’ (ओडिशा ) में भाजपा के बूथ अध्यक्ष ‘तपन दास’ को शराब के नशे में धुत्त एक व्यक्ति ने मामूली बहस के बाद लकड़ी के तख्ते से पीट-पीट कर मार डाला।
* 23 जून को ही ‘कठलतली’(त्रिपुरा) में भाजपा कार्यकत्र्ता ‘समीर दास’ की फावड़े से वार करके हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद गुस्साए ग्रामीणों ने आरोपियों के घरों में आग लगा दी।
* और अब 9 जुलाई को  ‘गुडग़ांव’ (हरियाणा) में आतंक फैलाने की साजिश में विदेश से रंगदारी गिरोह चला रहे गैंगस्टर ‘दीपक नांदल’ के इशारे पर प्रापर्टी कारोबारी ‘विशाल बेरी’ की हत्या करने पहुंचे 5 में से 4 शूटरों ‘दीपा’ उर्फ ‘संदीप’, ‘आर्यन’, ‘नितिन’ और ‘अंकित’ कोपुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया जबकि पांचवां आरोपी शिवम गंभीर रूप से घायल हो गया। 

इस एनकाऊंटर में मारे गए 4 अपराधियों में से 17 वर्षीय 2 नाबालिग ऐसे थे जिनका कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं था लेकिन गलत संगत ने उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया। 
नाबालिगों में से एक ‘आर्यन’ जैवलिन थ्रो का खिलाड़ी एवं 12वीं कक्षा का छात्र, जबकि दूसरा ‘अंकित’ 8वीं पास था और 4 बहनों का इकलौता भाई था। इन दोनों को बहला-फुसला कर ‘संदीप’ उर्फ ‘दीपा’ की कार में बिठा कर गुडग़ांव लाया गया था।
उक्त घटनाओं को देखते हुए मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि क्या हमारा समाज इस कदर असहनशील होता जा रहा है कि जरा-जरा सी बात पर हिंसा करने पर आमादा हो जाता है। 
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ङ्क्षहसक विचारों की शुरुआत मन से होती है जो बाद में अमली रूप लेकर हिंसा में तबदील हो जाती है। तो क्या हम आजकल हिंसा की ओर जा रहे हैं जबकि शुरू से ही हमारी सभ्यता तो अहिंसा और शांति की अवधारणा पर आधारित रही है। न हमने किसी देश पर आक्रमण कर उस पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया और न ही किसी पर दबदबा कायम करने की कोशिश की। 

यहां तक कि अंग्रेजों के विरुद्ध भी हमारा संघर्ष शांतिपूर्ण रहा था। तो अब हमारी विचारधारा और कृत्य ङ्क्षहसक क्यों होते जा रहे हैं? जिधर भी नजर दौड़ाएं राजनीति और समाज दोनों ही क्षेेत्रों में हर ओर लोगों पर हिंसा ही हावी दिखाई देती है। देश में घरेलू हिंसा में भी भारी वृद्धि हो गई है। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं हर आयु और हर वर्ग के लोग इसका शिकार हो रहे हैं। यहां तक कि अब 7 साल की बच्ची से गैंगरेप, हत्या जैसी भयानक खबरों से समाचार पत्र भरे रहते हैं। लोगों में हिंसक भावना बढऩे का एक कारण यह भी है कि अपना महत्व बनाने के इच्छुक कुछ लोग अपराध का रास्ता अपना रहे हैं। परन्तु क्या कानूनी कार्रवाई तेज और असरदार होने की जरूरत नहीं?


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