तेलंगाना- माता-पिता की देखभाल न करने पर कटेगा वेतन, बुजुर्गों के लिए राहत!
punjabkesari.in Wednesday, Apr 01, 2026 - 04:04 AM (IST)
भारतीय धर्म ग्रंथों में माता-पिता का दर्जा भगवान के समान माना गया है और हमारे सामने श्रवण कुमार जैसे आज्ञाकारी पुत्रों के उदाहरण मौजूद हैं जिसने अपने अंधे माता-पिता को पालकी में बिठा कर अपने कंधों पर उठा कर तीर्थ यात्रा करवाई। लेकिन आज के जमाने में माता-पिता को संतानों से अपने पालन-पोषण का सामान्य अधिकार हासिल करने के लिए जिलाधीश से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने केंद्र सरकार को कानून बनाने का आधार दिया था।
1987 में काशीराव राजा राम स्वामी ने सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत सुप्रीम कोर्ट में मुकद्दमा दायर कर के अपनी डाक्टर बेटी विजया मनोहर आर्बट से भरण-पोषण की मांग की थी। मुकद्दमे की सुनवाई के दौरान डाक्टर विजया ने अदालत को दलील दी कि बुजुर्ग माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पुत्रों और अविवाहित पुत्री की होती है और एक विवाहिता पुत्री होने के नाते उसकी यह जिम्मेदारी नहीं बनती। मुकद्दमे की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन माननीय मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती और जस्टिस आर.एस. पाठक ने फैसला सुनाते हुए कहा कि सी.आर.पी.सी. की धारा 125 के तहत ‘पुत्री’ शब्द बिना किसी शर्त के शामिल किया गया है और इसमें विवाहित और अविवाहित दोनों पुत्रियां शामिल हैं।
इसी फैसले के आधार पर केंद्र सरकार ने 2007 में ‘मैंटेनैंस एंड वैल्फेयर ऑफ पेरैंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007’ संसद में पारित किया। इस कानून के तहत संतान अथवा कानूनी उत्तराधिकारी को अपने माता-पिता या बुजुर्ग परिजनों की भोजन, आवास, स्वास्थ्य देखभाल और सुरक्षा जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य किया गया है। इस कानून के अंतर्गत यदि संतान या जिम्मेदार व्यक्ति माता-पिता की देखभाल करने से इंकार करता है, तो कानून के मुताबिक उसे मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया जा सकता है और आदेश का पालन न करने पर सजा भी हो सकती है। 2017 में असम सरकार ने ‘आसाम इम्प्लॉइज पेरैंट्स रिस्पांसिबिलिटी एन्ड नॉम्र्स फॉर अकाऊंटेबिलिटी एन्ड मॉनीटरिंग एक्ट 2017’ (प्रणाम) लागू किया। इस कानून के तहत यदि राज्य सरकार का कोई कर्मचारी अपने माता-पिता की उपेक्षा करता है तो माता-पिता इसकी शिकायत कर सकते हैं। यदि जांच के बाद माता-पिता के आरोप सही पाए जाते हैं, तो कर्मचारी की सैलरी से एक निश्चित हिस्सा (अधिकतम 15 प्रतिशत) काटकर सीधे माता-पिता के खाते में भेजा जाता है।
इसके बाद 2023 में केरल सरकार ने एक आदेश लागू कर के उन कर्मचारियों के वेतन में 25 प्रतिशत कटौती करने का आदेश दिया जिन्हें अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिली है लेकिन नौकरी मिलने के बाद वे अपने बुजुर्ग अभिभावकों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर रहे। और अब तेलंगाना सरकार ने विधानसभा में ‘पेरैंटल सपोर्ट बिल-2026’ पास किया है। इस कानून के तहत यदि कोई कर्मचारी अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करता, तो उसकी कुल मासिक सैलरी में से 15 प्रतिशत या 10,000 (जो भी कम हो) की कटौती की जाएगी। इस कानून के तहत माता-पिता को इसके लिए कोर्ट की जगह जिला कलैक्टर के पास शिकायत करनी होगी। जांच में शिकायत सही मिलने पर कलैक्टर सीधे कंपनी या विभाग को सैलरी काटकर माता-पिता के खाते में भेजने का आदेश देंगे। देश में पहली बार ऐसा कानून बना है, जिसमें सरकारी के साथ ही प्राइवेट सैक्टर के कर्मचारियों, विधायकों, सांसदों और सरपंचों को भी जवाबदेह बनाया गया है।
निश्चित तौर पर तेलंगाना सरकार का यह फैसला उन माता-पिता के लिए बड़ी राहत लाने वाला है जिनके बच्चे जीवन की संध्या में उनकी जिम्मेदारी उठाने से मुंह मोड़ लेते हैं। देश की अन्य राज्य सरकारों को भी तेलंगाना के इस कानून का अध्ययन करके इस तरह का कानून लागू करना चाहिए ताकि बुजुर्ग अभिभावकों को उनके जीवन के आखिरी वर्षों में अपने मूलभूत अधिकारों के लिए भटकना न पड़े।—विजय कुमार
