ट्रम्प की चीन यात्रा सफल या विफल?

punjabkesari.in Monday, May 18, 2026 - 03:41 AM (IST)

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा को अमरीकी समाचारपत्र तो खूब बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे हैं, परंतु चीन के मीडिया ने ट्रम्प की चीन यात्रा को उतना महत्व नहीं दिया जितनी ट्रम्प और अमरीका को उम्मीद थी। जिस दिन ट्रम्प अपने दल-बल के साथ बीजिंग पहुंचे, उसी दिन चीन के सरकारी अंग्रेजी अखबार ‘चाइना डेली’ के पहले पन्ने पर ताजिकिस्तान के प्रैसीडैंट से हाथ मिलाते शी जिनपिंग छाए हुए थे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार, ‘पीपुल्स डेली’ ने ट्रम्प की यात्रा पर कमैंट्री को पेज 3 पर पहुंचा दिया और ट्रम्प तथा शी की मीटिंग को ब्रॉडकास्ट में 13वें स्थान पर पहुंचा कर सिर्फ अढ़ाई मिनट में ही निपटा दिया।

ट्रम्प के फीके स्वागत का कारण बताते हुए राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि ट्रम्प के साथ चीन द्वारा ऐसा करना उचित ही था क्योंकि सब जानतेे हैं कि ट्रम्प जो बोलते हैं, व्यावहारिक रूप में उस पर अमल नहीं करते, जबकि ट्रम्प से पहले चीन की यात्रा पर आने वाले अमरीकी राष्ट्रपतियों बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और बराक ओबामा का चीनी शासकों ने बड़ी अच्छी तरह स्वागत किया था। इसका एक कारण तो यह है कि चीन अब एक बहुत ऊंचे मुकाम पर पहुंच चुका है, जबकि ट्रम्प के नेतृत्व में अमरीका अब ढलान पर है तथा अमरीका के सैन्य सहयोगी ‘नाटो’ समेत कोई भी देश इसका समर्थन नहीं कर रहा। भले ही चीन इस समय पूरी तरह अमरीका की बराबरी पर तो न आ पाया हो, परंतु दूसरे नम्बर पर अवश्य आ गया है लेकिन चीन के शासकों का कहना है कि वे अमरीका की बराबरी पर आ चुके हैं।

ट्रम्प अपने 11 व्यापारिक भागीदार साथियों को साथ लेकर गए थे परंतु वहां कोई विशेष डील नहीं हुई। ट्रम्प और शी कुछ छोटी-मोटी रियायतों को छोड़कर, किसी खास बात पर सहमत नहीं दिखे। हालांकि चीन की अर्र्थव्यवस्था कुछ ढलान पर है, परंतु उसे लगता है कि उसके उत्पादों की जरूरत अमरीका को अधिक तथा चीन को अमरीका के उत्पादों की जरूरत कम है। चीन का अमरीका से बोइंग जैट खरीदने का वादा भी सिरे नहीं चढ़ सका। ईरान, ताईवान, जापान या जियो-पॉलिटिकल विवाद के दूसरे क्षेत्रों में किसी भी हलचल या असली चर्चा का कोई संकेत नहीं था। चीन ए.आई. के मामले में नेवेडिया की सहायता तो ले रहा है और उसका कहना भी है कि उसे नेवेडिया के ए.आई. की जरूरत है, परंतु अपनी खुद की भी ए.आई. विकसित कर रहा है तथा इन दिनों दुनिया में ए.आई. के सर्वाधिक पेटैंट चीन से ही रजिस्टर हो रहे हैं। यही नहीं, चीन में बनी बी.वाई.डी. इलैक्ट्रिक कारें इतनी उन्नत तकनीक की हैं कि उन्होंने इस मामले में दूसरे इलैक्ट्रिक कार निर्माताओं को पछाड़ दिया है। 

ट्रम्प ने कहा कि शी ने ईरान को हथियार न देने का पक्का वादा किया था, परंतु वह उस पर कायम नहीं रहे। ट्रम्प शी पर यह दबाव डालना चाहते थे कि चीन ईरान को समर्थन देना बंद कर दे परंतु शी ने इस मुद्दे पर भी उन्हें कोई आश्वासन नहीं दिया क्योंकि चीन तो पहले ही ईरान को काफी हथियार दे चुका है और अमरीका के साथ ऐसा कोई एग्रीमैंट नहीं हुआ कि चीन ईरान का समर्थन नहीं करेगा। तीसरा मुद्दा यह था कि चीन यह चाहता था कि ताईवान पर किसी का नियंत्रण न हो और वह उसे अपने अधीन कर ले। उल्लेखनीय है कि 18 टापुओं पर आधारित 2.30 करोड़ की आबादी वाला एक छोटा सा देश होने के बावजूद ताईवान का इतिहास ऐसा है कि चीन उसे छोड़ नहीं सकता।

16वीं शताब्दी तक ताईवान एक स्वतंत्र देश था। परंतु इसके बाद डचों और जापानियों के अधीन रहा फिर जापान के दूसरे विश्वयुद्ध में हारने के बाद चीन की के.एम.टी. पार्टी ने जापान से ताईवान ले लिया। 1944 में चीन में कम्युनिस्ट पार्टी छोटे-छोटे प्रांतों पर विजय प्राप्त कर रही थी। उस समय चीन गणतंत्र था। ‘कुओमिनटांग (के.एम.टी.)’ सत्तारूढ़ थी। च्यांग काई शेक, जो के.एम.टी. के नेता थे, उन्होंने सून यात सेन (जिन्होंने 2070 बी.सी.ई. से चली आ रही राजशाही को हटाया था) के बाद चीन की बागडोर संभाली। 1 अक्तूबर, 1949 को कम्युनिस्टों की विजय के पश्चात के.एम.टी. के नेता बचते-बचाते ताईवान पहुंचे। इसी कारण ताईवान अभी भी स्वयं को ‘रिपब्लिक आफ चाइना’ बोलता है। तमाम दिक्कतों के बावजूद ताईवान उद्योग और व्यापार में काफी प्रगति करके एक विकसित देश बन गया है और चीन के पास नहीं जाना चाहता, परंतु चीन इसे अपना हिस्सा मानता है और चाहता है कि यह उसी का हिस्सा रहना चाहिए। चीन यात्रा पर आने से पहले ट्रम्प ने यह घोषणा की थी कि ताईवान स्वयं को स्वतंत्र घोषित न करे। यह बात ताईवान को स्वीकार नहीं है। यूं तो ताईवान खड़ा ही अमरीकी सेना की सहायता से हुआ है। इस मुद्दे पर भी ट्रम्प की चीन यात्रा के दौरान कोई खास फैसला नहीं हुआ। कुल मिला कर डोनाल्ड ट्रम्प की इस चीन यात्रा को लेकर भ्रम की स्थिति ही बनी हुई है!

हालांकि  ट्रम्प अमरीका लौटने के बाद सोशल मीडिया और फॉक्स टी.वी. पर बड़े इंटरव्यू दे रहे हैं कि शी जिनपिंग के साथ बड़ी अच्छी बात हुई। ट्रम्प की बात पर भी कोई भरोसा नहीं किया जा सकता कि इनकी बंद कमरे में व्यापार या अन्य मुद्दों पर हुई बातचीत में कितना दम है। फिलहाल चीन और अमरीका आपस में टकराव नहीं चाहते क्योंकि दोनों ही देश चाहते हैं कि अभी थोड़ी प्रगति कर लें, अभी लडऩेका समय नहीं है। शायद 19 मई को होने वाले पुतिन के चीन दौरे से कुछ पता चले। 


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