‘भारत में दूल्हे के व्यापार और करियर के लिए’दहेज को माना जाता है एक लांचपैड!
punjabkesari.in Monday, Feb 02, 2026 - 03:43 AM (IST)
27 जनवरी को दिल्ली पुलिस की ‘स्वैट कमांडो’ यूनिट में कार्यरत काजल चौधरी नामक 27 वर्षीय युवती की गाजियाबाद के एक अस्पताल में मौत हो गई। बहुत कम लड़कियां ही पुलिस के ‘स्वैट कमांडो’ में सिलैक्ट होती हैं और काजल उन गिनी-चुनी लड़कियों में से एक थी।काजल को, प्रतिरक्षा मंत्रालय में क्लर्क उसके पति अंकुर चौधरी ने 22 जनवरी को बेरहमी से पीट कर घायल कर दिया था। काजल के भाई निखिल के अनुसार, अंकुर ने उसे फोन पर लाइव लेकर कहा था कि ‘‘मैं मार रहा हूं तेरी बहन को। पुलिस मेरा कुछ नहीं कर पाएगी।’’ काजल के परिवार ने अंकुर और उसके रिश्तेदारों पर लम्बे समय से काजल को दहेज के लिए टॉर्चर करने का आरोप लगाया। उसके 4 महीने की गर्भवती होने के बावजूद उस पर अत्याचार किया जाता था। इस हालत में भी उसे ड्यूटी से लौटने के बाद घर के काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। इनका डेढ़ वर्ष का एक बेटा भी है। हालांकि भारत में 1961 में दहेज विरोधी कानून बना था परंतु अभी भी हमारे देश में इसे प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं किया जाता और इसमें अनेक त्रुटियां होने के कारण इस बुराई पर रोक नहीं लग रही।
इस कानून में यह व्यवस्था है कि आप बेटी को ‘उपहार’ दे सकते हैं। इसी कारण लड़की वाले अपनी बेटियों को कार या कोई अन्य मूल्यवान वस्तु ‘उपहार’ के रूप में दी गई दिखा देते हैं। भारतीय मानसिकता कुछ ऐसी है कि लोग बेटी के स्थान पर बेटे को ही अधिमान देते हैं। उनको लगता है कि यदि बेटा पढ़ा-लिखा है तो उसके विवाह पर दहेज में मोटी रकम लेंगे और यदि लड़की पढ़ी-लिखी तथा कमाऊ भी है, जैसा कि उक्त मामले में सामने आया है, फिर भी हमारे पुरुष प्रधान समाज में लड़कियों को लड़कों की तुलना में कमतर करके आंका जाता है और हर हालत में उसके पति को उनसे पैसे चाहिएं। भारतीय लड़कियां ससुराल की खातिर अपना मायका छोड़ कर आती हैं। नए घर (ससुराल) में आकर समर्पण भाव से अपने ससुरालियों की सेवा करती हैं और नौकरी करने के बावजूद अपने परिवार और बच्चों की देखभाल तथा घर के काम करती हैं अर्थात उनका योगदान परिवार में अधिक है। क्या भारतीय पुरुष ऐसा कर सकेंगे? यह हमारा मानसिक पिछड़ापन ही है कि हम बेटी को बेटों के बराबर न समझ कर बोझ मानते हैं और बेटे के विवाह में प्राप्त होने वाले दहेज को दूल्हे के व्यापार या करियर के लिए एक लांचपैड के रूप में देखते हैं।
इस सम्बन्ध में हम यूरोप से काफी सबक ले सकते हैं। हालांकि यूरोप में भी मध्ययुग में दहेज प्रथा का प्रचलन था परंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होते-होते 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान वहां औद्योगिकीकरण, नारी शिक्षा में वृद्धि और आॢथक उदारता के कारण, जिसमें महिलाओं को अपनी सम्पत्ति के स्वामित्व सहित अधिक निजी अधिकार दिए गए थे, दहेज प्रणाली धीरे-धीरे समाप्त हो गई और पति-पत्नी में बराबर की भागीदारी शुरू हो गई। इसी कारण यूरोप में शादी पर लड़कियों को दी जाने वाली सम्पत्ति पर लड़की का ही अधिकार होता है, उसके ससुराल वालों का नहीं जबकि हमारे यहां इस तरह का कोई कानून नहीं है। परंतु भारत में दहेज उत्पीडऩ का कारण सिर्फ पैसा या नौकरी नहीं है। यह नीयत की बात है। आखिर किसी दूसरे से उसकी सम्पत्ति या धन की मांग कैसे की जा सकती है, जैसा कि उक्त मामले में सामने आया है। मृतका के पिता और भाई ने कर्जे ले-ले कर उसके ससुरालियों को 20 लाख रुपए दिए। पहले स्कूटर दिया तो कार मांगने लगे और कार देने पर भी संतुष्ट न हुए।
भारत में हर वर्ष लगभग 8000 लड़कियों को जलाकर या एसिड डालकर दहेज के लिए मार दिया जाता है। आखिर हमारे समाज में इतना लालच क्यों है? किसी दूसरे के पैसे हड़प लेने की इतनी चाह क्यों? यह लड़के को बेचने के बराबर है! यही वह विचारधारा है जिसमें सुधार करने की आवश्यकता है। हमारे देश में लाला लाजपत राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, विवेकानंद और महात्मा गांधी जैसे समाज सुधारकों ने दहेज जैसी कुरीतियों को समाप्त करने की शिक्षा दी है। हम उनकी शिक्षाओं का पालन क्यों नहीं कर सकते? हम स्वयं को धार्मिक कहते हैं परंतु धर्म के अच्छे सिद्धांतों का पालन करने की बजाय हिंसा कर रहे हैं। आखिर कब तक हम दहेज की बुराई को समाज में संजो के रखेंगे और हमारा कानून कब सख्ती से इस कुरीति से निपटेगा।
