न्याय पालिका के महत्वपूर्ण निर्णय ‘देखभाल न करने वाली संतानों से’ ‘सम्पत्ति वापस ले सकते हैं बुजुर्ग’
punjabkesari.in Sunday, Sep 13, 2026 - 03:07 AM (IST)
आजकल अनेक संतानें शादी के बाद अपने माता-पिता की ओर से आंखें फेर लेती हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य किसी न किसी तरह उनकी सम्पत्ति पर कब्जा करना ही रह जाता है जिस कारण अनेक बुजुर्ग अपनी ही संतानों के हाथों अपमान और अत्याचारों का शिकार हो रहे हैं।
इसीलिए हम लिखते रहते हैं कि माता-पिता अपनी सम्पत्ति की वसीयत तो अपने बच्चों के नाम अवश्य कर दें परंतु इसे ट्रांसफर न करें। ऐसा करके वे अपने जीवन की संध्या में आने वाली कई परेशानियों से बच सकते हैं।
भारत में ‘वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण कल्याण अधिनियम, 2007’ के अंतर्गत स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इनका इस्तेमाल करके संतानों द्वारा अपने कत्र्तव्य का पालन न करने, प्रताडि़़त करने या संपत्ति हड़पने का प्रयास करने पर बुजुर्ग अपनी संतानों को दी हुई सम्पत्ति उनसे वापस लेने के लिए उन्हें कानूनन बाध्य कर सकते हैं। न्याय पालिका द्वारा इसी वर्ष सुनाए गए ऐसे ही चंद फैसले निम्न में दर्ज हैं :
* 2 फरवरी को ‘कर्नाटक हाई कोर्ट’ के जस्टिस ‘सूरज गोविंदराज’ ने अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल न करने वाले एक दम्पति को ट्रांसफर की गई संपत्ति का मालिकाना हक उनके बुजुर्गों को वापस दिलवाया।
* 6 फरवरी को ‘झारखंड हाई कोर्ट’ ने बेटे और बहू द्वारा उत्पीड़ित ‘लखन लाल पोद्दार’ और उनकी पत्नी ‘उमा रानी पोद्दार’ की याचिका पर सुनवाई के दौरान एस.डी.एम. द्वारा पारित आदेश को बहाल रख कर पीड़ित दम्पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके बेटे और बहू को तुरंत अपने माता-पिता का जबरन कब्जाया मकान खाली करने का आदेश दिया।
* 2 मई को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस ‘पुरुषेंद्र कुमार’ ने ‘बुजुर्गों को भरण-पोषण कल्याण अधिनियम’ के अंतर्गत अपने सास-ससुर को प्रताडि़त करने वाली एक महिला को अपने सास-ससुर के घर से निकाल बाहर करने का ‘मैंटेनैंस ट्रिब्यूनल’ द्वारा सुनाया गया फैसला सही ठहराया ताकि महिला के बुजुर्ग सास-ससुर वहां शांति से रह सकें।
* 9 मई को ‘गदरपुर’ (उत्तराखंड) में ‘माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिकरण न्यायालय’ ने अपने बेटे व बहू के अत्याचारों के शिकार बुजुर्ग दम्पति, जिन्हें अपने ही घर में सम्मानपूर्वक जीवन जीने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था, के बेटे और बहू को उनकी संपत्ति से बेदखल करने के आदेश जारी किए।
* 4 जुलाई को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस ‘अमितेंद्र किशोर प्रसाद’ ने 93 वर्षीय बुजुर्ग महिला संतोष खन्ना की शिकायत पर उनके बड़े बेटे देवेंद्र और बहू नीरजा को तुरंत उनका घर खाली करने का आदेश दिया। महिला ने अपने बेटे व बहू पर लगातार उन्हें प्रताडि़त करने और उनसे अपने जीवन को खतरे के दृष्टिïगत दोनों को घर से निकालने की गुहार लगाई थी।
* 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ‘पी.एस. नरसिम्हा’ और जस्टिस ‘आलोक आराध्य’ ने ‘लखनऊ’ की एक 81 वर्षीय बुजुर्ग महिला को वृद्धाश्रम जाने के लिए मजबूर करने वाले उसके पोते और बहू को तुरंत उनके घर से निकाल बाहर करने का आदेश दिया।
* 28 अगस्त को ‘बॉम्बे हाई कोर्ट’ ने ‘पुणे’ के एक फ्लैट से बेटे को तुरंत बेदखल करने के एडिशनल कलैक्टर (ट्रिब्यूनल) के आदेश को सही करार देते हुए कहा कि ‘‘बुजुर्ग माता-पिता को अपनी प्रॉपर्टी में पूरी शांति, गरिमा और सुरक्षा के साथ रहने का पहला अधिकार है। यदि बेटा या बहू उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा बनते हैं या खर्चा व दवाइयों की जिम्मेदारी नहीं उठाते, तो उन्हें उनके घर में रहने का कोई अधिकार नहीं है।’’
* और अब 11 सितम्बर को ‘इलाहाबाद हाई कोर्ट’ के जस्टिस जे.जे.मुनीर तथा जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने श्याम जी शुक्ला नामक बुजुर्ग द्वारा दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी वरिष्ठï नागरिक की जान और सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए जरूरी होने पर उसके बेटे तथा अन्य रिश्तेदार को उसके घर से निकल जाने का आदेश दिया जा सकता है। श्याम जी शुक्ला ने याचिका दी थी कि उनकी जान को अपने बेटे और बहू से खतरा है, अत: उन्हें उनके मकान से निकाला जाए। उक्त फैसले स्पष्टï करते हैं कि वरिष्ठï नागरिकों के अधिकार कानूनी रूप से सुरक्षित हैं और संतानों के लिए उनकी देखभाल करना नैतिक दायित्व ही नहीं बल्कि कानूनी रूप से भी बाध्यकारी है तथा बच्चों द्वारा अपनी जिम्मेदारी न निभाने पर बुजुर्गों के पास कानूनी विकल्प मौजूद हैं। आवश्यकता केवल उनका इस्तेमाल करने की है। —विजय कुमार
