‘अव्यवस्था और लापरवाही के शिकार सरकारी अस्पताल’ जिंदा मरीज को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया!
punjabkesari.in Saturday, Apr 25, 2026 - 04:10 AM (IST)
लोगों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध करवाना हमारी केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है परंतु ये दोनों ही इसमें विफल हो रही हैं जो इसी वर्ष पिछले 2 महीनों के दौरान सामने आईं सरकारी अस्पतालों में व्याप्त अव्यवस्था और लापरवाही की निम्न घटनाओं से स्पष्ट है :
* 16 मार्च को ‘गुना’ (मध्य प्रदेश) के सरकारी अस्पताल के डाक्टरों ने 20 वर्षीय एक युवक को बिना सही जांच के मृत घोषित करके पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
जैसे ही उसे पोस्टमार्टम के लिए रखा गया थोड़ी देर बाद उसके शरीर में हरकत होने लगी। होश आने पर वह बुरी तरह घबरा गया और नग्नावस्था में ही वहां से बाहर भागा। उसने कहा कि अगर उसे समय पर होश नहीं आता तो डाक्टर उसे जिंदा ही चीर देते।
* 4 अप्रैल को ‘ïअलवर’ (राजस्थान) के जिला अस्पताल में इलाज के लिए लाई गई महिला की मौत के बाद परिजनों ने उसके इलाज में लापरवाही बरतने के आरोप लगाते हुए कहा कि डाक्टरों ने 2 दिन तक रोगी को ‘जयपुर’ रैफर करने की उनकी मांग को अनसुना किया।
* 12 अप्रैल को ‘दमोह’ (मध्य प्रदेश) स्थित ‘हटा सिविल अस्पताल’ में डाक्टरों की लापरवाही का एक गंभीर मामला सामने आया जहां एक महिला का प्रसव करवाने के बाद डाक्टरों ने उसके पेट में एक कपड़े का टुकड़ा छोड़ दिया और छुट्टी देकर घर भेज दिया लेकिन 3 दिन बाद ही महिला के पेट में असहनीय दर्द होने पर जब उसे अस्पताल में दोबारा भर्ती किया गया तो डाक्टरों ने उसके पेट में छूट गए कपड़े का एक टुकड़ा निकाला।
* 16 अप्रैल को ‘वाराणसी’ (उत्तर प्रदेश ) में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ‘ट्रॉमा सैंटर’ में रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर का आप्रेशन करवाने आई महिला की डाक्टरों द्वारा जांघ की सर्जरी कर देने के कारण उसकी मौत हो गई।
* 23 अप्रैल को ‘छपरा’ (बिहार) में सदर अस्पताल की महीनों से खराब पड़ी लिफ्ट के कारण ‘खुशी कुमारी’ नामक गर्भवती महिला के परिजन जब उसे सीढिय़ों से ऊपर लेकर जा रहे थे तो पहली मंजिल की सीढिय़ों पर ही उसने बच्चे को जन्म दे दिया।
* 23 अप्रैल को ही ‘नवगछिया’ (बिहार) के सरकारी अस्पताल के डाक्टर ने कमजोरी और दर्द की शिकायत लेकर पहुंची एक महिला को एंटी रैबीज (कुत्तों के काटने पर लगाया जाने वाला) इंजैक्शन लिख दिया, परंतु समय रहते ही इसका पता चल गया। आरोप है कि जब वह शिकायत लेकर दोबारा सम्बन्धित डाक्टर के पास पहुंची तो उसने पर्ची पर लिखी दवा को काट दिया और कहा कि नहीं लेना तो मत लो।
* 23 अप्रैल को ही ‘जमुई’ (बिहार) में 102 एम्बुलैंस सेवा में बड़ी लापरवाही सामने आई। सिर में खून जमा होने के कारण जमुई सदर अस्पताल से पटना रैफर किए गए 75 वर्षीय रोगी की रास्ते में ही एम्बुलैंस का तेल खत्म हो जाने से समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण तड़प-तड़प कर मौत हो गई।
* 23 अप्रैल को ही ‘बेंगलुरू’ (कर्नाटक) में कुछ समय पूर्व एक अस्पताल द्वारा एक जीवित व्यक्ति को आधार कार्ड नंबर न होने के कारण इलाज से इंकार करके मुर्दाघर में भेज देने की घटना का संज्ञान लेते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से गंभीर बीमारियों से पीड़ित रोगियों के इलाज के मामले में सरकार की चिकित्सा नीति का विवरण मांगा है। ये चंद उदाहरण देश के सरकारी अस्पतालों में व्याप्त अव्यवस्था व कुप्रबंधन के मुंह बोलते प्रमाण हैं। इसी वर्ष 8 फरवरी को जारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में सरकारी अस्पतालों में विभिन्न स्तरों पर मैडीकल लापरवाही के कुल 65000 मामले दर्ज किए गए हैं। करोड़ों रुपयों की लागत से निर्मित सरकारी अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ, दवाओं और बुनियादी ढांचे की कमी तथा स्टाफ की लापरवाही निश्चय ही एक ज्वलंत समस्या है जिसका समाधान यथाशीघ्र ढूंढा जाना चाहिए। नहीं तो इसी प्रकार अस्पतालों में अप्रिय घटनाएं होती रहेंगी।—विजय कुमार
