पाकिस्तान को ‘हड़पने’ के लिए चीन अपना रहा नित्य नए हथकंडे

punjabkesari.in Sunday, Jul 03, 2022 - 04:36 AM (IST)

पाकिस्तान दिन-प्रतिदिन विदेशी कर्ज के बोझ तले दबता चला जा रहा है। नवीनतम अनुमानों के अनुसार पाकिस्तान पर इस समय 53 लाख करोड़ रुपए से अधिक का ऋण है जिसमें सर्वाधिक ऋण संभवत: चीन का है। 

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार अप्रैल, 2021 तक पाकिस्तान पर कुल विदेशी ऋण में चीन का हिस्सा 27.4 प्रतिशत था जो अब इससे कहीं अधिक हो चुका है। अमरीका द्वारा पाकिस्तान को वित्तीय सहायता में कटौती के बाद उसकी चीन पर निर्भरता बहुत बढ़ गई है। पाकिस्तान सरकार का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो जाने के कारण उसने मदद के लिए विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के आगे गुहार भी लगाई है परंतु उनकी शर्त यह है कि पहले पाकिस्तान सरकार अपने यहां विभिन्न वस्तुओं पर दी जाने वाली सबसिडी की नीति को समाप्त करे। 

इस कारण मजबूरन पाकिस्तान सरकार को धीरे-धीरे बिजली, पैट्रोल, डीजल आदि सहित सभी वस्तुओं से सबसिडी हटानी पड़ रही है जिससे वहां महंगाई बेकाबू हो जाने के कारण पैट्रोल और डीजल, दूध, अनाज, फल, सब्जी आदि सब चीजें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं। उद्योग चौपट हो रहे हैं। देश में गैस की कमी के कारण कपड़ा मिलें भी 8 जुलाई तक के लिए बंद कर दी गई हैं। पेशावर में एक मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद बिजली कटौती को लेकर बहस के दौरान गोलीबारी में 2 लोगों की मौत तथा 11 लोग घायल हो गए। इसी को देखते हुए अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि इसे विश्व समुदाय से तुरंत आर्थिक मदद नहीं मिली तो वहां अगले कुछ महीनों में श्रीलंका जैसे हालात हो जाएंगे। 

एक ओर तो शहबाज शरीफ सरकार विभिन्न राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं से ग्रस्त है और दूसरी ओर चीन सहायता के नाम पर पाकिस्तान को हड़पने के लिए प्रयत्नशील है। इसी सिलसिले में पाकिस्तान के शासकों ने 19000 करोड़ रुपए के कर्ज के बदले में पाक अधिकृत गिलगित और बाल्तिस्तान के इलाके चीन को लीज पर सौंपने की तैयारी कर ली है। यही नहीं, चीन के शासकों ने पाकिस्तान में अपने नागरिकों की सुरक्षा के नाम पर वहां चल रही अपनी विभिन्न परियोजनाओं पर कार्यरत चीनी स्टाफ की सुरक्षा के लिए चीनी सुरक्षा कंपनी को तैनात करने की दिशा में भी प्रयास शुरू कर दिया है। हाल ही में जब पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा बीजिंग दौरे पर गए तब चीनी शासकों ने इस बात को लेकर उन पर दबाव बनाया था। 

शी जिनपिंग के सलाहकार ‘यांग जिइची’ जो वहां का चाणक्य कहा जाता है, ने इस सिलसिले में अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान वहां के सेना प्रमुख के अलावा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो से बात की है क्योंकि पाकिस्तान में लगातार चीनी नागरिकों की हत्या और पाकिस्तान के उन्हें रोक पाने में असफल रहने से चीनी शासक बहुत नाराज हैं। यही कारण है कि चीन अब अपनी निजी सुरक्षा एजैंसी को सी.पी.ई.सी. परियोजना पर कार्यरत कर्मचारियों तथा चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए तैनात करना चाहता है और इसके लिए पाकिस्तान पर भारी दबाव बना रहा है। 

विश्लेषकों का मानना है कि चीन अगर सुरक्षा एजैंसी के नाम पर अपनी सेना को तैनात करता है तो यह पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन होगा। पाकिस्तान का गृह मंत्रालय चीन के इस प्रयास का विरोध कर रहा है जिस कारण दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हुआ है। इस तरह के हालात के बीच पाकिस्तान अपनी सम्प्रभुता किस प्रकार बचा पाएगा यह प्रश्नों के घेरे में है। ऐसा लगता है कि अस्तित्व  में आने से लेकर अब तक जारी कुशासन के परिणामस्वरूप पाकिस्तान एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुका है जिससे सुर्खरू होकर निकलना उसके शासकों के लिए असंभव नहीं तो कम से कम अत्यधिक कठिन अवश्य है। 

भारत के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि यदि चीन की दबंगई के चलते पाकिस्तान के शासकों ने गिलगित और बाल्तिस्तान के इलाके, जिन पर उसने जबरदस्ती कब्जा कर रखा है, चीन को सौंप दिए तो भारत पर रणनीतिक दृष्टि से इसका कितना अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है!—विजय कुमार


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