महबूबा के नजरिए में बदलाव मजबूरी या वास्तविकता

2021-07-30T06:08:09.9

भारत से वर्षों की शत्रुता के बाद भी जब पाकिस्तान कुछ न पा सका तो नवाज शरीफ ने 21 फरवरी, 1999 को श्री वाजपेयी को लाहौर आमंत्रित करके दोनों देशों में परस्पर मैत्री व शांति हेतु लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। तब आशा बंधी थी कि अब इस क्षेत्र में शांति का नया अध्याय शुरू होगा पर इसके कुछ ही समय बाद परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का त ता पलट कर उन्हें जेल में डाल कर सत्ता हथियाने के बाद देश निकाला दे दिया तथा 1999 में कारगिल पर हमला करवा के लाहौर घोषणापत्र की धज्जियां उड़ा दीं। 

नवाज शरीफ जब 2013 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना पूर्व नियोजित कार्यक्रम के 25 दिस बर, 2015 को काबुल से आते हुए रास्ते में लाहौर में रुक कर नवाज शरीफ के घर उनकी दोहती के विवाह समारोह में भाग लेने पहुंच गए थे, परंतु इससे पूर्व कि दोनों नेता संबंध सामान्य होने की दिशा में और आगे बढ़ते, नवाज शरीफ को सत्ता से फिर हाथ धोना पड़ा। दोनों देशों के संबंधों में कुछ बदलाव का एक संकेत फिर 18 अगस्त, 2018 को मिला जब इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, पर यह उ मीद सफल नहीं हुई व पाकिस्तान की ओर से भारत विरोधी गतिविधियां जारी रहने के कारण संबंध पहले जैसे ही तनावपूर्ण बने हुए हैं। 

जम्मू-कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी नेताओं तथा आतंकवादियों ने ङ्क्षहसा जारी रखी है। हालांकि भाजपा के साथ गठबंधन में प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री तथा पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी की सुप्रीमो महबूबा मु ती की सरकार (4 अप्रैल 2016-19 जून 2018) को भाजपा ने प्रदेश में शांति स्थापना का एक मौका दिया था पर ऐसा न हो सका तथा महबूबा पर आतंकियों व अलगाववादियों के साथ कथित संबंधों के आरोप लगते रहे।

इसी वर्ष 24 मार्च को आतंकवादियों को धन उपलब्ध करवाने के मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजैंसी (एन.आई.ए.) ने महबूबा की पार्टी के एक बड़े नेता वहीद-उर-रहमान-पारा सहित 4 लोगों के विरुद्ध आरोप पत्र दायर किया था। ‘पारा’ पर आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के फाइनांसर के रूप में काम करने का आरोप है और वह अभी जेल में है। महबूबा अक्सर विवादास्पद बयान भी देती रहती हैं परंतु 28 जुलाई को पी.डी.पी. के 22वें स्थापना दिवस पर श्रीनगर में एक कार्यक्रम में उन्होंने जो भाषण दिया, उसमें उनके स्टैंड में बदलाव की कुछ झलक दिखाई देती है :

‘‘लोगों को हथियार छोड़़ केवल अपनी आवाज उठानी चाहिए। हमें लाठियां नहीं उठानी चाहिएं क्योंकि ऐसे लोग मौजूद हैं जो चाहते हैं कि अधिक से अधिक युवक हथियार उठाएं ताकि वे उन पर अधिक अत्याचार कर सकें। इसलिए मैं अपने युवाओं को कहना चाहती हूं कि वे हथियार न उठाएं। आप लोग मारे जाते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं बूढ़े मां-बाप।’’ ‘‘हमें अहिंसा का रास्ता चुनना होगा। हमें (महात्मा) गांधी से सीखना होगा। वह भारत के सबसे बड़े नेता थे और उन्होंने जनता पर अत्याचारों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।’’

‘‘पी.डी.पी. के संस्थापक मुफ्ती मोह मद सईद ने जम्मू-कश्मीर के विभाजित हिस्सों के बीच व्यापार और आवागमन का सपना देखा था जो तत्कालीन प्रधानमंत्रियों स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के प्रयासों से सफल हुआ। लिहाजा पाकिस्तान के साथ फिर बातचीत करके मुज फराबाद और रावलकोट के ट्रेड रूट दोबारा खोलिए।’’ इसके साथ ही उन्होंने कहा, ‘‘भारत को कश्मीर मुद्दे के समाधान तथा क्षेत्र में रक्तपात पर पूर्ण विराम लगाने के लिए पाकिस्तान से बात करने में झिझक नहीं होनी चाहिए। (इस वर्ष फरवरी से लागू) संघर्ष विराम से  सीमा पर शांति आई है और घुसपैठ कम होने से लोगों को राहत मिली है तो फिर पाकिस्तान के साथ बातचीत करने में गलत क्या है? हम चीन से बात कर रहे हैं जिसने हमारी जमीन पर कब्जा कर रखा है।’’

इसमें शक नहीं कि दोनों देशों में हिंसा का समाप्त होना व व्यापार बहाली दोनों ही देशों के हित में है तथा इससे अधिक लाभ पाकिस्तान को ही होने वाला है जहां महंगाई व बेकाबू आतंकवाद से लोगों का जीना दूभर हो गया है। आखिर यह तथ्य भी किससे छुपा हुआ है कि ज मू-कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तान समॢथत आतंकवादी अपने ही लोगों की हत्या करने और उनके परिवारों को तबाह व बर्बाद करने के जिम्मेदार हैं। 

हमने 1 जुलाई के संपादकीय ‘कश्मीर में आतंकियों द्वारा अपनों के विरुद्ध हिंसा और रक्तपात’ में लिखा था : ‘‘कश्मीर घाटी में आतंकियों ने जो खूनी खेल जारी रखा हुआ है उससे वे अपने ही विरुद्ध जन आक्रोश पैदा कर रहे हैं।’’ अत: महबूबा की युवाओं को हथियार छोडऩे व शांति का मार्ग अपनाने की सलाह सौ फीसदी सही है। जहां तक केंद्र सरकार का संबंध है वह पुनर्वास पैकेज के तहत युवा प्रवासी कश्मीरियों को प्रदेश में वापस लाकर उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठा रही है तथा अभी-अभी उसने वापस आए 1997 प्रवासी कश्मीरियों को नौकरियां भी दी हैं।—विजय कुमार


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Chief Editor

vijay kumar

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