राह से भटकी अमरीका की इंडो-पैसिफिक नीति

2021-08-30T02:58:37.037

अफगानिस्तान से अमरीका का लौटना, जिसमें उसकी सेनाओं की अव्यवस्थित वापसी शामिल है, ने उसकी अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को बहुत बड़ा और स्थायी नुक्सान पहुंचाया है लेकिन उसके बाद के रक्तपात और अमरीकी बमवर्षा ने पूरे संकट को एक अलग ही रंग दे दिया है। उदाहरण के लिए जापान स्थित विमानवाहक पोत यू.एस.एस. रोनाल्ड रीगन अब अरब सागर में निरंतर तैनाती पर है। अमरीकी नौसेना और उसके सहयोगियों को पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अकेला छोड़ दिया गया है। पेइचिंग ने पहले ही ताइवान को चेतावनी दी है कि उसके द्वारा अफगानिस्तान का परित्याग साबित करता है कि ताइपे अमरीकी सुरक्षा पर भरोसा नहीं कर सकता। इसके साथ ही पेइचिंग ने ताइवान के राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन को आत्मरक्षा के लिए अधिक से अधिक प्रयास करने का आग्रह करने के लिए राष्ट्र को संबोधित करने के लिए प्रेरित किया। 

सार्वजनिक रूप से वाशिंगटन के यूरोपीय सहयोगियों ने यह सलाह दी थी कि बाइडेन जल्दबाजी करने की बजाय अफगानिस्तान से धीरे-धीरे अपनी सेनाओं की वापसी करें परंतु अमरीकी सरकार ने सभी सहयोगियों की सलाह को नजरअंदाज करते हुए 15 अगस्त को रवानगी डाल दी। ऐसे में देखना यह है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में अमरीका के सहयोगी तो चाहते ही नहीं थे कि अफगानिस्तान छोड़ा जाए। न तो ‘क्वाड’ को विश्वास में लिया गया और न ही सूचित किया गया। 

लिहाजा अमरीका का यह कदम आने वाले दिनों में अमरीकी तथा इंडो-पैसिफिक रिश्तों में खटास डाल सकता है। आगे चलकर हो सकता है कि अमरीकी प्रशासन को ऑस्ट्रेलिया जैसे सहयोगियों के साथ अपनी आतंकवाद विरोधी रणनीति की समीक्षा करने की आवश्यकता हो ताकि अफगानिस्तान से सक्रिय विदेशी लड़ाकों में वृद्धि का सामना करने के लिए तैयारी की जा सके। इनमें कथित रूप से ‘इस्लामिक स्टेट’ और ‘अल कायदा’ के सैंकड़ों आतंकवादी शामिल हैं जिन्हें तालिबान ने पिछले सप्ताह जेल से रिहा किया था और इससे जेहादियों की अन्य जगहों पर भी हिम्मत बढ़ गई है। 

तालिबान की जीत की पृष्ठभूमि में अमरीकी प्रशासन को सोचना होगा कि वह आतंकवाद विरोधी रणनीति को अफगानिस्तान में जमीन पर आंखों और कानों के बिना किस तरह क्रियान्वित कर सकेगा। विशेष रूप से अमरीका-भारत संबंधों में एक साहसिक योजना की आवश्यकता है क्योंकि तालिबान की जीत से भारत के लिए ऐसे समय में खतरा बढ़ा है जब आने वाले समय में अमरीका को समग्र एशिया में चीन को रोकने में भारत की मदद की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसे समय में अमरीका के बाइडेन प्रशासन को अफगानिस्तान संकट के जवाब में अपने सहज ‘अटलांटिकवाद’ से बाहर निकलने की जरूरत है।

काबुल के पतन के 10 दिन बाद अमरीकी राष्ट्रपति ने पश्चिमी यूरोपीय नाटो शक्तियों और खाड़ी देशों के नेताओं के साथ बातचीत में सहायता के लिए धन्यवाद देने के बाद एक भी एशियाई सहयोगी से बात नहीं की है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन को कोई फोन नहीं आया है-भले ही ऑस्ट्रेलियाई सेना ने अफगानिस्तान में ब्रिटिश सैनिकों से अधिक और निश्चित रूप से जर्मनों की तुलना में बहुत अधिक युद्ध का जोखिम उठाया। 

जब व्हाइट हाऊस ने घोषणा की कि अमरीका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस सिंगापुर और वियतनाम का दौरा करेंगी तो यह स्पष्ट हो गया कि दक्षिण-पूर्व में अमरीकी नीति अभी भी ठीक से सोची समझी नहीं है, कितनी अस्पष्ट है। जहां एक ओर चीन का खतरा बरकरार ही नहीं बल्कि बढ़ भी सकता है तो दूसरी ओर अल कायदा, तालिबान सहित अन्य आतंकी संगठनों का बोलबाला होता जा रहा है। ऐसे में अमरीका को अपनी इंडो-पैसिफिक नीति पर ध्यान देने की जरूरत है।


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Content Writer

Pardeep

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