‘लोकसभा चुनाव’ से सबक लें राजनेता

सारी दुनिया की नजर 23 मई पर है। भारतीय लोकसभा के चुनावों के नतीजे कैसे आते हैं, इस पर आगे का माहौल बनेगा। अगर एन.डी.ए. की सरकार बनती है या अगर गठबंधन की सरकार बनती है तो भी भारत की जनता शांति और विकास चाहेगी। इस बार का चुनाव जितना गंदा हुआ, उतना भारत के लोकतंत्र के इतिहास में कभी नहीं हुआ। 

देश के बड़े-बड़े राजनेता बहुत छिछली भाषा पर उतर आए, जिसे जनता ने पसंद नहीं किया। जनता अपने नेता को शालीन, परिपक्व, दूरदर्शी और सभ्य देखना चाहती है। इस चुनाव का पहला सबक यही होगा कि सभी दलों के बड़े नेता यह चिन्तन करें कि उनके चुनाव प्रचार में कहीं कोई अभद्रता या छिछोरापन तो नहीं दिखाई दिया। अगर उन्हें लगता है कि ऐसा हुआ तो उन्हें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि वे भविष्य में ऐसा न करें। 

चुनाव आयोग की भूमिका
भारत के चुनाव आयोग ने भी कोई प्रशंसनीय भूमिका नहीं निभाई। उसके निर्णयों पर बार-बार विवाद खड़े हुए। इतना ही नहीं खुद आयोग के तीन में से एक सदस्य ही अपने बाकी दो साथियों के निर्णयों से सहमत नहीं रहे और उन्होंने अपने विरोध का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। 

इस चुनाव में सबसे ज्यादा विवाद ई.वी.एम. की विश्वसनीयता पर खड़े हुए। जहां एक तरफ  भारत का चुनाव आयोग ई.वी.एम. मशीनों की पूरी गारंटी लेता रहा, वहीं विपक्ष लगातार ई.वी.एम. में धांधली के आरोप लगाता रहा। आर.टी.आई. के माध्यम से मुम्बई के जागरूक नागरिक ने यह पता लगाया कि चुनाव आयोग के स्टॉक में से 22 लाख ई.वी.एम. मशीनें गायब हैं, जबकि इनको बनाने वाले सार्वजनिक प्रतिष्ठानों ने इस दावे की पुष्टि की कि उन्होंने ये मशीनें चुनाव आयोग को सप्लाई की थीं। जाहिर है कि इस घोटाले ने पूरे देश को झकझोर दिया। विपक्षी दलों को भी चिन्ता होने लगी कि कहीं लापता ई.वी.एम. मशीनों का दुरुपयोग करके फिर से भाजपा या एन.डी.ए. सत्ता में न आ जाए। 

इसी आशंका के चलते सभी विपक्षी दलों ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया। पर अदालत ने विपक्षी दलों की बात नहीं मानी। अब तो 23 मई को ही पता चलेगा कि चुनाव निष्पक्ष हुए या धांधली से। इस हफ्ते एक और खबर ने विपक्षी दलों की नींद उड़ा दी। हुआ यूं कि दिल्ली के एक मशहूर ङ्क्षहदी पत्रकार ने यह लेख छापा कि हर हालत में 23 मई की रात को नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले लेंगे, चाहे उनकी सीटें कितनी ही कम क्यों न आएं। इस खबर में यह भी बताया गया कि भाजपा के अध्यक्ष ने राष्ट्रपति भवन के वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत से 23 तारीख के हिसाब से लिखित खानापूर्ति अभी से पूरी करके रख ली है, जिससे परिणाम घोषित होते ही नरेन्द्र मोदी को पुन: प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई जा सके और फिर विश्वास मत प्राप्त करने के लिए राष्ट्रपति महोदय से लम्बा समय मांग लिया जाए। 

अगर ये खबर सच है तो विपक्षी नेताओं का चिंतित होना लाजमी है और शायद इसीलिए सब भागदौड़ करके एक बड़ा संगठन बनाने में जुट गए हैं लेकिन अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं इन्हें बहुत दिनों तक एक साथ नहीं रहने देंगी और तब हो सकता है कि देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़े। ऐसे में आम नागरिक बहुत असुरक्षित महसूस कर रहा है। उसे डर है कि अगर यही नाटक चलता रहा तो रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य इन पर कब ध्यान दिया जाएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि राजनीति का यह सर्कस चुनावों के बाद भी चलता रहेगा और जनता बदहवास ही रह जाए। अगर ऐसा हुआ तो देश में हताशा फैलेगी और हिंसा और आतंक की घटनाएं भी बढ़ सकती हैं। राजनेताओं के भी हित में है कि वे जनता को भयमुक्त करें। उसे आश्वासन दें कि अब अगले चुनाव तक राजनीति नहीं विकास की बात होगी। तब जाकर देश में अमन-चैन कायम होगा। 

बड़ी सोच की अपेक्षा
भारत की महान सांस्कृतिक परम्परा राजा से ऋषि होने की अपेक्षा करती है, जो बड़ी सोच रखता हो और अपने विरोधियों को भी सम्मान देना जानता हो, जो बिना बदले की भावना के शासन चलाए। इसलिए प्रधानमंत्री कोई भी बने उन्हें ये सुनिश्चित करना होगा कि उनका या उनके सहयोगियों का कोई भी आचरण समाज में डर या वैमनस्य पैदा न करे। चुनाव की कटुता को अब भूल जाना होगा और खुले दिल से सबको साथ लेकर विकास के बारे में गंभीर चिन्तन करना होगा। आज देश के सामने बहुत चुनौतियां हैं। करोड़ों नौजवान बेरोजगारी के कारण भटक रहे हैं। अर्थव्यवस्था धीमी पड़ी है। कारोबारी परेशान हैं। विकास की दर काफी नीचे आ चुकी है। ऐसे में नई सरकार को राजनीतिक हिसाब-किताब भूलकर समाज की दशा और दिशा सुधारनी होगी।-विनीत नारायण
 

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