‘दोषारोपण’ में उलझ कर रह गई है भारत की राजनीति

इंसान की शक्ल-ओ-सूरत और खूबसूरत लिबास ही केवल उसकी शख्सियत का आईना नहीं होता बल्कि तहजीब, तमीज के दायरे में रहकर जब विचार प्रकट करता है तो उसकी प्रतिभा में निखार आता है। उसकी इज्जत में इजाफा होता है और समाज में उसकी लोकप्रियता बढती है। शालीनता, संजीदगी और विवेकपूर्ण राय रखने वाले नेता आम लोगों के लिए आदर्श पुरुष कहलाते हैं। 

वास्तव में ये गुण भारतीय नेताओं में पाए जाते थे और वे जहां भी जाते थे लोग आंखें बिछाकर उनका स्वागत करते थे। परंतु पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में एक ऐसा परिवर्तन आ गया है कि नेताओं ने विनम्रता, सहनशीलता, विवेकशीलता की बजाय अभद्र और तलख जबां का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। परिणामस्वरूप समूचा राजनीतिक वातावरण इल्जाम तराशी, आरोप-प्रत्यारोप और दोषारोपण के सिवाय कुछ नहीं रहा। हकीकत में यह हमारी प्राचीन संस्कृति के सामाजिक मूल्यों के ही खिलाफ नहीं है, बल्कि नए समाज के निर्माण में एक बहुत बड़ी रुकावट पैदा कर रहा है। 

नेताओं के वार्तालाप और संबंधों में अंतर 
देश में राजनीतिक लोगों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष में आपसी सहयोग, मिलजुल कर समस्याओं का समाधान करने, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहअस्तित्व की भावना पैदा करने की बजाय एक ऐसा तनाव पैदा कर दिया है जो हकीकत में समूचे राष्ट्र के लिए खतरा है। 1952 से लेकर 2014 तक नेताओं के आपसी संबंधों पर नजरसानी करने से भली-भांति मालूम हो जाएगा कि पुराने और नए नेताओं के आपसी वार्तालाप और संबंधों में कितना अंतर आ गया है।

भारत के अंतिम अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड माऊंटबैटन ने अपनी एक पुस्तक में गांधी जी की विनम्रता का हवाला देते हुए लिखा है कि हम ने महात्मा को पहले दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत में बुरी तरह अपमानित किया और हद से ज्यादा जलील किया परंतु जिस समय मैंने भारत में अपनी पदवी से त्यागपत्र दिया, तो गांधी जी मुझे मिलने के लिए आए और कहने लगे कि अच्छा हो, अगर आप ही हमारे गवर्नर जनरल बने रहें। मैं उनकी विनम्रता और उनके शब्दों को सुनकर आश्चर्यचकित रह गया कि कितने महान पुरुष थे। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू हकीकत में एक सच्चे लोकतंत्रवादी नेता थे। प्रधानमंत्री होते हुए वह अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों का ही नहीं बल्कि समूचे विपक्ष के नेताओं का भी सम्मान करते थे। वह अक्सर सरदार पटेल को पैदल ही मिलने चले जाया करते थे। मौलाना आजाद का घर दूर होने की वजह से या तो गाड़ी में या फिर टैलीफोन पर बातचीत कर लिया करते थे। 

मतभेद लेकिन मनभेद नहीं
एक बार राम मनोहर लोहिया जेल में थे और पंडित जवाहर लाल ने उनके लिए आमों की एक टोकरी भेजी जिस पर सरदार पटेल बड़े नाराज हुए लेकिन पंडित जी ने उनको यह कहकर शांत किया कि वह हमारा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है और संसद का अभिन्न अंग है। हकीकत में उस समय नेताओं के नीतियों पर मतभेद तो होते थे लेकिन मनभेद कभी नहीं रहे थे। प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हार गए थे परंतु उनके गुर्दे में कुछ समस्या पैदा हो गई जिसका इलाज उस समय केवल अमरीका में हो सकता था। राजीव गांधी ने अमरीका जाने के लिए एक संसदीय शिष्टमंडल तैयार किया और वाजपेयी साहिब के संसद सदस्य न होने पर भी उन्हें सम्मिलित कर लिया गया ताकि वह अमरीका जाकर अपना इलाज करवा सकें। यह तथ्य वाजपेयी साहिब ने संसद के अंदर अपने भाषण में उजागर किया था।

प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के समय पाकिस्तान ने कश्मीर समस्या को मानवाधिकारों के तहत जिनेवा में होने वाली कांफ्रैंस में रखा और दूसरे देशों की सहायता से वह इस प्रस्ताव को पारित करवाना चाहते थे। नरसिम्हा राव इस दुविधा में पड़ गए कि जिनेवा में कश्मीर के मामले में अपनी राय रखने के लिए किसको भेजा जाए। आखिर उन्होंने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को चुना और उनके साथ प्रसिद्ध वकील सलमान खुर्शीद और जम्मू-कश्मीर के नेता फारूक अब्दुल्ला को भेजा। हकीकत में इन तीनों को देखकर पाकिस्तान के कूटनीतिज्ञ आश्चर्यचकित हो गए। जिस ढंग से वाजपेयी साहिब ने कश्मीर के मसले पर भारत की राय रखी उसके परिणामस्वरूप प्रस्ताव पारित न हो सका और भारत की छवि विश्व में बिगडऩे से बच गई। 

पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के समय सोमनाथ चटर्जी संसद के माननीय स्पीकर थे। विपक्ष ने उनके खिलाफ हस्ताक्षर करके एक प्रस्ताव भेजा, जिसमें वाजपेयी साहिब का नाम भी शामिल था। नाम पढ़ते ही सोमनाथ चटर्जी ने इस्तीफा देने का मन बना लिया। उन्होंने वाजपेयी साहिब को कहा कि अगर मैं पक्षपाती हूं तो मुझे स्पीकर रहने का कोई अधिकार नहीं। इस पर वाजपेयी ने उनसे मिलकर समझाते हुए कहा कि मैं विपक्ष का नेता हूं, जो भी कागज आएगा उस पर मुझे हस्ताक्षर करने ही होंगे और आप पूरी तरह बेकसूर हैं, संसद को ठीक ढंग से चला रहे हैं, इस पर चटर्जी ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया। 

आदर्श व्यक्ति
वर्तमान नेताओं को गुजरे समय के राजनीतिज्ञों को अपने आदर्श व्यक्ति मानना चाहिए जो राष्ट्रहित में हमेशा सभी तरह के मतभेदों से ऊपर उठकर आपसी सहयोग से समस्याओं का समाधान करते थे। सत्ता पक्ष की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष की हर उचित मांग पर गौर करे। विपक्ष की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह सत्तापक्ष के उचित, न्यायसंगत और जनहितैषी काम की प्रशंसा करे और लोगों को अधिकारों से वंचित करने वाले कार्यों की खुलकर आलोचना करे। जैसे अटल बिहारी वाजपेयी इंदिरा गांधी के बहुत बड़े आलोचक थे लेकिन पाकिस्तान के साथ 1971 की जंग के बाद उन्होंने संसद में खड़े होकर उन्हें दुर्गा कह कर सम्मान दिया था। चूंकि प्रजातंत्र में कोई भी एक पार्टी सदा सत्ता में नहीं रहती, सत्ता आनी-जानी है, मगर अपनी परम्पराओं को कायम रखना सभी राजनीतिज्ञों का नैतिक, संवैधानिक, प्रजातांत्रिक कत्र्तव्य बनता है।-प्रो. दरबारी लाल पूर्व डिप्टी स्पीकर, पंजाब विधानसभा

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