आज से होगा होला मोहल्ला का आरंभ, जानें रोचक जानकारी

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शुक्रवार 22 मार्च से लेकर रविवार 24 मार्च तक होला मोहल्ला मनाया जाएगा। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने खालसा की संरचना करने के बाद चैत्र वदी 1 वाले दिन होली से आगामी दिन होला-मोहल्ला नाम का त्यौहार मनाना शुरू किया। आनंदपुर साहिब के निकट गांव अगंमपुर के स्थान पर एक खुले मैदान में गुरु जी ने 22 फरवरी 1701 ई. को सारी संगत को जुलूस की शक्ल में आनंदपुर साहिब से वहां पहुंचने के लिए कहा। गुरु जी ने इस खुले मैदान में सिख योद्धाओं को दो हिस्सों में बांट दिया और उनके घुड़सवारी, नेजाबाजी, तलवारबाजी, गत्तका तथा कुश्ती मुकाबले करवाने शुरू कर दिए। 


अगंमपुर में होला मोहल्ला मनाए जाने के बाद ही इसे होलगढ़ के नाम से बुलाया जाने लगा। भाई काहन सिंह जी नाभा गुरमति प्रभाकर में होले मोहल्ले बारे बताते हैं कि होला मोहल्ला एक बनावटी हमला होता है, जिसमें पैदल तथा घुड़सवार शस्त्रधारी सिंह दो पार्टियां बनाकर एक खास जगह पर हमला करते हैं। भाई नाभा ‘महान कोष’ में होला-मोहल्ला को परिभाषित करते हुए लिखते हैं कि शब्द होला ‘एक सैन्य प्रभार’ शब्द से लिया गया है तथा मोहल्ला शब्द का अर्थ है ‘सिखों का एक संगठित जुलूस या एक सेना’। भाई वीर सिंह जी ‘कलगीधर चमत्कार’ में लिखते हैं कि मोहल्ला शब्द से भाव है, ‘मय हल्ला’। मय का भाव है बनावटी तथा हल्ला का भाव है हमला।

सिख इतिहास तथा सिख धर्म में होले मोहल्ले की खास महत्ता है। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा होला मोहल्ला शुरू किए जाने से पहले बाकी गुरु साहिबान के समय एक-दूसरे पर फूल तथा गुलाल फैंक कर होली मनाने की परम्परा चलती रही है, पर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने होली को होला मोहल्ला में बदल दिया। गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिंहों की दो पार्टियां बनाकर एक पार्टी के सदस्यों को सफेद वस्त्र पहना दिए तथा दूसरे को केसरी। फिर गुरु जी ने होलगढ़ पर एक गुट को काबिज करके दूसरे गुट को उन पर हमला करके यह जगह पहली पार्टी के कब्जे में से मुक्त करवाने के लिए कहा। इस समय तीर या बंदूक आदि हथियार बरतने की मनाही की गई क्योंकि दोनों तरफ गुरु जी की फौजें ही थीं। आखिर केसरी वस्त्रों वाली सेना होलगढ़ पर कब्जा करने में सफल हो गई। गुरु जी सिखों का यह बनावटी हमला देखकर बहुत खुश हुए तथा बड़े स्तर पर हलवे का प्रसाद बनाकर सभी को छकाया गया तथा खुशियां मनाई गर्ईं। उस दिन के बाद आज तक श्री आनंदपुर साहिब का होला-मोहल्ला दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखता है। गुरु जी के समय भी विभिन्न खेलों में जीतने वालों को बड़े इनाम देकर सम्मानित किया जाता था। गांव अगंमपुर में ही भाई नंदलाल गोया जी की गुरु जी के साथ मुलाकात हुई तथा वह सदैव के लिए गुरु चरणों के ही होकर रह गए। 

जैसे होली पर एक-दूसरे पर रंगों की बौछार की जाती है, उसी तरह होला-मोहल्ला के पर्व पर एक-दूसरे पर फूल तथा गुलाल फैंका जाता है। निहंग सिंह गत्तके का बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं तथा यह स्वयं रक्षा करने तथा हमला करने की सबसे बड़ी कला है। आज भी तख्त श्री केसगढ़ सहिब में पांच प्यारे साहिबान होले मोहल्ले की अरदास करके किला आनंदगढ़ साहिब में पहुंचते हैं। वहां निहंग सिंह शस्त्रों से लैस होकर हाथियों और घोड़ों पर सवार होकर एक-दूसरे पर गुलाल फैंकते हुए नगाड़ों की चोटों में बैंड-बाजा बजाते हुए किला होलगढ़, माता जीतो जी का दोहुरा से होते हुए चरण गंगा के खुले मैदान में पहुंचते हैं। वहां कई तरह के खेल घुड़दौड़, गत्तका, नेजाबाजी आदि होते हैं। आखिर बाकी गुरुद्वारा साहिबान की यात्रा करता हुआ यह नगर कीर्तन श्री केसगढ़ साहिब में पहुंच कर समाप्त होता है। 

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