कानून व्यवस्था व न्याय वितरण में मीडिया का योगदान

2021-08-02T09:57:31.897

किसी भी संगठित व्यवस्था का आधार कानून होता है, जिसका उद्देश्य  न्याय की स्थापना करना होता है। वास्तव में न्याय ही व्यक्तियों,  समूहों, व समुदायों को एक सूत्र में बांधता है। जीवन के पथ प्रदर्शन के लिए यह किसी भी  नियम  से अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसी तरह न्याय का अर्थ सत्य, नैतिकता तथा शोषणविहीनता की स्थिति में ही पाया जा सकता है। इन्हीं तथ्यों की पृष्ठभूमि में कानून-व्यवस्था बनाने व न्याय वितरण में मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है तथा भारतीय लोकतंत्र के एक सशक्त व मजबूत स्तंभ के रूप में जाना जाता है। 

 

मीडिया ने विश्व में हुई कई क्रांतियों, जैसे कि अमरीकी स्वतंत्रता आंदोलन, फ्रांसीसी आंदोलन  तथा  इसी  तरह  भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक अनुकरणीय  भूमिका निभाई है। आज के  समय  में  मीडिया हर क्षेत्र में अपरिहार्य बन गया है। चाहे वह प्रिंट, इलैक्ट्रॉनिक या फिर सोशल मीडिया हो, यह हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से समाज में अपना सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव डालता आया है। 

 

मीडिया ने जहां जनता को निर्भीकतापूर्वक जागरूक करने, भ्रष्टाचार उन्मूलन, सत्ता पर तर्कसंगत नियंत्रण एवं जनहित कार्यों में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है वहीं लालच, भय, द्वेष, स्पर्धा व राजनीतिक कुचक्र के जाल में फंसकर अपनी भूमिका को समय-समय पर कलंकित भी किया है। यैलो जर्नलिज्म को अपनाना, ब्लैकमेल द्वारा दूसरों का शोषण करना,  चटपटी खबरों को तरजीह देना और  खबरों को  तोड़-मरोड़ कर पेश करना, दंगे भड़काने वाली खबरों को प्रकाशित करना, भय या लालच में सत्तारूढ़ दल की या विपक्ष की चापलूसी करना, अनावश्यक रूप से किसी  की  प्रशंसा  या आलोचना करना तथा ईमानदारी, नैतिकता व कर्तव्यनिष्ठा से संबंधित खबरों को नजरअंदाज करना आजकल मीडिया के सामान्य लक्षण हो गए हैं।

 

वर्तमान में जब आम जनता न्याय व्यवस्था बनाने वाली संस्थाओं जैसे कि पुलिस, अभियोजन पक्ष और न्यायपालिका में  भ्रष्टाचार की  झलक  देखती है तब उनका विश्वास इन संस्थाओं से उठने लगता है तथा केवल मीडिया ही ऐसा तंत्र रह जाता है जो लोगों को सच्चा मित्र व हमराज लगने लगता है। मीडिया ने कई प्रकार के स्टिंग ऑप्रेशनों द्वारा पुलिस व न्यायपालिका व अन्य कई संस्थाओं का पर्दाफाश किया है तथा पीड़ित वर्ग को न्याय दिलवाने में अहम रोल अदा किया है। इसके अतिरिक्त देश को खंडित करने वाली ताकतों, जैसे कि आतंकवाद, माओवाद मानव तस्करी व नशा माफिया के विरुद्ध अपनी लेखनी व प्रखर निगाहों से समय-समय पर इन सभी का काला चेहरा समाज व सरकार के सामने प्रस्तुत किया है। इन सभी जोखिम भरे कार्यों के लिए कई बार मीडियाकर्मियों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी है। इसके अतिरिक्त दैनिक स्तर पर होने वाले कई प्रकार के सामाजिक, नैतिक व आर्थिक अपराधों  को  तुरंत  प्रकाशित करके  अपराधियों को पकडऩे व लोगों में जागरूकता लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसी तरह शहीदों के सम्मान में प्रेरक व उत्साहवर्धक खबरों के प्रसारण से मीडिया अपनी सकारात्मक भूमिका निभाता आ रहा है तथा बाढ़ या अन्य प्राकृतिक या मानवकृत आपदाओं के समय जनसहयोग उपलब्ध करवा कर मानवता की सच्ची सेवा कर रहा है।  परंतु भौतिकवाद के इस युग में मीडिया भी कहां ‘सत्यम-शिवम-सुंदरम’ रह पाया है।

 

मीडिया के कुछ लोग भी अपनी कलम का दुरुपयोग करते हुए कहीं न कहीं समाज में अराजकता का माहौल बनाने में अपनी भूमिका निभाते आ रहे हैं। भारत में समय-समय पर घटित हुए कई प्रकार के दंगे, जैसे कि गोधरा कांड (2002), मुजफ्फरनगर दंगा (2013), दिल्ली में भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम पर शाहीन बाग में भड़के दंगे (2019-2020) इत्यादि  में कुछ मीडिया वालों ने अपनी कलम का दुरुपयोग करते हुए आग में घी डालने का काम किया तथा समाज में शांति, सौहार्द, समरसता की भावना को आघात पहुुुुंचाया। दूसरों को दर्पण दिखाने वाले बुद्धिजीवी पत्रकार यदि अपने चेहरे पर कालिख की परतें चढ़ा लें तब मीडिया का पूरा वर्ग कलंकित होना स्वाभाविक हो जाता है।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 19(1)ए में स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्ति का अधिकार है, मगर इसके साथ-साथ अनुच्छेद 19(2) में कुछ प्रतिबंध भी हैं, जिनका पालन करना भी उतना ही आवश्यक है जिसे मीडिया के लोग कई बार नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार तो कानून की अनभिज्ञता व अज्ञानता के कारण भी एकतरफा भोंपू बजाते रहते हैं तथा संबंधित व्यक्तियों को अपूरणीय क्षति पहुंचा देते हैं। वर्ष 2019 में हाथरस (उ.प्र.) की घटना, जिसमें एक लड़की का तथाकथित बलात्कार एवं हत्या हुई, में एकतरफा भोंपू बजा-बजाकर वहां दंगे भड़का दिए। इसी तरह अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को हत्या का रूप देकर उसकी प्रेमिका रिया चक्रवर्ती को मुजरिम  ठहरा कर सारे समाज की नजरों में उसे अपमानित किया। इसी तरह जैसिका लाल हत्या व निर्भया हत्याकांड इत्यादि अनेकों  घटनाओं में मीडिया ट्रॉयल किया गया तथा न्यायपालिका पर आवश्यकता से अधिक दबाव बनाया।

मीडिया को पता होना चाहिए कि न्यायप्रणाली के अंतर्गत एक निर्धारित प्रक्रिया को अपनाना आवश्यक होता है तथा प्रत्येक अपराधी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसके विरुद्ध  सभी  तथ्य  सिद्ध न  हो  जाएं। सर्वोच्च  न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने 2015 में एक निर्णय में कहा था कि मीडिया ट्रायल न्याय को पटरी से उतार देता है तथा लोगों का न्यायपालिका पर से विश्वास उठने लगता है। 

इस समय न्याय की देवी, जो अपने  एक हाथ में तलवार और दूसरे में तराजू, जिसके दोनों पलड़े बराबर हैं तथा जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी है, का एक पलड़ा ऊंचा उठ गया लगता है और मीडिया ट्रॉयल वाला दूसरा पलड़ा भारी  दिखाई दे रहा है, जोकि ङ्क्षचता का विषय है। न्याय वितरण में पुलिस, प्रैस व न्यायपालिका की परिपूरक भूमिका होती है तथा तीनों में परस्पर सामंजस्य व  समन्वय होना अति आवश्यक है ताकि पीड़ित व असहाय व्यक्तियों को तुरंत न्याय मिल पाए तथा दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया जा सके। 

समाज की रगों में नवचेतना का संचार करने वाले मीडिया-समुदाय का विशेष कर्तव्य बनता है कि वह आलोक, हाथों में सधी हुई लेखनी लेकर भावों और विचारों का अविरल प्रवाह करके समाज की अभेद्य रक्षा पंक्ति में उल्लेखनीय योगदान दे। मीडिया की बहुआयामी भूमिका को देखते हुए कहा जा सकता है कि वह आज हर प्रकार की सकारात्मक व नकारात्मक भूमिकाएं निभा रहा है। मगर अब समय आ गया है कि मीडिया अपनी शक्ति का सदुपयोग केवल जनहित में करते हुए समाज का मार्गदर्शन करे।
राजेन्द्र मोहन शर्मा 
डी.आई.जी. (रिटायर्ड)
rmsharma4453@gmail.com


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Content Writer

Seema Sharma

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