दीपावली स्पैश्ल: जुआ खेल कर शगुन करने वालों से क्या लक्ष्मी होंगी प्रसन्न

Sunday, October 15, 2017 10:53 AM
दीपावली स्पैश्ल: जुआ खेल कर शगुन करने वालों से क्या लक्ष्मी होंगी प्रसन्न

कार्तिक माह का महत्वपूर्ण अनुष्ठान है ‘दीपावली’। भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी बड़े उत्साह और उमंग के साथ यह पर्व मनाया जाता है। नई फसल आने का संकेत और अन्धकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक, हर्षोल्लास का यह त्यौहार  खुशियों के साथ मनाया जाता है। बढ़ती हुई कीमतों और कमर तोड़ महंगाई ने जहां त्यौहारों में फीकापन लाना शुरू कर दिया है वहीं चंद लोग अपनी मेहनत से इकट्ठी पूंजी को त्यौहारों पर जुए के माध्यम से बर्बाद कर देते हैं।


कई लोगों की धारणा है कि जुआ खेलने से लक्ष्मी प्रसन्न होती है और भाग्य का दरवाजा खुल जाता है। उन्हें जुआ खेलना शगुन लगता है। आधुनिक बनने की ललक में यह जानते हुए कि ये ताश के मनमोहक पत्ते सिर्फ दिखावा हैं, फिर भी बर्बादी का लबादा खुद ओढ़ लेते हैं।


दीपावली पर जुए की लत कइयों का दिवाला निकाल देती है फिर भी लोगों का मन नहीं भरता और एक के दस और दस के सौ करने के चक्कर में लाखों रुपए हार जाते हैं। मालवा के राजा सेन को जुए में हार जाने के कारण काफी कष्टों का सामना करना पड़ा था और युधिष्ठिर को वनवास भोगना पड़ा था। चंद्रगुप्त के खजाने एक दम खाली होने के उपरान्त चाणक्य की कूटनीति के कारण धन प्राप्त करने के लिए सैंकड़ों जुआ घर खोलने पड़े। आज के युवा लोग महाभारत युग की परंपराओं को तोडऩा नहीं चाहते। जुआ प्राचीन समय से चला आ रहा है और आज भी जुआरियों की विश्व भर में कमी नहीं है। अमरिकी राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन की राय में जुआ लालच का बेटा, भेदभाव का भाई और शरारत का बाप है।


नैतिकता और स्वयं का विवेक त्याग कर दीपावली की रात्रि को जुआ खेलने बैठ कर स्वयं अपने जीवन को तो कलुषित करते ही हैं, साथ ही साथ आने वाली पीढ़ी की बर्बादी का कारण भी बनते हैं। आजकल तो पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी ताश के पत्ते फैंटने बैठ जाती हैं जिस तरह मादक पदार्थों की उत्तेजना समाप्त होने के पश्चात पछतावे और उदासी के अलावा कुछ नहीं मिलता उसी तरह जुए में भी हार के बाद आत्मग्लानि के सिवाय कुछ नहीं मिलता। महर्षि मनु ने तो जुए को दुष्परिणाम वाला व्यसन माना है।

 

भाईचारे, मोहब्बत के त्यौहार पर जान बूझकर जुए की भेंट चढ़ते धन को देखकर एहसास होता है कि हम कंगाली को आमंत्रण दे रहे हैं न कि मिलाप व आत्मीयता को बढ़ा रहे हैं। अत: ऋग्वेद में आई सूक्ति को सदैव याद रखें जिसमें जुए के संबंध में लिखा है।

 

‘अक्षे मार्दीव्य, अर्थात ‘जुआ मत खेलें’। (यु.रा.)
 



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