न्यायालय ने नारायण साई को ‘फर्लो’ दिए जाने के फैसले को किया खारिज

10/20/2021 8:50:46 PM

नयी दिल्ली, 20 अक्टूबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि ‘फर्लो’ जनहित के लिहाज से संतुलित होना चाहिए और कुछ श्रेणियों के कैदियों को यह रियायत देने से मना किया जा सकता है। न्यायालय ने इसके साथ ही गुजरात उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें स्वयंभू संत आसाराम के बेटे व दुष्कर्म के दोषी नारायण साई के लिये 14 दिन के लिए ‘फर्लो’ (एक प्रकार का पैरोल) की मंजूरी दी गई थी।


शीर्ष अदालत ने कहा कि साई और उनके पिता के प्रति वफादारी रखने वाले लोगों की बड़ी संख्या है और सार्वजनिक शांति और अमन-चैन भंग होने की तार्किक आशंका है।


न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने साई को ‘फर्लो’ देने के अदालत के 24 जून के आदेश को चुनौती देने वाली गुजरात सरकार की याचिका स्वीकार कर ली।


न्यायालय ने कहा, “उपरोक्त कारणों से, हम याचिका को स्वीकार करते हैं और आक्षेपित फैसले और उच्च न्यायालय के 24 जून 2021 के आदेश को दरकिनार करते हैं।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘फर्लो’ कोई पूर्ण अधिकार नहीं हैं और इसे देना कई बातों पर निर्भर करता है।

न्यायालय ने कहा, “फर्लो कारावास की एकरसता को तोड़ने और अपराधी को पारिवारिक जीवन व समाज में एकीकरण के साथ निरंतरता बनाए रखने में सक्षम बनाने के लिए है। फर्लो का दावा यद्यपि बिना किसी कारण के किया जा सकता है लेकिन कैदी को फर्लो का दावा करने का पूर्ण कानूनी अधिकार नहीं है।”

पीठ ने कहा, “फर्लो इस बात को ध्यान में रखकर दी जानी चाहिए कि यह जनहित के संतुलन के अनुरूप हो और कुछ श्रेणियों के कैदियों को इसे देने से इनकार किया जा सकता है।”

न्यायालय ने कहा कि ‘फर्लो’ का दिया जाना नियम 3 और नियम 4 से नियमित होता है। नियम 3 जहां विभिन्न अवधि की कैद की सजा काट रहे कैदियों को ‘फर्लो’ देने की अर्हता के पैमाने पर रुख साफ करता है वहीं नियम 4 इसकी सीमाएं निर्धारित करता है।


पीठ ने कहा, “नियम 3 में अभिव्यक्ति ‘बरी किया जा सकता है’ का उपयोग पूर्ण अधिकार की अनुपस्थिति को दर्शाता है। नियम 17 में इस पर और जोर दिया गया है जिसमें कहा गया है कि उक्त नियम कैदी को फर्लो पर रिहाई का दावा करने का कानूनी अधिकार प्रदान नहीं करते हैं। इस प्रकार फर्लो पर रिहाई नियम 3 और 4 द्वारा परिचालित एक विवेकाधीन उपाय है।”

न्यायालय ने कहा कि व्यापक और सामान्य शब्दों में तैयार किए गए सिद्धांतों के रूप में, कैदी को एक विशिष्ट आवश्यकता को पूरा करने के लिए पैरोल दी जाती है, निर्धारित संख्या में वर्षों की सेवा के बाद ‘फर्लो’ बिना किसी कारण के दी जा सकती है।


मामले पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि साई के ‘फर्लो’ के आवेदन को पुलिस महानिदेशक ने आठ मई, 2021 को एक आदेश द्वारा खारिज कर दिया था, जिन्होंने एसीपी, डीसीपी और जेल अधीक्षक की समवर्ती राय पर फर्लो देने से इनकार करने पर भरोसा किया था। उसने कहा कि साई की कोठरी से एक मोबाइल फोन मिला था और उसने बाहरी दुनिया से अवैध तरीके से संपर्क रखने की कोशिश की, इसलिए जेल अधीक्षक ने राय दी थी कि उसे ‘फर्लो’ नहीं दी जानी चाहिए।


गुजरात उच्च न्यायालय की एकल पीठ के 24 जून 2021 के आदेश में साई को दो हफ्तों के लिए ‘फर्लो’ दी गयी थी, लेकिन खंडपीठ ने 13 अगस्त तक इस पर रोक लगा दी थी और इसके बाद राज्य ने 24 जून के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था।


शीर्ष अदालत ने 12 अगस्त को उच्च न्यायालय के साई को दो हफ्तों के लिये फर्लो देने के फैसले पर रोक लगा दी थी।

सूरत की एक अदालत ने साई को 30 अप्रैल 2019 को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 376 (दुष्कर्म), 377 (अप्राकृतिक अपराध), 323 (हमला), 506-2 (आपराधिक धमकी) और 120-बी (षड्यंत्र) के तहत दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सजा सुनायी थी।


साई और उसके पिता आसाराम के खिलाफ सूरत की रहने वाली दो बहनों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसके बाद राजस्थान में एक लड़की के बलात्कार के आरोप में आसाराम को 2013 में गिरफ्तार किया गया था। सूरत की पीड़तों में से बड़ी बहन ने आसाराम पर आरोप लगाया था कि जब वह उसके अहमदाबाद आश्रम में रही थी, उस समय 1997 से 2006 के बीच आसाराम ने उसका यौन उत्पीड़न किया था। छोटी बहन ने साई पर आरोप लगाया था कि जब वह 2002 से 2005 के बीच सूरत के जहांगीरपुरा इलाके में आसाराम के आश्रम में रही थी, तब उसने उसका यौन उत्पीड़न किया था। साई को दिल्ली-हरियाणा सीमा से 2013 में गिरफ्तार किया गया था।


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