कौन सी वजह से भगवान शिव को लेना पड़ा अर्धनारीश्वर रूप

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हिंदू धर्म में भगवान शिव को कई अलग-अलग रूपों में पूजा जाता है। उन्हीं रूपों में से एक है अर्धनारीश्वर का रूप जिसका अर्थ है कि आधा हिस्सा नारी का और आधा नर का। इस आधे स्वरूप में भगवान शिव अपनी पत्नी उमा के साथ अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। कहा जाता है कि नर और मादा ऊर्जा का संश्लेषण सभी सृजन का आधार है। इसलिए शिव और शक्ति एक साथ मिलकर इस ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान शिव ने ये रूप अपनी मर्जी से धारण किया था। लेकिन आज हम आपको इसके पीछे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में बताने जा रहे हैं। 
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एक पौराणिक कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी इस बात से वे बहुत दुःखी हुए। उसी समय आकाशवाणी हुई हे ब्रह्म! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया लेकिन उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक भगवान शिव का ध्यान लगा कर बैठे रहे। 
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एक दिन उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया।  शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा! तुमने प्रजा की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया।
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ब्रह्मा ने कहा कि एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से प्रजा को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्ष की पुत्री हो गई। इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर और अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही है भगवान के अर्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया।
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