Kundli Tv- भगवान विष्णु से जुड़ा ये रहस्य नहीं जानते होंगे आप

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तुलसीदास से द्वारा रचा गया रामचरित्र मानस वो ग्रंथ है, जिसमें उन्होंने राम जी की जीवनी के ऊपर दृष्टि डाली है। हिंदू धर्म में इस ग्रंथ को बहुत ही महत्वपूर्ण और पावन ग्रंथ माना जाता है। इसमें कई एेसे श्लोक आदि हैं, जिनके द्वारा हमें राम जी के चरित्र आदि के बारे में जान सकते हैं। आज हम आपको तुलसीदास के इसी प्रसिद्ध ग्रंथ के एक श्लोक के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसमें श्रीराम के तलवे में मौज़ूद चार चिन्ह यानि निशानों के बारे में बताया है। रामचरित्र मानस में लिखा श्लोक-
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“ललित अंक कुलसादिक चारी”

अर्थात- भगवान राम के पग तलवे में चार चिन्ह अंकित हैं।
*कमल
*वज्र
*अंकुश
*ध्वजा


आइए जानते है इनमें से 3 के बारे में जिनके साथ पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई है कि आख़िर कैसे प्रभु श्री राम के पग तलवे में आए ये चिन्ह-
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कमल-
एक पौराणिक कथा के अनुसार एक हाथी के पैर को मगरमच्छ ने अपने मुंह में पकड़ लिया। वह हाथी को खाना चाहता था। हाथी उससे बचने के लिए चिल्लाने लगा। उसने अपनी सूंड में एक कमल पुष्य लिया और भगवान को पुकारने लगा। आपको बता दें कि भगवान विष्णु को कमलनयन कहा जाता है, क्योकि उन्हें कमल पुष्य अति प्रिय है और ये तो सभी जानते हैं कि श्रीराम विष्णु का एक ही स्वरूप है। हाथी की ये पुकार हे कमलपति कमलनयन भक्तवत्सल प्रभु मेरी रक्षा कीजिए, सुनकर भगवान नंगे पांव दौड़े चले आए और हाथी को मगरमच्छ के चंगुल से बचाया। कहा जाता है कि इसके बाद गज यानि हाथी ने सूंड में कमल पुष्प को बड़े ही प्रेम व भक्ति से भगवान को अर्पित की। भगवान ने उस भक्ति रूपी कमल को अपने पांव के तलवे में स्थापित कर लिया और हाथी से कहा कि ये भक्ति रूपी कमल हमारे पांव के तलवे में अनन्त काल तक रहेगा।
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वज्र-
कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार विष्णु जी किसी जगह बैठकर तपस्या कर रहे थे तब वहां एक वृक्ष उग गया जिसे गुड़हल के नाम से जाना गया। कहते हैं कि उस गुड़हल के वृक्ष ने अपनी टहनी से विष्णु जी को धूप से बचाने के लिए छाया कर दी और दस हज़ार वर्षों तक लगातार विष्णु जी पर पुष्पों की बरसात करता रहा। लेकिन विष्णु जी ने फिर अपने नेत्र नही खोले। जिससे वृक्ष क्रोध में आ गया। उसने पुष्प को पत्थर में बदल दिया और उन्हें भगवान पर बरसाने लगा। अचानक भगवान विष्णु जी के नेत्र खुल गए। पत्थर लगने के कारण भगवान का सारा शरीर घायल हो चुका था। परंतु भगवान ने फिर भी उसे कुछ नहीं कहा बल्कि उसे वरदान दिया। उसे भक्ति का वरदान देकर पत्थर रूपी पुष्पों को अस्त्र में परिवर्तित करके वज्र बना दिया और वृक्ष से कहा कि ये भक्तिरूपी पुष्प वज्र हमारे पांव के तलवे में तुम्हारी निशानी के रूप में अनन्तकाल तक रहेगी।
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अंकुश-
नारयणी नाम की एक नाग कन्या थी। कहते हैं कि इस नाग कन्या ने भगवान विष्णु को खुश करने के लिए निराहार रहकर पच्चास हज़ार वर्षों तक घोर तपस्या की। इसकी तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु प्रगट हुए और उसे वर मांग ने को कहा। कन्या ने कहा कि प्रभु मैं सदा आप के साथ रहना चाहती हूं, आप के साथ रहकर आप पर आने वाली हर मुसीबत और दैहिक, दैविक, भौतिक तापों का हनन करना चाहती हूं। इसके अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए। कन्या की बात सुनकर भगवान विष्णु ने उस कन्या को अंकुश रूप में परिवर्तित करके अपने पग के तलवे में स्थापित कर लिया।
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