मणिमहेश यात्रा : नारियल बलि के साथ डल झील को पार करेंगे शिव जी के चेले

भरमौर: मणिमहेश डल झील को सप्तमी के दिन सचूंई गांव के शिव जी के चेले पार करते हैं और उसी परंपरा का निर्वहन करते हुए इस वर्ष भी सप्तमी के दिन ही वे इस प्रक्रिया को पूरा करेंगे। सचूंई गांव के शिव जी के चेलों विजय कुमार, पवन कुमार, धर्म चंद व चमन लाल ने बताया कि सप्तमी को शिव जी के चेले डल पार करने की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। उसके बाद ही शाही स्नान शुरू हो जाता है।
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16 सितम्बर को शिव डल पार करने की परंपरा का होगा निर्वहन
उन्होंने कहा कि शिव जी की छड़ी सचंूई से चौरासी मंदिर पहुंचेगी। 14 सितम्बर को यह पवित्र छड़ी चौरासी मंदिर परिसर में ही रहेगी। 15 को चौरासी परिक्रमा के बाद सुबह चौरासी से रवाना होगी तथा रात्रि विश्राम इस बार धनछो में करेगी। 16 को सप्तमी के दिन 12 से 2 बजे के बीच सभी चेले शिव डल को पार करने की परंपरा का निर्वहन करेंगे। उसके बाद राधाष्टमी के पर्व का स्नान शुरू हो जाएगा। पवित्र छड़ियां 17 सितम्बर को वापस हड़सर तथा 18 सितम्बर को अपने स्थान सचूंई लौटेंगी।

पौराणिक मान्यताओं के आधार पर होती है पूरी प्रक्रिया
माननीय न्यायालय के आदेशों का निर्वहन करते हुए इस बार भी नारियल की बलि के साथ ही डल पार करने की परंपरा अदा की जाएगी। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया पौराणिक मान्यताओं के आधार पर हर वर्ष होती है। इस पूरी प्रक्रिया में दशनामी अखाड़ा, चरपटनाथ व भद्रवाह से आई सभी छड़ियां उनके साथ इकट्ठी ही रहती हैं।

प्रशासन से किया ये आग्रह
उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि जब सभी छडिय़ां डल झील पर पहुंच जाती हैं तो जो शिव जी के चेलों का बैठने का स्थान होता है वहां लोगों ने दुकानें लगा रखी होती हैं उन्हें वहां से हटाया जाए ताकि उस समय चेलों को कोई कठिनाई न हो। जब चेलों का यह समूह हड़सर में रात्रि विश्राम को पहुंचता है तो वहां के गौरी शंकर मंदिर में साधुओं ने कब्जा कर रखा होता है, जिस कारण पवित्र छडिय़ों को रात्रि विश्राम के लिए साधुओं से भिडऩा पड़ता है। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि यहां साधुओं को ठहरने से रोका जाए।

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