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'पूर्वी लद्दाख में चीन से सामना एक महत्वपूर्ण निर्णय की घड़ी'

2020-06-19T14:35:08.893

नई दिल्ली: पूर्वी लद्दाख में हुए दुखद प्रकरण पर गर्मागर्म बहस चल रही है। टीवी चैनलों को और राजनीतिक दलों को अपनी अपनी बात को भुनाने का अच्छा मौक़ा मिला है। पर एक सैनिक के तौर पर इस घटना का विश्लेषण अलग तरीके से किया जाना चाहिए। हम सब जानते हैं कि ऐसे समय पर आरोप प्रत्यारोप से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। 1962 में और आज के दरमियाँ क्या हुआ और उसके लिए कौन ज़िम्मेदार था, एक अलग मुद्दा है। गलवान में जो हुआ वो एक लम्बे समय से महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान न दिए जाने का परिणाम है।  

 

 
1. सबसे पहली बात ये कि हमारी सेनाओं ने हर परिस्थति का डटकर सामना किया है और सैनिकों ने कभी भी अपनी जान की सुरक्षा की परवाह नहीं की। सेनाओं पर उँगली उठाने से पहले इतिहास को निष्पक्ष दृष्टि से देखिये। कूटनीतिक और राजनीतिक कमियों को सेनाओं की कमी बता कर मुद्दे को भटकाना गलत होगा। 
2. देश की सुरक्षा और सेनाओं से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस आवश्यक है जिस से देश में आम सहमति बन सके और सुरक्षा और सामरिक विषयों पर एक दीर्घकालिक नीति तय की जा सके। दुर्भाग्य से, शांतिकाल में कोई भी उन पर ध्यान नहीं देता। युद्ध या विपत्ति के समय यदि सेनाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया जाए तो उस बात पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप लगना लगभग तय है। इसलिए शांतिकाल में इन सब बातों को चुपचाप टाल दिया जाता रहा है!! सवाल ये है कि इस स्थिति से हम कब उबरेंगे। कब तक राष्ट्रीय सुरक्षा को हम महत्त्व नहीं देंगे? 
3. 1999 में कारगिल में हुई घुसपैठ हमारे लिए एक बड़ी चेतावनी थी। युद्ध में विजय एक बड़ी कीमत चुका कर मिली। युद्ध के मिले महत्वपूर्ण सबक की समीक्षा करने के लिए उच्च स्तरीय कारगिल रिव्यू कमेटी भी गठित की गयी और कमेटी ने महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। लेकिन सिर्फ ब्रिगेडियर सुरिंदर को दोषी ठहराते हुए और बाक़ी की सिफारिशों पर विचार ना करन या विलम्ब एक निश्चित विफलता रही है।
4. पाकिस्तान - चीन गठबंधन ने पिछले एक दशक में खतरनाक रूप ले लिया है। इसी खतरे की धारणा के मद्देनज़र माउंटेन स्ट्राइक कोर को २०१३ में मंजूरी मिल गई थी!
5. 2013 में डेपसांग, 2014 में चूमर, 2017 में डोकलाम और अब पूर्वी लद्दाख में घुसपैठ के बाद चीन के आक्रामक इरादे स्पष्ट हो गए हैं। डोकलाम में 73 दिनों की युद्ध जैसी स्थिति से उबारने को एक उपलब्धि के रूप पेश करना सिर्फ़ एक हद तक ठीक था, क्योंकि चीन ने उसके बाद ढोकलाम में अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ सैनय तैयारी पूरी कर ली हैं। चीन के बदलते इरादों से पूरे तंत्र को सचेत हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।  
6. चिंता का विषय ये है कि इस मुद्दे पर निर्णय लेने वाले सभी अधिकारी अंततः असैनिक हैं तथा वास्तविक  सैन्य मामलों के बारे में उनकी समझ हमेशा सीमित रहेगी। इन मामलों पर दिल्ली में बैठ कर मेज़ थपथपाकर सैन्य नीतियां तय नहीं की जा सकतीं। ऐसा करना अपनी सेनाओं के साथ अन्याय है और उनकी कार्य क्षमता को कम करना है ।अगर मामले की गहराई तक जाएँ तो यही होता आ रहा है। माउंटेन स्ट्राइक कोर को पूरे रूप में गठित नहीं होने दिया गया। और महत्वपूर्ण सुरक्षा उपकरणों की खरीद में लालफीता लगा रहा और ये कहकर बहुत से सामरिक साजोसामान के आयत को रोक दिया गया कि वर्तमान सैन्यबल निकट भविष्य में शत्रु से निपटने के लिए पर्याप्त है। नीति और बजट तय करने वाले ये भूल गए कि हमारे हर कदम को चीन देख रहा है और हमारी हर कमी शत्रु के लिए एक सुनेहरा मौक़ा बन सकती है। 
7. मजबूत दुश्मन से लड़ने से बचने के लिए चीन के साथ आमने-सामने का युद्ध टालना गलत नहीं है, लेकिन इस अवधि को हमें अपनी सैन्य ताकत को जल्द बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए था। लेकिन हमेशा की तरह हम चीन की दोगली नीति का शिकार हुए और परिणाम सब के सामने है। 
8. एलएसी की अलग-अलग परिभाषाओं के बावजूद, किसने हमें निरंतर और संवर्धित सतर्कता रखने से रोका? पूर्वी लद्दाख में चीनी घुसपैठ का समय पर पता नहीं लगा सकना एक बड़ी विफलता है। अगर समय पर पता चल जाता तो इस तरह की गहरी घुसपैठ को रोका जा सकता था, क्योंकि हम निश्चित रूप से चीन द्वारा एकतरफा परिवर्तन की स्थिति पर आपत्ति जता सकते थे। DSDBO परियोजना को सुरक्षित रखने की कार्रवाई हमारी बुनियादी सैन्य आवशयकता है और इसे उचित महत्त्व दिया जाना चाहिए था।
9. अब जब मामला गंभीर मोड़ ले चुका है, तो पूरे राष्ट्र को सरकार और सशस्त्र बलों का समर्थन करने की आवश्यकता है। लेकिन समर्थन का अर्थ ये नहीं है कि सूचना और सुरक्षा तंत्र में कमियों को नज़रंदाज़ कर दिया जाए और उन्हें बहस और विवेचना से परे रखा जाए!!
10. सरकार को यह घोषित करना चाहिए कि अक्साई चिन, शक्सगाम घाटी, गिलगिट, बाल्टिस्तान और पकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं, और भारत उन्हें वापस लेने के लिए प्रतिबद्ध है। ये मामले किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से परे हैं। चीन और पकिस्तान का ये खेल अब विश्व के समक्ष रखने का समय आ चुका है। हमें सीमाओं पर सैन्य रूप से सक्रियता बढ़ानी ही होगी। प्रतिक्रियात्मक नीति का परिणाम तो आप देख ही रहे हैं!!

 

समय है इतिहास से सबक़ लेने का और अपनी सुरक्षा नीति को एक सक्रिय रूप देने का। मेजर जनरल राजेन्द्र सिंह यादव (से.नि)


vasudha

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