बीतते दिनों के साथ सोनिया गांधी और कांग्रेस की बढ़ती मुश्किलें

8/22/2019 4:09:49 PM

नेशनल डेस्क (रवि प्रताप): कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी करीब दो महीने खाली रहने के बाद पार्टी की संकट मोचन सोनिया गांधी ने अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पदभार संभाल लिया है। लेकिन अध्यक्ष का पदभार संभालने के 12 दिन बाद ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व वित्त मंत्री और पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम INX Media मामले में फंसते नजर आ रहे हैं। 

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राष्ट्रीय मुद्दों और देशहित से जुड़े मामलों को लेकर पहले से ही जनता में कांग्रेस के प्रति अविश्वास का माहौल बना हुआ है। ऐसे में हाई कोर्ट से फटकार खाए चिदंबरम के समर्थन में उतरी कांग्रेस के लिए यह पासा उलटा पड़ता नजर आ रहा है। इस साल के आखिर में तीन राज्यों हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड़ के विधानसभा चुनाव होने हैं। जिसकी राह कांग्रेस के लिए आसान नहीं है।

2019 के विधानसभा चुनाव हारने के बाद से ही पार्टी के भीतर असंतोष नजर आ रहा है। ऐसा पहली बार है कि यह असंतोष खुलकर मीडिया के सामने आ गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता खुलकर पार्टी लाइन के खिलाफ जा कर मीडिया में बयान दे रहे हैं, तो कुछ ने पार्टी ही छोड़ दी है। पार्टी में उभरते असंतोष को दबाने के लिए सोनिया गांधी ने जरूर अंतरिम अध्यक्ष पद संभाल लिया है लेकिन यह स्थायी नहीं है। बीतते दिनों के साथ कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही है। अगर कांग्रेस की रीति नीति ऐसी ही रही तो इनकी भूमिका देश में उतनी ही रह जाएगी जितनी लेफ्ट पार्टियों की बची है।

सोनिया की मुश्किल बढ़ाते कांग्रेसी नेता
भाजपा के जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के मसले पर राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्धन द्विवेदी, भुबनेश्वर कलिता (राज्यसभा में कांग्रेस के व्हिप चीफ के पद से इस्तिफा दे दिया था), भूपेंद्र हुड्डा और उनके पूत्र दिपेंद्र हुड्डा, हरिश रावत, मिलिंद देवरा, अदिति सिंह और अनिल शास्त्री ने नरेंद्र मोदी सरकार का समर्थन किया था। ऐसा कम ही देखने को मिला है कि कांग्रेसी नेता पार्टी लाइन से हटकर अपनी व्यक्तिगत राय मीडिया में देते हैं।

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मई, 1999 में पार्टी लाइन के खिलाफ जाने पर शरद पंवार, पीए संगमा और तारिक अनवर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इन्होंने सोनिया गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने का विरोध किया था।

आगामी विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की राह मुश्किल
बीते सोमवार को हरियाणा कांग्रेस इकाई के वरिष्ठ नेता और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा ने परिवर्तन महारैली के दौरान पार्टी हाई कमान को अपने बागी तेवर दिखा दिए हैं। उन्होंने धारा 370 पर पार्टी के खिलाफ जाकर भाजपा के कदम का स्वागत किया है। साथ ही उन्होंने कहा कांग्रेस रास्ते से भटक गई है। कहा जा रहा है कि हुड्डा ने आलाकमान को साफ कर दिया है कि या तो उन्हें प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बनाएं नहीं तो वह पार्टी से अलग हो जाएंगे। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि हरियाणा में पार्टी के कई पॉवर सेंटर है जिनकी दिशा एक-दूजे के विपरीत है। प्रदेश में कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर समेत रणदीप सुरजेवाला, कुलदीप बिश्नोई, और किरण चौधरी के अपने-अपने गुट हैं। अगर कांग्रेस इस गुटबाजी से पार नहीं पाती तो अक्टूबर में होने वाले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की बड़ी हार होना तय है।

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दूसरी तरफ महाराष्ट्र में भाजपा ने विधानसभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू कर दी है। भाजपा की तरफ से प्रदेश भऱ में राज्यस्तरीय यात्राएं और रैलियां की जा रही हैं। वहीं कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रदेश में भ्रम की स्थिति में हैं। उनके पास कोई स्पष्ट रणनीति नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के नाना पटोले जरूर पोल खोल यात्रा शुरू करने वाले हैं। लेकिन इसकी सफलता जमीनी स्तर के कार्यकर्ताऔर पार्टी नेताओं की रणनीति पर निर्भर करती है। अन्य प्रदेशों की भांति यहां भी कांग्रेस अंदरुनी गुटबाजी का शिकार है। पोल खोल यात्रा कितना सफल होगी यह भी कांग्रेस के स्थानीय नेता पृथ्वीराज च्वहाण, विजय वडेट्टीवार और बालासाबेब थोरात के समर्थन पर निर्भर करती है।

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सोनिया गांधी को अपने राजनीतिक अनुभव के बल पर कांग्रेस को इस मुश्किल घड़ी से बाहर निकालना होगा नहीं तो कांग्रेस को अपनी जमीन बचाना ही मुश्किल हो जाएगा।


Author

Ravi Pratap Singh

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