सुप्रीम कोर्ट पहुंचा कृषि कानून का मामला, कांग्रेस सांसद ने लगाया किसानों पर भेदभाव का आरोप

2020-09-28T17:30:03.037

नई दिल्लीः केरल से कांग्रेस के एक सांसद ने नये किसान कानून के तमाम प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुये सोमवार को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। त्रिशूर संसदीय क्षेत्र से सांसद टीएन प्रथपन ने याचिका में आरोप लगाया है कि कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर करार , कानून, 2020, संविधान के अनुच्छेद 14 (समता) 15 (भेदभाव निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है। याचिका में इस कानून को निरस्त करने का अनुरोध करते हुये कहा गया है कि यह असंवैधानिक, गैरकानूनी और शून्य है। इस कानून को रविवार को ही राष्ट्रपति ने अपनी संस्तुति प्रदान की है।

सरकार का दावा है कि नये कानून में कृषि करारों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क का प्रावधान किया गया है. इसके माध्यम से कृषि उत्‍पादों की बिक्री, फार्म सेवाओं, कृषि का कारोबार करने वाली फर्म, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जुड़ने के लिए सशक्‍त करता है। यही नहीं, यह कानून करार करने वाले किसानों को गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति सुनिश्चित करना, तकनीकी सहायता और फसल स्वास्थ्य की निगरानी, ऋण की सुविधा और फसल बीमा की सुविधा सुनिश्चित करता है।

प्रतापन ने अधिवक्ता जेम्स पी थॉमस के माध्यम से दायर याचिका में कहा है कि भारतीय कृषि का स्वरूप टुकड़ों वाला है जिसमें छोटी छोटी जोत वाले किसान है। यही नहीं, भारतीय कृषि की कुछ अपनी अंतर्निहित कमजोरियां हैं जिन पर किसी का वश नहीं है। इन कमजोरियों में भारतीय खेती का मौसम पर निर्भर रहना, उत्पादन को लेकर अनिश्चित्ता और बाजार की अस्थिरता है। इन समस्याओं की वजह से खेती निवेश और उपज के प्रबंधन दोनों ही मामलों में बहुत ही जोखिम भरी है।

याचिका में कहा गया है कि भारतीय किसान की खेती मौसम पर निर्भर रहती है और वह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिये अपनी उपज के मुद्रीकरण के बारे में नहीं सोच सकता है। इसमें कहा गया है कि इसकी बजाये, कृषि उपज विपणन समिति प्रणाली को सुदृढ़ करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रबंधन को प्रभावी तरीके से लागू किया जाना चाहिए।

 


Yaspal

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