बोतलबंद पानी का मतलब शुद्धता की गारंटी नहीं

9/23/2019 11:08:56 AM

नई दिल्ली (अंकुर शुक्ला): अगर आप अपने घर में पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बोतलबंद पानी मंगवाते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों ने बोतलबंद पानी के पैकेजिंग और रखरखाव पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। साथ ही यह भी खुलासा किया है कि स्वच्छ पानी के नाम पर जो बोतल आपके घरों में पहुंचाया जा रहा है, उसमें माइक्रो प्लास्टिक के अंश हो सकते हैं। जो आपके स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या और जोखिम पैदा कर सकता है। 

 

अध्ययन के मामले में अभी हाथ खाली हैं 
विशेषज्ञों के मुताबिक राजधानी दिल्ली में अब तक ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया गया है जिससे बोतलबंद पानी की गुणवत्ता को लेकर किसी निर्णायक नतीजे पर पहुंचा जा सके। बताया गया है कि सरकार के पास वह संसाधन मौजूद नहीं हैं, जिसकी मदद से व्यापक पैमाने पर बोतलबंद पानी की जांच की जा सके। जबकि, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), आईआईटी एवं ऊर्जा और संसाधन संस्थान (टीईआरआई) इस तरह की जांच करने में सक्षम है। डॉ. जुगल किशोर ने बताया कि अगर पानी (जो रयासनों से ट्रीट न किया गया हो) को प्लास्टिक के बजाए शीशे के जार या बोतल में भरकर धूप में रख दिया जाए, तो यह बेहद फायदेमंद साबित होता है। अध्ययनों के जरिए यह स्पष्ट हो चुका है कि सूरज की ऊष्मा और उसकी गर्मी से बैक्टीरिया और वायरस जैसे सूक्ष्मजीवियों को मारने की क्षमता है। जब आप पानी को शीशे के बोतल में रखेंगे तो इससे रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं होगी। 

 

धूप और गंदगी में बोतल रखना खतरनाक 
सफदरजंग सामुदायिक मेडिसिन विभाग के निदेशक और एचओडी डॉ. जुगल किशोर के मुताबिक बोतलबंद पानी (डिस्टिल्ड या मिनिरल वाटर) शुद्धता की गारंटी है, ऐसा सोचना पूरी तरह सही नहीं है। बोतलबंद पानी को स्वच्छ करने की प्रक्रिया में जिस पानी का प्रयोग किया जाता है, उसमें कई ऐसे पदार्थ और सूक्ष्म कीटाणु या जीवाणुओं की मौजूदगी हो सकती है। डॉक्टर के मुताबिक अक्सर यह पाया जाता है कि बोतलबंद पानी के आपूर्तिकर्ता बोतलों को अपनी दुकान के आगे धूप में रख देते हैं, जहां धूप और गर्मी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होती है। गर्मी के संपर्क में आने से प्लास्टिक बोतल प्रतिक्रिया करता है और पानी में माइक्रो फाइबर्स घुलने लगता है।  

 

माइक्रो फाइबर बनता है बीमारियों का कारण 
1-यह ब्लड सेल्स को प्रभावित कर सकता है। जिससे आरबीसी और डब्ल्यूबीसी के स्तर पर असर होता है। ऐसा होने से शरीर में खून की संरचना प्रभावित होने का जोखिम होता है। संरचना प्रभावित होने से व्यक्ति रक्त अल्पता (एनीमिया) का शिकार हो सकता है। 
2-किडनी के लिए माइक्रो फाइबर बेहत नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसके असर से किडनी फेल हो सकती है। 
3-माइक्रो फाइबर लिवर की प्रक्रिया और क्रियाकलाप को बाधित कर सकता है। इससे मस्तिष्क सहित सभी जरूरी और बड़े अंग प्रभावित हो सकते हैं। 
4-लंबे समय तक माइक्रो फाइबर शरीर में पहुंचने से कैंसर भी हो सकता है। शरीर के अंदर जाकर यह सेल्स को चोटिल करता है। बार-बार सेल्स चोटिल होने से कैंसर का जोखिम कई गुणा बढ़ जाता है। 


vasudha

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