श्रीमद्भगवद्गीता: हानि-लाभ का विचार किए बिना युद्ध करो

2021-05-04T10:59:53.53

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श्रीमद्भगवद्गीता
यथारूप
व्या याकार :
स्वामी प्रभुपाद
साक्षात स्पष्ट ज्ञान का उदाहरण भगवद्गीता
हानि-लाभ का विचार किए बिना युद्ध करो

श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक- 
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:।।
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।

अनुवाद एवं तात्पर्य: यद्यपि अर्जुन के पक्ष में विजय निश्चित न थी फिर भी उसे युद्ध करना था क्योंकि यदि युद्ध में मारा भी गया तो वह स्वर्ग लोक को जाएगा। भगवान श्री कृष्ण प्रत्यक्ष रूप से कहते हैं कि अर्जुन को युद्ध के लिए युद्ध करना चाहिए क्योंकि यह उनकी इच्छा है। श्री कृष्ण भावनामृत कार्यों में सुख या दुख, हानि या लाभ, जय या पराजय को कोई महत्व नहीं दिया जाता।

दिव्य चेतना (भावना) तो यही होगी कि हर कार्य श्री कृष्ण के निमित्त किया जाए, अत: भौतिक कार्यों का कोई बंधन (फल) नहीं होता। जो कोई सत्तोगुण या रजोगुण के अधीन होकर अपनी इंद्रिय तृप्ति के लिए कर्म करता है उसे अच्छे या बुरे फल प्राप्त होते हैं किन्तु जो श्री कृष्ण भावनामृत के कार्यों में अपने आपको समॢपत कर देता है वह सामान्य कर्म करने वाले के समान किसी का कृतज्ञ या ऋणी नहीं होता जिसने अन्य समस्त कार्यों को त्याग कर मुकुंद श्री कृष्ण की शरण ग्रहण कर ली है, वह न तो किसी का ऋणी है और न ही किसी का कृतज्ञ।  (क्रमश:) 
 


Content Writer

Jyoti

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