यहां जानिए कैसा शुरू हुआ सर्वपितृ अमावस्या का व्रत

punjabkesari.in Sunday, Sep 25, 2022 - 10:12 AM (IST)

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हिंदू पंचाग व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अश्विन मास की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इस दिन जाने-अनजाने सभी पितरों की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध आदि के कार्य किए जाते हैं। इस दिन का उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है जिन्हें अपने पितरों की मृत्युतिथि स्मरण नहीं रहती। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार इस दिन उन समस्त पितरों के हेतु श्राद्ध कर्म किया जाता है, जिनक परिजनों को अपने पूर्वजों की मृत्युतिथि के बारे में जानकारी नहीं होती।

इस वर्ष रविवार 25 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या है। हिंदू धर्म के कई ग्रंथों व शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि इस दिन पितरों के तर्पण एवं श्राद्ध करने का अलग ही महत्व है। मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति पूरे साल भर में श्राद्ध-तर्पण नहीं करता, अगर वह भी इस तिथि पर श्राद्ध-तर्पण कर लेता है तो उसे सभी तिथियों के श्राद्ध कर्म के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

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मगर सर्वपितृ अमावस्या को लेकर हमारे धार्मिक शास्त्रों में क्या पौराणिक कथा व मान्यताएं वर्णित हैं इस बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। तो आपको बता दें आज हम आपको सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी कथा के बारे में ही बताने जा रहे हैं, तो आइए जानते हैं आखिर क्या है सर्वपितृ अमावस्या से जु़ड़ी पौराणिक कथा-  

पौराणिक समय में अग्निष्वात और बर्हिषपद नाम के दो पितृ देव थे। उनकी मानस कन्या थीं अक्षोदा। अक्षोदा ने पितरों को प्रसन्न करने के लिए एक हजार वर्ष तक बिना किसी विघ्न के तपस्या की। उसके तप से प्रसन्न होकर समस्त पितरगण अक्षोदा के समक्ष प्रकट हुए। उन पितरों में एक तेजस्वी पितृ अमावसु भी थे जिन्हें अक्षोदा बिना पलक झपकाए देखती रही, वो उनमें इस तरह मग्न हो गई कि उसने अपने पितरों की बातों को अनसुना कर दिया।

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पितरों द्वारा जब उसे वर मांगने को कहा गया तो अक्षोदा ने पितरों से कहा- 'हे भगवन अगर आप मुझे वर देना चाहते हैं तो वरदान में आप मुझे स्वीकारें मैं आपका संग चाहती हूं।'

उसकी ये बात सुनकर सभी पितरगण क्रोध में आ गए। उन्होंने अक्षोदा को वरदान की जगह श्राप दिया कि वो पितर लोक से पृथ्वी लोक पर जाएगी। पितरों के द्वारा ऐसा  श्राप दिए जाने पर अक्षोदा उनके पैरों में गिर कर क्षमा मांगने लगी। यह देख पितरों को उस पर दया आ गई। तब पितरों ने दयाभाव से उससे कहा कि श्राप के चलते तुम्हारा मत्स्य कन्या के रूप में जन्म होगा।
 
भगवान ब्रह्मा के वंशज महर्षि पराशर उस मत्स्य कन्या को पति रूप में मिलेंगे और उसके गर्भ से भगवान वेद व्यास जन्म लेंगे। फिर श्राप मुक्त होकर वह फिर से पितर लोक में वापस आ जाएगी।

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इसके बाद सभी पितरों ने अमावसु की प्रशंसा की और कहा- 'आपने सौंदर्य और स्त्री के आगे अपने मन को भटकने नहीं दिया और अपने संयम और नियम पर अडिग रहे, इसलिए आज का दिन आपके नाम से यानि अमावसु नाम से जाना जाएगा।'

ऐसा मान्यता है कि तभी से आश्विन मास का ये दिन पितृमोक्ष अमावस्या के रूप में प्रसिद्ध हुआ।


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Content Writer

Jyoti

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