परिवारों से ही होता है अच्छे समाज का निर्माण

2020-01-13T16:28:06.053

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
हंसता-खेलता परिवार सभी को अच्छा लगता है। ऐसा परिवार जिसकी सुबह ईद के त्यौहार की तरह प्रेम अभिवादन, आलिंगन, प्रसन्नता का प्रदर्शन करती हो। दोपहर को जब परिवार के सभी सदस्य बैठकर एक साथ गपशप करते हुए भोजन करते हैं तो मानो होली का त्यौहार आ गया हो। दिन ढलने पर शाम को जीविकोपार्जन से घर लौटते हुए सदस्यों को देख एक-दूसरे के चेहरे की चमक और आभा दीपावली की लड़ियों जैसी आलोकित हो जाती हो। ऐसे परिवार का हर सदस्य जीवंत होकर जीता है।
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जीते तो सभी हैं, लेकिन कोई जीता है वाह के साथ और कोई आह के साथ। वाह में ही जिंदगी की जिंदादिली है। उसी में जीवन की सार्थकता छिपी है। आह सुनते ही एक उदासी से भरपूर जिंदगी की आकृति उभर कर सामने आ जाती है। जीवन जीने के इन दोनों तरीकों में से अब यह प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर है कि वह वाह की जिंदगी जी कर परिवार, समाज को खुशहाल बनाए या आह के साथ उदासीन जिंदगी जिए। 
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व्यक्तियों के समूह से परिवार बनता है। सामाजिक जीवन का पहला सोपान परिवार ही है। परिवारों से ही समाज का निर्माण होता है। जैसा व्यक्ति होगा वैसा परिवार और जैसा परिवार होगा वैसा ही समाज बनेगा। समाज के अनुरूप देश होगा इसलिए सब कुछ अच्छा होने के लिए यह आवश्यक है कि हमारे हर घर-परिवार का स्वरूप अच्छा हो, संस्कारित हो। परिवार के सभी सदस्यों में परस्पर सामंजस्य बिठाना सबसे बड़ा कत्र्तव्य तो है ही श्रेष्ठ धर्म भी वही है। बड़ों के प्रति कत्र्तव्य, बराबर वालों के प्रति समन्वय और छोटों के प्रति दायित्व निभाना ही सबसे बड़ा धर्म होता है लेकिन यह सब कुछ निर्भर करता है व्यक्तियों की या हमारी-आपकी त्याग करने की भावना पर। प्रेम, त्याग और मर्यादा का नाम ही परिवार है।
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