Independence day: भारत की बहादुर बेटियां आग में ऐसे प्रवेश कर गई जैसे फूलों की सेज पर सोने जा रही हों

8/14/2019 11:14:23 AM

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बात उन दिनों की है जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। मालवा और गुजरात का प्रवेश द्वार कहा जाने वाला ‘रायसेन’ नगर आज फिर एक आक्रांता के हमले का शिकार था। इस नगर के गगनचुम्बी विशाल दुर्ग के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। अल्तमश, बलबन, अलाउद्दीन खिलजी, दिलावर खान, हुशंगशाह, महमूद खान, खिलजी आदि अनेक हमलावर इस दुर्ग पर हमला करते रहे थे। इस दुर्ग का दुर्भाग्य यह था कि मालवा एवं गुजरात को जाने वाले दिल्ली के मार्ग पर यह प्रहरी बन कर खड़ा हुआ था। रायसेन की ऊंची पहाडिय़ां जो विंध्यांचल पर्वत की शाखाएं थीं, गुजरात एवं मालवा जाने के मार्ग को रोके हुए थीं। इन पहाडिय़ों को पार करने के लिए रायसेन के उस दुर्ग को फतह करना जरूरी होता था, जो इन पहाड़ियों के बीचों-बीच सबसे ऊंची पहाड़ी पर गर्व से सीना ताने हुए खड़ा था।
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इस बार रायसेन पर हमला करने वाला था, गुजरात का महत्वाकांक्षी सुल्तान बहादुर शाह जो अपनी सीमाएं लगातार आगे बढ़ा रहा था। वह मालवा को फतह करके रायसेन दुर्ग के द्वार पर आ खड़ा हुआ था। शायद उसका इरादा रायसेन को फतह करके विदिशा, चंदेरी, झांसी, ग्वालियर और आगरा पर अपनी विजय पताका लहराकर दिल्ली तक अपना परचम लहराने का था।

बहादुर शाह का यह पहला हमला नहीं था। वह एक बार पहले भी रायसेन पर हमला कर चुका था, पर उसने रायसेन के महान योद्धा और वीर शासक शैलादित्य से सुलह कर ली थी।

जब पूर्व से सूरज की सुनहरी किरणें रायसेन के किले की मीनारों पर से गुजरीं, तो हरकारे ने ऐसी खबर लाकर दी कि न केवल रानी दुर्गावती, बल्कि सारे रायसेन का कलेजा कांप उठा। हुआ यह था कि शैलादित्य, बहादुर शाह के बुलावे पर मिलने के लिए धार पहुंचा था। बहादुर शाह ने वहां धोखा किया और शैलादित्य को गिरफ्तार करके मांडव की जेल में डाल दिया। उसके हाथी जब्त कर लिए गए। साथ में गए सिपाही और सेवक भी या तो मार डाले गए या फिर गिरफ्तार कर लिए गए।

सिर्फ एक सिपाही बचा था, जो हरकारा बनकर रायसेन पहुंचा था। हरकारा सीधा रानी दुर्गावती के अंत:पुर में पहुंचा और वहां उसने प्रहरी से कहा, ‘‘मैं रानी साहिबा के दर्शन करना चाहता हूं।’’

कुछ क्षणों के बाद वह रानी दुर्गावती के सामने था। वह सौंदर्य की दैदीप्यमान नक्षत्र थीं, पर इससे भी बड़ा गुण उनमें यह था कि वह वीरता का साक्षात अवतार थीं। वह शैलादित्य की वीरता पर मुग्ध होकर उसकी पत्नी बनी थीं पर स्वयं भी कम साहसी नहीं थी। हरकारे की मुखमुद्रा देखकर वह समझ गईं कि वह कोई अच्छा समाचार लेकर नहीं आया, फिर भी अपने धीर गंभीर वाणी में उन्होंने पूछा, ‘‘मंगल सिंह तुम! राजा जी लौटकर नहीं आए?’’

‘‘रानी साहिबा की जय हो, बड़ी बुरी खबर लेकर सेवा में उपस्थित हुआ हूं। सुल्तान बहादुर शाह ने राजा साहब के साथ धोखा किया और उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया है। मैं बड़ी मुश्किल से यह खबर देने आप तक आ पाया हूं। मेरे पीछे-पीछे बहादुर शाह की फौजों ने रायसेन की ओर कूच कर दिया है।’’

रानी दुर्गावती यह समाचार सुन कर हक्की-बक्की रह गईं पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने कहा, ‘‘रायसेन को जीतना या राजा शैलादित्य को गिरफ्तार कर लेना इतना आसान नहीं है। यहां राजपूत रणबांकुरों की बेटियां रहती हैं, जो चूडिय़ां जरूर पहनती हैं पर जब संकट आता है तो वे तलवार उठाने में भी नहीं हिचकतीं और फिर रायसेन तो बहादुरों की खान है। जब तक रायसेन में एक भी बहादुर बाकी है तब तक बहादुर शाह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकता। रायसेन को गुलाम नहीं होने देंगे और राजा शैलादित्य को छुड़ाकर लाएंगे। मंगल सिंह तुम सारे सरदारों को खबर कर दो कि हमने उन्हें याद किया है।’’
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धीरे-धीरे महल में सरदार आना शुरू हो गए। रानी दुर्गावती तब तक मानसिक रूप से सारे संकट का सामना करने के लिए तैयार हो चुकी थीं।

राजपूत सरदारों की उस सभा में दुर्गावती ने कहा, ‘‘आज सुबह हम सबके लिए एक बुरी खबर मिली है। बहादुर शाह ने धोखे से राजा शैलादित्य को कैद कर लिया है, पर रायसेन की यह वीरभूमि हमेशा स्वतंत्र रही है और आगे भी तब तक स्वतंत्र रहेगी, जब तक आप सरीखे, सिर हथेली पर रखकर लडऩे वाले बहादुर इस भूमि पर जन्म लेते रहेंगे। बहादुर शाह की सेनाएं रायसेन की ओर बढ़ रही हैं, वहां एक बहादुर शाह है मगर रायसेन में हजारों बहादुर हैं। हमने उसका पूरी ताकत से मुकाबला करने का फैसला किया है। आप सब लोगों की क्या राय है?’’

रानी दुर्गावती के इस उद्बोधन से उपस्थित सरदारों की भुजाएं फड़क उठीं। उन्होंने एक स्वर में कहा, ‘‘जब तक हमारे शरीर में एक भी सांस बाकी रहेगी, हम सब बहादुर शाह से लड़ेंगे।’’

‘‘मुझे आप सबसे यही उम्मीद थी।’’ रानी दुर्गावती ने कहा, ‘‘इसीलिए मैंने फैसला किया है कि जब तक राजा शैलादित्य कैद में हैं, तब तक आप सबका नेतृत्व उनके छोटे भाई लक्ष्मण सेन करेंगे। इतना कह कर रानी दुर्गावती ने एक सरदार की तलवार अपने हाथ में ले ली। चमचमाती हुई तलवार से उन्होंने अपने सीधे हाथ का अंगूठा चीर डाला। रक्त की धारा बह निकली। उसी रक्त से उन्होंने लक्ष्मण सेन के मस्तक पर तिलक लगाया और कहा, ‘‘लक्ष्मण सेन आज से राजा शैलादित्य की आजादी तक आप रायसेन के शासक हैं। हम आपके नेतृत्व में अपने राजा की मुक्ति एवं रायसेन की स्वाधीनता की रक्षा के लिए अपने आपको समर्पित करते हैं।’’

रानी दुर्गावती ने राजपूत सरदारों की रग-रग में उत्साह फूंक दिया। अब लक्ष्मण सेन रायसेन के शासक थे और अपनी वीर भावज की सलाह से बहादुर शाह के मुकाबले की तैयारियां कर रहे थे। यह तय हुआ कि इस संकट की घड़ी में दुर्गावती के भाई मेवाड़ के राणा रत्न सिंह से भी मदद ली जाए। लिहाजा दुर्गावती के चौदह वर्षीय किशोर पुत्र भूपत राय को मेवाड़ भेजना तय हुआ। दूसरे दिन भूपत राय अपनी मां का आशीर्वाद लेकर अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने मामा की मदद लेने मेवाड़ के लिए रवाना हुआ।

रायसेन का बच्चा-बच्चा बहादुर शाह के मुकाबले की तैयारी कर रहा था और एक दिन देखते ही देखते बहादुर शाह की फौजों ने टिड्डी दल की तरह रायसेन पर आक्रमण कर दिया। विशाल पहाड़ी और उस पर स्थित दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया गया। सारे रास्ते बंद हो गए। दुर्ग की किसी भी बुर्ज पर खड़े होकर जब नजर दौड़ाई जाती, चारों तरफ बहादुर शाह के सैनिक नजर आते। रायसेन से विदिशा तक का लम्बा मार्ग सैनिक छावनी में बदल गया। यह अनुमान लगाना कठिन था कि बहादुर शाह कितनी फौज को लेकर रायसेन पर चढ़ाई करने आया है।

बहादुर शाह लगातार अपना घेरा  तंग करता जा रहा था, पर वह किले की दीवारों तक नहीं पहुंच पा रहा था। उसके सैनिक ज्यों ही किले की ओर बढऩा शुरू करते, किले की बुर्जों पर तैनात राजपूत सैनिकों के तीर उन पर मूसलाधार बरस पड़ते थे। बहादुर शाह भी हर कीमत पर रायसेन पर अधिकार करना चाहता था। वह रायसेन के किले पर लगातार तोपों के गोले बरसा रहा था।
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दिन बीतते चले गए। रायसेन के बहादुर सैनिक रात-दिन अपने किले की रक्षा करते रहे। रायसेन के किले में अनाज की मात्रा कम होने लगी। रानी दुर्गावती ने फैसला किया कि वह एक समय भोजन करेंगी। देखते ही देखते रायसेन की सारी महिलाएं एक समय भोजन करने लगीं।

इधर बहादुर शाह को खबर मिली की मेवाड़ के राणा रत्न सिंह की सेनाएं रायसेन के लिए रवाना हो रही हैं। वह जान गया कि यदि मेवाड़ की सेनाएं आ पहुंचीं, तो वह रायसेन के किले पर अधिकार नहीं कर सकेगा बल्कि रायसेन और मेवाड़ की सेनाओं के बीच पिसकर रह जाएगा।

उसे एक तरकीब सूझी। उसने मांडव के किले में कैद शैलादित्य को अपने पास बुला लिया। बहादुर शाह ने शैलादित्य को समझाया कि वह हर हालत में रायसेन पर कब्जा करना चाहता है, चाहे इसके लिए उसकी फौजें बरसों पड़ी रहें। ऐसी हालत में या तो सारा रायसेन भूख से तड़प-तड़प कर मर जाएगा और यदि रायसेन के सैनिक किले से बाहर निकलेंगे तो गाजर-मूली की तरह काट डाले जाएंगे। ऐसी हालत में सिर्फ एक ही रास्ता है कि शैलादित्य, बहादुर शाह की अधीनता स्वीकार कर इस्लाम धर्म ग्रहण कर ले।

शैलादित्य के मन में अंतद्र्वंद्व चलता रहा। वह जानता था कि रायसेन के किले में इतना अनाज नहीं है कि बहादुर शाह की फौजों का घेरा ज्यादा दिन चले, जो रायसेन के निवासी अपना पेट भर सकें और न रायसेन में इतने सिपाही हैं कि वे बहादुर शाह की फौजों का सामना कर सकें। लाचार शैलादित्य ने बहादुर शाह का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। वह शैलादित्य से सलाहउद्दीन  बन गया। उसके पराधीन होने की यह खबर भी रायसेन पहुंच गई।

रानी दुर्गावती के सारे सपने चकनाचूर हो गए। वह अपने जिस पति को वीर, साहसी और योद्धा  समझती थी, वह इतना कायर निकलेगा इसकी उसे सपने में उम्मीद नहीं थी। वह मेवाड़ की बेटी थी और उसे यह शिक्षा मिली थी कि गुलामी की जिंदगी से मौत बेहतर है।

10 मई 1532 को सूरज फिर उगा और रायसेन के किले की गगनचुम्बी मीनारों से उसकी सुनहरी किरणें रोज की तरह अठखेलियां करने लगीं। शैलादित्य उर्फ सलाहउद्दीन रिहा कर दिया गया। वह थके और हारे हुए जुआरी की तरह रायसेन की पहाड़ी के उस रास्ते पर चढऩे लगा, जो किले के मुख्य दरवाजे को जाता था।
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इधर सूरज की पहली किरण के उगने के साथ ही दुर्गावती ने रायसेन के सारे नर-नारियों और बच्चों को एकत्रित किया।
उसने कहा, जिन राजा शैलादित्य की बहादुरी पर हम सबको घमंड था, वह कायर निकल गए। उन्होंने न केवल बहादुर शाह की पराधीनता स्वीकार कर ली है, बल्कि उन्होंने धर्म भी बदल लिया है। ऐसे कायर की पत्नी कहलाने में मुझे शर्म महसूस हो रही है। पत्नी तो क्या मैं उसकी प्रजा भी नहीं रहना चाहती हूं और उसकी सूरत देखने के बदले में अपनी जान देना पसंद करती हूं।
रायसेन के सारे नर-नारी क्रुद्ध थे। उन्होंने कहा, ‘‘हम भी शैलादित्य को अपना राजा मानने के बजाय अपनी जान देना पसंद करेंगे।’’

रानी दुर्गावती ने कहा, ‘‘किले में अनाज खत्म हो गया है। रायसेन के सारे नर-नारी तीन दिन से भूखे हैं। भूख से तड़प-तड़प कर मरने और एक कायर की प्रजा कहलाने के बजाय हम बहादुरी के साथ मरना पसंद करेंगे। लिहाजा मैं जौहर करना चाहती हूं।’’

रानी दुर्गावती के इस कथन के साथ ही जौहर की चिता सजना शुरू हो गई। पुरुषों ने केसरिया बाना पहन लिया। देखते ही देखते जौहर की चिता धू-धू करके चलने लगी और रायसेन की सात सौ नारियों ने उनमें ऐसे प्रवेश किया जैसे आग की लपटों में नहीं बल्कि फूलों की सेज पर सोने जा रही हों।

किले का फाटक खोल दिया गया। हर-हर महादेव का जयघोष करते हुए रायसेन के बहादुर सैनिक बहादुर शाह के सैनिकों से भिड़ गए। उधर भूपत राय मेवाड़ की सेना के साथ रायसेन आ पहुंचा। वह समझ गया था कि अब सारा खेल खत्म हो चुका है, पर उसने भी अपनी माता के पदचिन्हों पर चलना बेहतर समझा।

देखते ही देखते लक्ष्मण सेन, भूपत राय और रायसेन के सैंकड़ों सैनिकों ने बहादुर शाह की सेनाओं से लड़ते हुए अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए बलिदान दे दिया। शैलादित्य उर्फ सलाहउद्दीन जब रायसेन के किले के भीतर पहुंचा तो वह शानदार शहर एक मरघट में बदल चुका था। वहां सिर्फ जौहर की चिता धू-धू करके जल रही थी, जो मेवाड़ की एक बहादुर बेटी के अभूतपूर्व बलिदान की कहानी कह रही थी। 
 


Niyati Bhandari