विश्व को चीन की ‘ब्लैकमेलिंग’ की कीमत चुकानी पड़ेगी

2021-02-14T06:11:01.09

पूर्वी लद्दाख में चीन-भारत विघटन सौदा एक बुरा सौदा है। गलत न मानो तो यह समझौता पीपल्ज लिब्रेशन आर्मी (पी.एल.ए.) की शर्तों पर हुआ है। दुर्भाग्य से टेबल पर शायद यह एक ही था। भारत की बातचीत करने की क्षमता गंभीर रूप से एन.डी.ए./भाजपा शासन के पिछले 80 महीनों के दौरान कुल राष्ट्रीय शक्ति घटने के कारण बाधित हुई है। रक्षा के खर्च में कटौती से जुड़ी अर्थव्यवस्था ने हमें चपेट में लिया है। निर्णय वास्तविक लाइन के साथ एक व्यापक विघटन नहीं है जिसमें देपसांग, गोगरा, हाट स्प्रिंग, नाकूला तथा अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले भी शामिल हैं। इन सभी स्थानों पर एल.ए.सी. की हमारी धारणा रेखा के पार स्थानांतरित हो गई है और इन सभी स्थानों ने वास्तव में 1959 के चीनी दावा लाइन को वैध बनाया है। 

नवम्बर 1960 की भारत सरकार के अधिकारियों तथा पीपल्ज रिपब्लिक ऑफ चाइना की रिपोर्ट जो सरहद के सवालों पर आधारित है, के बारे में सरकार में कोई भी परिचित जानता है कि चीन के अनुसार एल.ए.सी. फिंगर आठ के पूर्व से आगे है इसलिए पी.एल.ए. ने बिना किसी को बताए केवल अपनी कथित दावा लाइन को वापस ले लिया है। 

यह याद रखना उल्लेखनीय होगा कि 29 और 30 अगस्त 2020 की मध्यरात्रि को भारतीय सैनिकों ने ऊंचाइयों पर कब्जा कर लिया था। इन चोटियों में रेजांगला, रिकन ला, ब्लैक टॉप, हनान, हैलमेट, गुरंगहिल, गोरखाहिल तथा मेगार हिल शामिल हैं। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के दोनों सदनों में कहा कि पेगौंग झील क्षेत्र में विस्थापन इस बात की परिकल्पना करता है कि दोनों पक्ष अपने संघर्ष को समाप्त कर देेंगे। चीनी अपने सुरक्षाबलों को नॉर्थ बैंक क्षेत्र से फिंगर 8 के पूर्व तक रखेगा। वहीं भारतीय सुरक्षा बल फिंगर 3 के निकट धन सिंह थापा पोस्ट पर अपना स्थायी शिविर स्थापित करेंगे। 

दोनों पक्षों द्वारा इसी तरह की कार्रवाई साऊथ बैंक क्षेत्र में की जाएगी। यह कदम आपसी सहमति द्वारा तय किए गए हैं और कोई भी ढांचा जिसे दोनों पक्षों द्वारा अप्रैल 2020 में नॉर्थ तथा साऊथ बैंक क्षेत्र में स्थापित किया हो, उसे हटा दिया जाएगा और पुरानी स्थिति बहाल कर दी जाएगी। यह भी तय हुआ कि दोनों ओर से पैट्रोङ्क्षलग तभी शुरू होगी जब कूटनीतिक तथा सैन्य बातचीत आयोजित होगी। इस समझौते को नॉर्थ तथा पेंगौंग झील के साऊथ बैंक में लागू किया गया है। सदन को यह भी जानना चाहिए कि यहां पर पैट्रोलिंग और सेना को स्थापित करने के कुछ मुद्दे लम्बित हैं। 

हम 2020 के फरवरी-मार्च पर वापस जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर चीन ने पिछली 19 नवम्बर को वुहान में फूटी विचित्र महामारी से पार पा लिया जो 1918 के बाद सबसे बड़ी वैश्विक महामारी बन गई। इसे कोविड-19 का नाम दिया गया और निश्चित तौर पर इसे चाइना वायरस के नाम से भी बुलाना चाहिए। पूरे विश्व में इसको लेकर चिंता जताई गई। 

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी इसलिए एक जुड़वां चुनौती से जूझ रही थी। एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक जांच कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर चल रही थी। इसलिए चीन ने सबसे पहले दक्षिण चीन सागर में समस्याएं बढ़ाईं। दूसरा यह कि अप्रैल माह में इसने भारतीय क्षेत्र में एल.ए.सी. के साथ-साथ विभिन्न बिंदुओं पर कब्जा करना चाहा। यहां तक कि 15 और 16 जून को गलवान घाटी में चीन की ओर से हिंसा देखने को मिली जिसमें 20 भारतीय जवान शहीद हो गए। यह गतिरोध आज भी जारी है। 30 जून को चीन ने हांगकांग में एक नया सुरक्षा कानून लागू किया जिसके कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के खिलाफ आक्रोश बढ़ा। 

इन सब बातों का मकसद विश्व को यह दिखाना था कि यदि विश्व कोविड-19 को लेकर चीन पर जवाबदेही तय करेगा तो वह और ज्यादा आक्रामक तथा गैर-जिम्मेदार प्रतिक्रिया देगा। अद्भुत तरीके से 9 फरवरी 2021 को विश्व स्वास्थ्य संगठन की जांच टीम ने 4 सप्ताह की जांच के बाद चीन को एक आभासी क्लीनचिट सार्वजनिक तौर पर दे दी और उसमें कहा गया कि कोरोना वायरस एक जानवर से उत्पन्न हुआ है और यह वुहान की लैबोरेटरी से लीक नहीं हुआ। चीन को अपना प्रमाण मिल गया है। वैश्विक शांति को अस्त-व्यस्त करने की धमकी काम कर गई है। 11 फरवरी को राजनाथ सिंह ने चीन के साथ डील की। क्या ये दोनों घटनाक्रम आकस्मिक हैं। बिल्कुल नहीं। चीन एक बुरे चरित्र वाला देश है। आगे आने वाले वर्षों में विश्व को चीन की ब्लैकमेङ्क्षलग की कीमत चुकानी पड़ेगी।-मनीष तिवारी
 


Content Writer

Pardeep

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