प्रशांत किशोर कांग्रेस के लिए पूंजी साबित होंगे या बोझ

punjabkesari.in Tuesday, Apr 19, 2022 - 04:10 AM (IST)

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर यदि कांग्रेस पार्टी में शामिल होते हैं तो क्या वह पूंजी साबित होंगे या बोझ? यह एक लाख करोड़ी प्रश्न है क्योंकि किशोर गांधियों द्वारा उनको शामिल किए जाने की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। इन अनुमानों को उस समय बल मिला जब शनिवार को प्रशांत किशोर ने गांधियों सहित शीर्ष कांग्रेसी नेताओं के साथ चार घंटे लम्बी एक बैठक में हिस्सा लिया जिसमें उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए एक रोडमैप पेश किया। 

प्रशांत किशोर ने एक बड़ी तस्वीर को लेकर चर्चा की कि क्यों कांग्रेस ने अच्छी कारगुजारी नहीं दिखाई, कांग्रेस को उन राज्यों में क्या हुआ जिनमें वह लगभग गायब हो गई तथा इसके साथ ही उन्होंने अपने रोडमैप की रूप-रेखा सामने रखी। यह बैठक पांच राज्यों के हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी की बुरी तरह से चुनावी हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के 10 जनपथ आवास पर आयोजित की गई थी। कांग्रेस नेतृत्व गत 2 आम चुनावों तथा कुछ विधानसभा चुनावों में बार-बार चुनावी पराजयों से जूझ रहा है तथा किसी भी तरह से इस पर काबू पाने को बेताब है। 

चुनावी पराजयों के बाद कांग्रेस न केवल दल बदल का सामना कर रही है बल्कि पुराने नेताओं तथा नई पीढ़ी के बीच आंतरिक संघर्ष का भी। नेतृत्व संकट से बेचैन 23 नेताओं, जिनमें कुछ पूर्व मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय मंत्री शामिल हैं, ने गत अगस्त में संगठनात्मक पुनर्गठन तथा पार्टी चुनावों की मांग रखी थी। यह तथ्य कि गत वर्ष प्रशांत किशोर के कांग्रेस में शामिल होने के प्रयास सिरे न चढ़ने के बाद गांधियों ने उन तक पहुंच बनाई है, दिखाता है कि परिवार बाहरी मदद की राह तक रहा है।

बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि वह शीघ्र ही कांग्रेस में शामिल हो जाएंगे। यद्यपि किशोर की नजर पार्टी में किसी शीर्ष स्थान पर है। अपनी रणनीति का खुलासा करते हुए प्रशांत किशोर ने सुझाव दिया कि पार्टी को लोकसभा की 542 सीटों में से 370 से 400 सीटों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसे कुछ विधानसभा चुनावों में अकेले लडऩा चाहिए जहां यह मजबूत है तथा पूर्ववर्ती चुनावों में यह या तो शीर्ष पर अथवा दूसरे स्थान पर रही है और इसे उत्तर प्रदेश, बिहार तथा ओडिशा जैसे राज्य में नए सिरे से शुरूआत करनी चाहिए जहां पार्टी महत्वहीन है। 

एक टी.वी. समाचार चैनल के साथ एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि यदि आप बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा केरल को लें, जहां लगभग 200 (लोकसभा) सीटें हैं यहां तक कि अपनी लोकप्रियता के बावजूद भाजपा केवल 50 अदद सीटें ही जीतने में सक्षम रही, बाकी करीब 350 सीटों पर भाजपा झाड़ू फेर सकती है। कांग्रेस गलियारों में नई प्रविष्टि के समाचार से उत्सुकता है। वरिष्ठ नेताओं में इसे लेकर मतभेद हैं। वे इस बात को हजम नहीं कर सकते कि गांधी राजनीतिक नेतृत्व की आऊटसोर्सिंग की बात कर रहे हैं। शुरू से ही कांग्रेस नेताओं के एक बड़े वर्ग ने गांधियों से महज नीचे के एक स्तर पर किशोर के प्रवेश के विचार का विरोध किया है जब पार्टी पहले ही जी-23 ग्रुप के विद्रोही व्यवहार का सामना कर रही है। उनके प्रवेश से असंतोष में और तेजी आ सकती है। 

जहां विद्रोही किशोर के प्रवेश के फायदों तथा हानियों को देख रहे हैं, न महज सलाहकार के तौर पर बल्कि एक निर्णय लेने वाले के तौर पर, उन्हें पार्टी की विचारधारा के साथ उनकी निष्ठा का भी डर है। यह वर्ग महसूस करता है कि पार्टी के लिए बेहतर होगा कि वह उनकी सेवाएं एक सलाहकार के तौर पर ही ले। उनका मानना है कि गठबंधनों, उम्मीदवारों, सीटों आदि बारे निर्णय लेने में उनकी कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए जिसे राजनीतिक नेतृत्व के लिए छोड़ देना चाहिए। किशोर की कांग्रेस के साथ बातचीत कोई नई बात नहीं है। गत वर्ष पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद, जहां उनकी क्लाइंट तृणमूल कांग्रेस ने शानदार विजय हासिल की, उनकी गांधियों के साथ कई बार चर्चा हुई, लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ सकी। पांच राज्यों के हालिया चुनावों में पार्टी की दयनीय कारगुजारी के बाद प्रशांत किशोर ने अपनी रणनीति तथा एक दीर्घकालिक योजना के साथ वापसी की है। 

प्रशांत, जो पहले एक स्वास्थ्य रणनीतिकार थे, 2014 से राजनीति के ऊबड़-खाबड़ मैदान में कूदे तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उनके प्रचार अभियान में मदद की। तब से उन्होंने एक लम्बा रास्ता तय किया है तथा एक जादुई छड़ी के साथ चुनावी रणनीतिकार के तौर पर जाने जाते हैं। तब से उन्होंने लगभग आधा दर्जन क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ काम किया है तथा भाजपा को हराने में उनकी मदद की है, जिनमें ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल) शामिल हैं। उन्होंने जनता दल (यूनाइटिड) के साथ एक खराब शुरूआत की थी जिसमें वह उपाध्यक्ष थे। उनका संक्षिप्त राजनीतिक कार्यकाल बहुत देर तक नहीं रहा तथा उन्होंने तत्कालीन जद (यू) प्रमुख नीतिश कुमार से अपने रास्ते अलग कर लिए। 

किशोर अपने ग्राहकों (राजनीतिक दलों) से बहुत मोटी फीस वसूल करते हैं तथा नेताओं, प्रचार अभियानों, गठबंधनों आदि के कायाकल्प बारे सुझाव देते हैं। उनके आलोचकों का कहना है कि वह अपने ग्राहकों में हमेशा विजेता पार्टी को लेते हैं लेकिन वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के मामले में असफल रहे। विडम्बना यह है कि उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा। एक साक्षात्कार में किशोर ने दावा किया था कि वह शायद ही कभी टी.वी. पर समाचार देखते हैं और समाचार पत्र नहीं पढ़ते। वह ई-मेल्स नहीं लिखते तथा नोट्स नहीं लेते और उन्होंने गत एक दशक से लैपटॉप का इस्तेमाल नहीं किया। जिस एकमात्र उपकरण का इस्तेमाल वह करते हैं वह है उनका फोन। 

हमें प्रतीक्षा करनी तथा देखना होगा कि किशोर के प्रवेश पर पार्टी काडर किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं। उन्हें लेकर न केवल कांग्रेस बल्कि तृणमूल कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों में भी असंतोष के स्वर सुने जाते हैं। दिनेशभाई द्विवेदी जैसे तृणमूल कांग्रेस नेता ने अपने पार्टी छोडऩे के लिए किशोर पर दखलअंदाजी करने का खुल कर आरोप लगाया। लोग बड़ी उत्सुकता से एक कांग्रेसी के तौर पर उनकी पारी पर नजर रखेंगे।-कल्याणी शंकर
 


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