न्यायाधीश को तब ‘स्थानांतरण’ करने की इतनी जल्दी भी क्या थी

2020-09-26T03:08:14.267

एक प्रमुख समाचार पत्र में मैं रोजाना एक पक्षीय जांच के खिलाफ मेरे दिल्ली पुलिस कमिश्रर को सचेत करने वाले पत्र की वैधता तथा दिल्ली पुलिस की जांच के बारे में प्रकाश सिंह के विचार पढ़ता रहता हूं। उसको छोड़ कर प्रकाश सिंह ने महसूस किया कि दिल्ली पुलिस के पास सी.ए.ए. विरोधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ षड्यंत्र के आरोप को प्रमाणित करने के वैध प्रमाण होने चाहिएं। उनके विचार मूल रूप से मेरे विचारों से भिन्न नहीं हैं। 

प्रकाश मेरे पुराने मित्र हैं। ऐसा भी समय था जब हम फोन पर प्रत्येक रात्रि सम्पर्क में रहते थे। मैंने उन्हें बताया कि मेरी शंकाएं पुलिस की अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा तथा प्रवेश वर्मा के खिलाफ प्रक्रिया को बढ़ाने में दिखाई गई अनिच्छा से उपजी हैं। हालांकि उनके खिलाफ प्रमाण खुले तौर पर उपलब्ध तथा सबकी जानकारी में थे। पुलिस की निष्पक्ष जांच को लेकर प्रकाश ने दिल्ली पुलिस को भी बुरा कहा है। प्रकाश तथा मैं दोनों ही इस चूक के कारणों तथा स्रोतों के बारे में सहमत हैं। 

यदि सत्ताधारी पार्टी तथा राजनीतिक दबाव वाले पुलिस बल के बीच में गठजोड़ को प्रमाणित करने के लिए कोई प्रमाण अपेक्षित है तो पाठकों को इस वर्ष 26 फरवरी के दिन की ओर देखना होगा जब मध्यरात्रि को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर को 3 भाजपा नेताओं, जिनमें से एक तो केंद्र सरकार में राज्य मंत्री है, के खिलाफ पुलिस कमिश्रर को एफ.आई.आर. दर्ज करने के निर्देश देने से रोका गया था। 27 फरवरी की सुबह को रिपोर्ट का अनुपालन किया गया। 26-27 की रात्रि को चेतना के साथ एक न्यायाधीश को हटने के लिए कहा गया तथा चंडीगढ़ में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया। हाईकोर्ट के इतिहास में किस तरह की जल्दबाजी को अन्य किसी न्यायाधीश द्वारा पहले कभी अनुभव नहीं किया गया। न्यायाधीशों के प्रति रूखेपन से इस तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए जैसा कि सरकारें अन्य नौकरशाहों के साथ करती हैं। 

इस घटनाक्रम में जे.एन.यू. तथा जामिया मिलिया के छात्रों को प्रमुखता से देखा जा सकता है। यह अप्रत्याशित था कि मुम्बई ने कभी भी छात्रों की ऐसी गंभीर परेशानी को नहीं झेला। दिल्ली यूनिवर्सिटी तथा जे.एन.यू. में राइट तथा लैफ्ट विंग यूनियनें छात्रों को राजनीति में भेजती हैं तथा कई प्रख्यात राजनीतिक नेता जैसे अरुण जेतली, निर्मला सीतारमण तथा सीताराम येचुरी देखे जा सकते हैं। ऐसे नेता हमारे विश्वविद्यालयों में आश्चर्यचकित रूप से गायब भी थे। शिवसेना ने अपने छात्र विंग को बनाने की कोशिश की। आदित्य ठाकरे जब सेंट जेवियर्ज कालेज में छात्र थे, तब उन्होंने यूनियन बनाने का प्रयास अधूरे मन से किया तथा इस प्रक्रिया में थोड़ी हिंसा का इस्तेमाल भी किया। मुम्बई का छात्र समुदाय अपने करियर को बनाने में अपनी रुचि दिखाता है और अपनी पसंद का करियर चुनता है। 

तब शहर के पुलिस कमिश्रर होने के नाते मैंने प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेज वी.जे.टी.आई. के प्रिंसिपल से एक फोन कॉल प्राप्त की। जिसमें उन्होंने मुझसे छात्रों के साथ निपटने के लिए मदद मांगी जो किसी कारण को लेकर उलझ रहे थे। मुझे अब यह सब याद भी नहीं। छात्रों के विरोध का राजनीति के साथ कोई लेना-देना नहीं था। अपने कार्यालय से मैं सीधा कालेज गया तथा युवा छात्रों के साथ बातचीत की। उन्होंने मेरा सुझाव मान लिया। प्रिंसिपल तथा स्टाफ ने भी सुझाव को मान लिया। मैंने सोचा कि मेरी योग्यता ने छात्रों की मदद की। मैं अक्सर आश्चर्यचकित रहता हूं कि पूरे देश में पुलिस बल उन अधिकारियों का इस्तेमाल क्यों नहीं करती जो आसानी से युवकों संग शांतमय ढंग से वार्तालाप कर सकते हैं। हिंसा को नकारने के लिए जे.एन.यू. तथा जामिया मिलिया के छात्रों के साथ ऐसे अधिकारी बात कर सकते थे। 

753 मामलों में जोकि षड्यंत्र के मामले हैं राजनीति हमेशा से ही व्याप्त है। यहां पर आई.पी.एस. अधिकारी हैं जो दिल्ली के सी.पी. के दावों का प्रमाणों की सच्चाई को लेकर उनका समर्थन करते हैं। मेरे विचारों के विपरीत यह उन लोगों के पास अपने विचार प्रकटाने के लिए अधिकार है। मगर इस मामले में पुलिस के इरादों पर गंभीर शंकाएं हैं जिसमें अन्य अधिकारियों को भी हैं। मेरे दोस्त जोकि दिल्ली के पूर्व उप राज्यपाल थे तथा जिन्हें दिल्ली पुलिस कमिश्रर नीरज कुमार ने रिपोर्ट करनी थी, को लिखा। 

मेरा कहने का मतलब यह है कि सी.पी. को बाहरी महत्वाकांक्षाओं या फिर प्रभावों के आगे झुकना नहीं चाहिए तथा उन्हें सभी समुदायों का भरोसा जीतना चाहिए। एक ओर दिल्ली के पुलिस कमिश्नर ने इस वर्तमान घटनाक्रम के बारे में ऐसा ही लिखा। यदि दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट के उस आदेश जिसमें कि 3 भाजपा नेताओं के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करनी थी को मान लिया होता तो यह सरकार के मुंह के ऊपर एक तमाचा होता। इन तीन भाजपा नेताओं के जहर उगलने के बारे में रिकार्ड है। इसके विपरीत पुलिस ने अदालत में यह बयान दिया कि ऐसी एफ.आई.आर. दर्ज करने का ‘उपयुक्त’ समय नहीं है। पुलिस द्वारा प्रतिपादित कानून के इस अद्भुत विचार को न्यायाधीश ने स्वीकार नहीं किया जिसमें यह कहा गया कि एफ.आई.आर. करने का ‘उपयुक्त समय’ नहीं। 

मेरे आई.पी.एस. दोस्त जो अभी भी सेवाकाल में हैं या फिर रिटायर्ड हो चुके हैं, को 4 अलग-अलग वर्गों में उनका वर्गीकरण किया जा सकता है। 
1. जो पक्ष लेने से दूरी बनाकर रखते हैं और यहां तक कि यह सोचते हैं कि पक्ष उचित है।
2. वे अधिकारी जो विवादास्पद मुद्दों से दूर रहते हैं और फायदा तथा नुक्सान के बारे में नहीं सोचते। ऐसे मुद्दे जो राजनीति को रंगत दे सकते हैं। 
3. ऐसे अधिकारी जो गलत कहने में हिचकिचाहट नहीं दिखाते। फिर चाहे वे अपने ही खानदान में अप्रसिद्ध हो जाएं।
4. ऐसे अधिकारी जो सुविधा के लिए या फिर अपने ही लाभ के लिए गलत कार्यों का समर्थन करते हैं। 

लोकतंत्र में ऐसे सभी वर्गों का स्थान होता है। उनके पास अपनी चेतना के अनुसार कार्य करने तथा सोचने का अधिकार रहता है। यहां तक कि यदि वह चौथे वर्ग में आते हैं जहां पर एक चेतना को पाना शानो-शौकत समझा जाता है।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी) 
 


Pardeep

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