हमारे विश्वविद्यालय जड़ता की स्थिति में क्यों

punjabkesari.in Thursday, May 12, 2022 - 04:37 AM (IST)

क्या हमारे विश्वविद्यालय जानबूझकर जड़ता की स्थिति में हैं? 2012 से उच्च शिक्षा पर खर्च 1.3 से 1.5 फीसदी पर स्थिर रहा है। दिलचस्प है कि इस दौरान शिक्षा मंत्रालय उच्च शिक्षा संस्थानों को आॢथक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 फीसदी का कोटा लागू करने के लिए अपनी सेवा क्षमता को 25 फीसदी बढ़ाने के लिए जोर देता रहा, जबकि वित्त मंत्रालय शिक्षण के लिए नए पदों के सृजन पर रोक का राग अलाप रहा है। केंद्रीय स्तर पर छात्रों को मिलने वाली वित्तीय मदद को वित्त वर्ष 2021-22 में 2,482 करोड़ रुपए से घटाकर वित्त वर्ष 2022-23 में 2,078 करोड़ रुपए कर दिया गया। इसी तरह इस दौरान अनुसंधान और नवाचार के लिए वित्तीय आबंटन में 8 फीसदी की कमी आई है। 

दरअसल, तमाम बड़े शिक्षण संस्थान कई तरह के संकटों से घिरे हैं। विश्वविद्यालय स्तर पर वित्तीय संकट, संकाय के लिए अनुसंधान के अवसरों में कमी, खराब बुनियादी ढांचे और छात्रों के लिए सीखने के सिकुड़ते अवसर से स्थिति खासी दयनीय हो गई है। विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे में निवेश लगातार घटता जा रहा है। देश के ज्यादातर विश्वविद्यालय, आई.आई.टी. और आई.आई.एम. का बुनियादी ढांचा खस्ताहाल है। सभी जगह कक्षाओं में क्षमता से ज्यादा छात्र हैं, आबोहवा और स्वच्छता की स्थिति बदतर है। छात्रावासों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। 

उच्च शिक्षा अनुदान एजैंसी (एच.ई.एफ.ए.) ने वित्त वर्ष 2020-21 में अपने बजट को 2000 करोड़ रुपए से घटाकर वित्त वर्ष 2021-22 में एक करोड़ रुपए कर दिया और अब वित्त वर्ष 2022-23 के लिए महज एक लाख रुपए आबंटित किए गए हैं। विश्वविद्यालयों को ऋण लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। मसलन, दिल्ली विश्वविद्यालय एच.ई.एफ.ए. से 1075 करोड़ रुपए का कर्ज मांग रहा है। यू.जी.सी. को वित्त वर्ष 2021-22 के 4,693 करोड़ रुपए के मुकाबले 2022-23 में 4,900 करोड़ रुपए आबंटित किए गए, लेकिन नकदी प्रवाह में कमी के कारण डीम्ड/केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वेतन भुगतान में देरी हुई। जो सूरत है उसमें देश के ज्यादातर विश्वविद्यालय घाटे में चल रहे हैं। 

कई विश्वविद्यालयों के फैकल्टी सदस्यों को महीनों से वेतन में देरी का सामना करना पड़ रहा है। वित्तीय संकट के कारण विश्वविद्यालयों के विवेकाधीन खर्च में कटौती हुई है। दिल्ली के कई कॉलेज बुनियादी डाटाबेस और पत्रिकाओं की सदस्यता लेने में असमर्थ हैं। अनुसंधान अनुदान भी काफी कम हो गया है। यू.जी.सी. की लघु और प्रमुख अनुसंधान परियोजना योजनाओं के तहत अनुदान वित्त वर्ष 2016-17 में 42.7 करोड़ रुपए से घटकर वित्त वर्ष 2020-21 में 38 लाख रुपए रह गया। स्पष्ट रूप से अनुसंधान के लिए विश्वविद्यालयों के वित्त पोषण में उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता है। एन.आर.एफ. जैसे संस्थान मौजूदा योजनाओं (विज्ञान मंत्रालय सहित) के पूरक हैं। अंडरग्रैजुएट्स के लिए पाठ्यक्रम-आधारित शोध अनुभवों को सक्षम करने के लिए भी राशि आबंटित की जानी चाहिए। 

दरअसल, फिलहाल जो आलम है उसमें शैक्षणिक मानकों और प्रक्रियाओं को बनाए नहीं रखा जा रहा है। परीक्षा का पेपर लीक होना आम बात हो गई है। ऐसे तमाम संस्थान अपनी परीक्षाओं की शुचिता की रक्षा करने की बुनियादी जवाबदेही को निभाने में असफल रहे हैं। इसे सुधारने के लिए विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण के साथ विश्वविद्यालयों को अकादमिक कार्यक्रमों, पदोन्नति, समूह के आकार आदि पर निर्णय लेने की इजाजत देनी होगी। 

भारत के विश्वविद्यालय ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र अभिव्यक्ति के गढ़ और राष्ट्रवाद के केंद्र रहे हैं। दिलचस्प है कि अभिव्यक्ति की आजादी और राष्ट्रवाद के अधिकार के बीच इस नाजुक संतुलन को सरकारों के अलग-अलग दौर में बढ़ावा मिलता रहा। ऐसा इसलिए भी कि लोकतंत्र और नागरिक समाज को मजबूत करने में विश्वविद्यालयों की भूमिका से देश का नेतृत्व अवगत रहा है। पर अब ऐसा नहीं रहा। संस्थागत उदासीनता से भी दमन का मार्ग प्रशस्त हुआ है। जे.एन.यू. और जामिया सरीखे विश्वविद्यालयों में छात्रों के खिलाफ  कैंपस विरोध के कारण हुई पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी के कारण विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर पड़ा है। छात्रों और संकाय सदस्यों को अन्य विशेषणों के साथ नियमित रूप से राष्ट्रविरोधी के रूप में बदनाम किया जाता है। 

हमारे छात्रों के पास रचनात्मक अनुभव है और उनके पास खुद को नागरिक के तौर पर जाहिर करने के लिए जगह होनी चाहिए। अगर अभिव्यक्ति की आजादी को बढ़ावा नहीं दिया गया तो हमारे विश्वविद्यालय आलोचनात्मक सोच का समर्थन कैसे करेंगे। विश्व स्तर पर देश के उच्च शिक्षा संस्थानों की हैसियत खासी कमजोर है। क्यू.एस. वल्र्ड यूनिवॢसटी रैंकिंग में शीर्ष 500 में सिर्फ 8 भारतीय विश्वविद्यालय हैं और यह स्थिति 2010 से करीब एक जैसी है। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) में सामाजिक, नैतिक और भावनात्मक क्षमताओं और स्वभाव के साथ-साथ महत्वपूर्ण सोच और समस्या समाधान को बढ़ावा देने पर खासा जोर दिया गया है। इसके लिए विश्वविद्यालयों के साथ छात्रों/संकायों की गतिविधियों के लिए अधिक धन, स्वायत्तता और सहिष्णुता के साथ एक उत्साहजनक पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत है। इसके बिना, प्रतिभाशाली भारतीय विदेश जाते रहेंगे, जबकि नीति निर्माता ‘ब्रेन ड्रेन’ के बारे में विलाप करते रहेंगे।-वरुण गांधी
 


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