पुलिस पर विश्वास क्यों नहीं

punjabkesari.in Thursday, Jun 23, 2022 - 05:00 AM (IST)

पुलिस का नाम सुनते ही लोगों को एक अजीब-सी घबराहट होने लगती है। लोग कहते हैं कि पुलिस की न तो दोस्ती अच्छी न ही दुश्मनी। वास्तव में वक्त ने पुलिस की तस्वीर ही बदल दी है तथा हर व्यक्ति पुलिस को बुराई का पर्याय ही मानता है। 

मगर शायद लोगों ने पुलिस को पूर्ण रूप से नहीं जाना तथा केवल सिक्के के केवल एक ही पहलू को देखा है। पुलिस तो 24 घंटे ड्यूटी पर तैनात रह कर लोगों की हर क्षण सेवा व सुरक्षा में लगी रहती है, चाहे दीवाली हो या होली या फिर कोई राष्ट्रीय उत्सव। जब लोग अपनी पत्नी व बच्चों के साथ किसी मेले या त्यौहार का आनंद ले रहे होते हैं, तब उनकी सुरक्षा पुलिस ही कर रही होती है। यह ठीक है कि कुछ पुलिस वाले रिश्वतखोर, अपनी मनमानी या अभद्र व्यवहार करने वाले होते हैं, मगर ऐेसे में पूरे विभाग को दोषी ठहराना ठीक नहीं। 

विडम्बना यह है कि पुलिस वाले चाहे ईमानदारी व पारदर्शी तरीके से भी काम करें, तो भी उन पर आसानी से विश्वास नहीं किया जाता और यही माना जाता है कि इसके पीछे जरूर कोई विशेष कारण होंगे। 

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद रानी विक्टोरिया ने भारतीयों को खुश करने के लिए वर्ष 1858 में कुछ नए अधिनियम बनाने की घोषणा की जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1861-62 में भारतीय दंड संहिता व भारतीय साक्ष्य व दंड प्रक्रिया संहिता जैसे कानून कार्यान्वित किए। उस समय भारतीयों को ही पुलिस में भर्ती किया जाता था तथा इन अधिनियमों में पुलिस की शक्तियों को इस तरह सीमित कर दिया गया, ताकि अंग्रेज किसी अपराध के लिए अपराधी न बनाए जा सकें तथा सजा मुक्त रहें। इन अधिनियमों की धाराएं आज तक पुलिस की कार्यप्रणाली पर अविश्वास की भावनाओं को भड़काती आ रही हैं। 

उदाहरणत:, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 24 व 25 के अंतर्गत मुलजिमों या गवाहों के पुलिस के सामने दिए गए बयान कोर्ट में मान्य नहीं। न्यायालय में जब कोई मुकद्दमा सुनवाई के लिए लगता है, तब वकील लोग गवाहों को न केवल अपना बयान मुलजिम के पक्ष में देने के लिए मजबूर व प्रेरित करते हैं, बल्कि पुलिस अधिकारी को झूठा बयान लिखने के लिए फंसा भी देते हैं। पुलिस की हालत उस सांप की तरह कर दी जाती है जिसके मुंह में छिपकली आ जाने पर उसे न तो खा सकता है और न ही छोड़ सकता है। इसी तरह जब किसी गुनाह को प्रमाणित करने के लिए मौके पर कोई गवाह न मिल रहा हो तब अमुक घटना चाहे किसी पुलिस जवान के सामने ही घटी हुई हो, वह भी गवाह के रूप में नहीं रखा जा सकता। 

कितनी बड़ी विडम्बना है कि किसी भी अपराधी का कबूलनामा पुलिस के बड़े से बड़े अधिकारी के सामने भी मान्य नहीं है। यही कारण है कि आज अधिकतर अपराधों में सजा की दर 50 प्रतिशत से भी कम है। जरा सोचिए, जब संवेदनशील मामलों में भी अपराधी सजा मुक्त होकर खुले दनदनाते घूमते रहेंगे तो पुलिस का बदनाम होना स्वाभाविक ही है। यहां यह बताना भी तर्कसंगत है कि पुलिस किसी भी गवाह या अपराधी के बयान पर हस्ताक्षर नहीं करवा सकती है तथा जब गवाह अपने बयानों से मुकर जाता है तो नाकामियों का ठीकरा पुलिस के सिर पर ही फोड़ दिया जाता है। 

सरकारी वकील भी अक्सर अपराधियों के वकीलों के साथ मिल कर पुलिस अन्वेषण अधिकारियों को ही असफल सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं तथा कई बार तो वे अपनी चमड़ी बचाने के लिए पुलिस अधिकारियों को ही दोषी ठहरा देते हैं और कई बार इन अधिकारियों को विभागीय कार्रवाई का सामना भी करना पड़ता है। जरा सोचिए कि पुलिस को कितनी विडम्बनाओं का सामना करना पड़ता है। पुलिस न तो किसी अपराधी की पिटाई कर सकती है और न ही 15 दिन से ज्यादा किसी को हिरासत में रख सकती है। यही कारण है कि बाहुबली सरेआम मासूम व बेगुनाह लोगों को अपना शिकार बनाते रहते हैं। अन्याय की इन कडिय़ों को तोडऩे की अत्यंत आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि पुलिस की कार्यप्रणाली में विश्वास पैदा करने के लिए विभिन्न कानूनों में संशोधन लाए, ताकि अपराध पीड़ित लोगों को न्याय मिल सके। 

यह भी देखा गया है कि कई बार सरकार को वर्तमान में बढ़ते अपराध को रोकने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन करना पड़ता है तथा ज्यादा से ज्यादा सजा का प्रावधान रखना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर अभी कुछ समय पहले ही मोटर वाहन अधिनियम में कुछ संशोधन किए गए तथा जुर्माने की राशि बढ़ा दी गई। अब जब पुलिस किसी अवहेलना के लिए किसी व्यक्ति का चालान करती है तो अभियुक्त को काफी बड़ी धन राशि देनी पड़ती है। मगर ऐसे में यह बात उन्हीं राजनीतिज्ञों को जिन्होंने इस एक्ट में संशोधन किया होता है, रास नहीं आती तथा पुलिस की कार्यशैली पर अविश्वास का एक बहुत बड़ा चिन्ह लगा देती है। 

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि पुलिस गंभीर मुश्किलों व मजबूरियों से जूझती हुई अपने कार्य को अमली-जामा पहना रही है तथा ऐसे में लोगों को पुलिस की दास्तां को समझना चाहिए और जनमानस की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस को ऐच्छिक सहयोग देना चाहिए। हां, यदि कोई पुलिसकर्मी घूसखोरी इत्यादि में संलिप्त पाया जाता है तो इसका डट कर विरोध भी करना चाहिए तथा उनके कुकृत्यों के लिए उन्हें सजा दिलवाने से पीछे नहीं हटना चाहिए।-राजेन्द्र मोहन शर्मा डी.आई.जी. (रिटायर्ड)
 


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