धारा 370 ‘अकार्यशील’ करने का हमें व कश्मीरियों को क्या लाभ हुआ

2021-10-11T04:21:36.633

धारा 370 को ‘अकार्यशील’ करने के कदम (जैसा कि व्यापक तौर पर माना जाता है, इसे  हटाया अथवा रद्द नहीं किया गया) बारे 8 अगस्त, 2019 को बताते हुए प्रधानमंत्री ने निम्र बातें कहीं : कि जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख का विकास धारा 370 के कारण बाधित हो रहा था। अब यह समस्या खत्म कर दी गई है और एक नया युग शुरू हुआ है। धारा 370 अलगाववाद, आतंकवाद, भाई-भतीजावाद तथा भ्रष्टाचार की जड़ थी तथा इस कदम से अब भविष्य को सुरक्षित कर लिया गया है। 

हमें समीक्षा करनी चाहिए कि तब से दो वर्षों में क्या हुआ है? पहला पहलू यह है कि कश्मीर में अब कोई लोकतंत्र नहीं है। यह भारत का एकमात्र हिस्सा है जहां चुनी हुई सरकार नहीं है और यहां पर एक राज्यपाल के माध्यम से सीधा दिल्ली से शासन किया जा रहा है। दूसरा यह कि इस सीधे शासन के साथ ऐसे कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो कश्मीर के लिए विशिष्ट हैं, जैसे कि जन सुरक्षा कानून। इस कानून के अंतर्गत व्यक्तियों को बिना किसी अपराध के हिरासत में लिया जा सकता है। धारा 370 को हटाने के पीछे ‘एक राष्ट्र एक संविधान’ कारण बताया गया, यद्यपि यह कश्मीर-विशिष्ट कानून है। 

तीसरा यह कि गत 2 वर्षों में कश्मीर में जमीन खरीदने वाले लोगों की कुल संख्या मात्र 2 है। धारा 35 को हटाना,  जो कश्मीर के स्थायी निवासियों को परिभाषित करती है, को भारतीय कार्रवाई के पीछे एक बड़ा कारण बताया गया  लेकिन ऐसा नहीं दिखाई देता कि इससे जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई बदलाव हुआ है। 

चौथा, कश्मीरी पंडित घाटी में वापस नहीं लौटे। क्यों एक शहरी शिक्षित समुदाय किसी ऐसे स्थान पर वापस जाना चाहेगा जहां बहुत कम नौकरियां हों और आमतौर पर इंटरनैट की सुविधा नहीं मिलती हो। यह समझना आसान नहीं। जब हाल ही में केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने पंडितों पर घाटी में लौटने में कोई रुचि नहीं दिखाने का आरोप लगाया तो उन्होंने संभवत: इस पहलू को नहीं समझा होगा। 

पांचवां, लद्दाख के दर्जे में बदलाव तथा केंद्र शासित प्रदेश के नए नक्शे जारी करना वहां चीन के आक्रामक रवैये के कारण दिखाई देता है। सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया है लेकिन चीनियों ने सुनिश्चित किया है कि उनकी 1959 की दावेदारी की रेखा जमीनी स्तर पर लागू कर दी गई है। उस मोर्चे पर भारत के लगभग 2 लाख सैनिक हैं। इस वर्ष जनवरी में सेना ने पाकिस्तान के सामने 25 तथा चीन के सामने केवल 12 डिवीजनों में बदलाव करते हुए अब चीन के सामने 16 डिवीजनें खड़ी की हैं।

छठा, कश्मीर में आतंकवाद को गत 3 वर्षों में हुई मौतों द्वारा मापा जाता है और मनमोहन सिंह के अंतर्गत एक वर्ष में औसतन 150 मौतें हुईं। गत 3 वर्षों में यह संख्या प्रतिवर्ष 250 है। इससे यह लगता है कि आतंकवाद कम नहीं हो रहा क्योंकि हमने धारा 370 को अकार्यशील कर दिया है। सातवां, गत 2 वर्षों से कश्मीर में कोई विकास नहीं हुआ और यह अप्रत्याशित नहीं है। कई वर्षों से देशभक्त में अर्थव्यवस्था गिरावट की ओर अग्रसर है। महामारी तथा हाल ही में ङ्क्षहसा में हुई वृद्धि पर्यटन को भी चोट पहुंचाएगी। अमरीकी पत्रिका हार्पर्स ने रिपोर्ट दी कि कश्मीर में डाक्टरों-रोगियों का अनुपात 1-3060 था। जबकि यहां के नागरिकों की तुलना में सैनिकों की दर 1-7 थी। जब दुनिया के सामने ऐसी संख्या हो तो ‘विकास’ की

बातें करना बेकार है। आठवां, पांच दशकों बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने कश्मीर का मामला  उठाया है। 16 अगस्त 2019 को संयुक्त राष्ट्र की वैबसाइट पर ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने कश्मीर पर चर्चा की, चीन ने भारत तथा पाकिस्तान को तनाव कम करने को कहा’ शीर्षक से एक न्यूज आइटम अपलोड की गई। 

इसके प्रारंभिक पैरे में कहा गया : ‘सुरक्षा परिषद ने शुक्रवार को कश्मीर के आसपास आंदोलनकारी स्थिति पर विचार किया, बैठक में केवल विवाद के मुद्दे पर ध्यान केन्द्रित किया गया, 1965 से लेकर पहली बार संयुक्त राष्ट्र की इकाई ने अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा के मामलों को सुलझाने पर जोर दिया’ भारत ने कश्मीर के मुद्दे पर वैश्विक रुचि को फिर से सक्रिय कर दिया है जो पहले निष्क्रिय थी। नौवां, अन्य वैश्विक इकाइयों ने भी 2019 के बाद कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसे लेकर भारत की आलोचना करनी शुरू कर दी है। इस वर्ष यूनाइटेड स्टेटस कमीशन ऑन इंटरनैशनल रिलीजियस फ्रीडम (एक द्विदलीय इकाई जिसने पहले 2020 के बाद मोदी को अमरीका में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया था) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था : 

‘मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर में  आने जाने की स्वतंत्रता तथा इकट्ठे होने पर प्रतिबंधों ने धार्मिक स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव डाला है, जिनमें धार्मिक पवित्र दिवस मनाना तथा प्रार्थनाओं में शामिल होना शामिल है। लगभग 18 महीनों तक इंटरनैट बंद होने, जो किसी भी लोकतंत्र में अब तक का सबसे लम्बा शटडाऊन है तथा संचार पर अन्य प्रतिबंधों ने उल्लेखनीय व्यवधान पैदा तथा धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित किया।’ यू.एस.सी.आई.आर.एफ. ने राष्ट्रपति जो बाइडेन को भारतीय नागरिकों के खिलाफ प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया है। दसवां, लद्दाख में चीन के आक्रामक कदमों के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम की इच्छा जताई, जो इस समय मजबूत स्थिति में है। कश्मीर में हमारी कार्रवाई का कारण इसलिए था क्योंकि भारत ने कहा कि पाकिस्तान एक समस्या है। अब समाधान के लिए भारत पाकिस्तान की ओर मुड़ रहा है क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से असल समस्या चीन है। 

इस समय इस विषय पर लिखने का कारण यह है कि ऐसा दिखाई देता है कि हम उस स्थिति की ओर लौट रहे हैं जहां कश्मीर 30 वर्ष पहले था।  जैसा कि अब है तब यह राष्ट्रपति शासन  के अंतर्गत इसके राजनीतिक नेतृत्व को जेल में तथा दर-किनार रखा गया था, इसके लोगों के प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध था, वहां कोई विकास नहीं था और भारत आंतरिक तौर पर बड़ी संख्या में सुरक्षाबल तैनात करने को  मजबूर था। हमें ईमानदारी से इस सब पर विचार करना तथा खुद से पूछना चाहिए कि भारत द्वारा 2019 में की गई कार्रवाई से हमें तथा कश्मीरियों को क्या लाभ हुआ?-आकार पटेल


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Content Writer

Pardeep

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