कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की तुरन्त आवश्यकता

punjabkesari.in Tuesday, Dec 07, 2021 - 04:35 AM (IST)

क्या कांग्रेस पार्टी समाप्त हो जाएगी जैसा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तथा अन्य का मानना है? अतीत में भी कइयों ने कांग्रेस की समाप्ति बारे भविष्यवाणी की थी लेकिन इसने कई हमलों के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखा है। अंतिम था 1998 में जब सोनिया गांधी इसे पुन: जीवित करने के लिए उभरीं तथा 2004 से 2014 तक इसने देश पर शासन किया। 

2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने कांग्रेस को 12 करोड़ वोट दिए यद्यपि सीटों के लिहाज से इसे केवल 52 मिलीं। यहां तक कि 2019 में लगातार दूसरी पराजय में भी पार्टी ने 20 प्रतिशत वोटों का एक मजबूत ब्लाक बनाए रखा। गांधी परिवार आत्म संतुष्ट है, जिसका मानना है कि मतदाताओं का जल्दी ही मोह भंग हो जाएगा और वे पुरानी वैभवशाली पार्टी की ओर लौट आएंगे। 

नि:संदेह वे भ्रम में हैं क्योंकि पार्टी को पुन:जीवित करने की तुरंत आवश्यकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस पार्टी को नेतृत्व के संकट तथा कई ओर से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पहली है आंतरिक अनुशासनहीनता तथा विद्रोह को नियंत्रित करना। गुलाम नबी आजाद नीत ग्रुप-23 इसका एक उदाहरण है तथा यह मोह भंग लगभग सभी राज्यों में मौजूद है। 

दूसरी चुनौती भीतर से ही विपक्षी खेमे से है। हाल ही में राकांपा प्रमुख चतुर शरद पवार के समर्थन से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा हमलों में तेजी आई है। अब जबकि ममता ने 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए दाव लगाने का निर्णय कर लिया है, वह कांग्रेस को विपक्षी खेमे में दरकिनार करने का प्रयास कर रही हैं। पहले कदम के तौर पर बनर्जी अपनी पार्टी का आधार व्यापक करने तथा राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने की तैयारी कर रही हैं। 

तीसरी यह कि कांग्रेस पार्टी कई राज्यों तथा यहां तक कि कई क्षेत्रों में सिकुड़ रही है। कांग्रेस को अब अपने ही बनाए विवादों में उलझने की बजाय 12 करोड़ मतदाता आधार तैयार करने का लक्ष्य बनाना चाहिए। 2019 में भाजपा तथा कांग्रेस के बीच 186 सीधी लड़ाइयों में भाजपा ने 170 सीटें जीतीं  जिसका स्ट्राइक रेट 91.4 प्रतिशत बनता है। 2014 के चुनावों में इसने इन सीटों में से 162 जीती थीं। कांग्रेस, जिसने 2014 में इनमें से 24 सीटें जीती थीं, अब नीचे 15 तक आ गई है। 

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल में, जहां यह पहले शासन कर रही थी, कांग्रेस ने 286 सीटों में से केवल 10 जीतीं। पार्टी का 20 राज्यों से कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। इसके साथ ही क्षेत्रीय पाॢटयां कांग्रेस के मुकाबले कहीं बेहतर लड़ाई लडऩा जारी रखे हुए हैं। अब पार्टी के लिए क्या विकल्प है जहां विपक्ष के भीतर ही दरारें पड़ी हुई हैं? 

पहला है दीर्घकालिक रणनीति पर विचार तथा 2024 के लिए तैयारी शुरू करना। ममता ठीक ऐसा ही कर रही हैं। कांग्रेस अल्पकालिक त्वरित समाधानों में मशगूल है तथा पार्टी के अवसरों को गड़बड़ कर रही है जैसा कि हाल ही में इसने पंजाब में किया। मगर उससे पहले पार्टी को अपना नेतृत्व संकट सुलझाने की जरूरत है जो अगस्त 2019 से चला आ रहा है। 

दूसरा यह कि पार्टी को भाजपा के साथ स्पर्धा करने के लिए विशाल स्रोतों तथा निष्ठावान बूथ समितियों की जरूरत है। जब इन दोनों का समाधान हो जाएगा तो बाकी चीजों का भी आसानी से प्रबंधन हो जाएगा। 

तीसरा है विपक्ष को एकजुट करने के लिए रास्ते तलाशना। सोनिया गांधी ऐसा करने में सक्षम हैं क्योंकि लगभग सभी विपक्षी दल संभवत: उनके नेतृत्व में एकजुट होने के इच्छुक होंगे लेकिन राहुल गांधी को लेकर उनमें संदेह है। यदि आवश्यक हो तो गांधी परिवार को किसी अन्य नेता के लिए रास्ता साफ कर देना चाहिए। क्षेत्रीय नेताओं को यद्यपि एहसास है कि वे अपने राज्यों में भाजपा को काबू कर सकते हैं मगर उनकी राष्ट्रीय स्तर पर उपस्थिति नहीं है इसीलिए आज भी उन्हें कांग्रेस जैसी पार्टी की जरूरत है, प्रत्येक गांव में एक कांग्रेसी है। 

गत रविवार को शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में कहा गया कि वैभवशाली पुरानी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति से परे धकेलने तथा यू.पी.ए. (यूनाइटिड प्रोग्रैसिव अलायंस यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) के समानांतर एक विपक्षी समूह बनाने से केवल भाजपा तथा ‘फासीवादी’ ताकतें ही मजबूत होंगी। यद्यपि ममता ने अपने हालिया दौरे के दौरान शिवसेना को लुभाने का प्रयास किया, शिवसेना अपनी सरकार नहीं गंवाना चाहती क्योंकि महाराष्ट्र में कांग्रेस इसकी गठबंधन सांझीदार है। 

राहुल 2004 से राजनीति में हैं लेकिन उन्हें अभी तक विपक्षी चेहरे के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया। राहुल गांधी के अखिलेश यादव जैसे दूसरी पीढ़ी के नेताओं को दोस्त बनाने के प्रयास सफल नहीं हुए। उन्हें अपनी छवि में कायाकल्प लाने की जरूरत है। 

चौथा तथा अधिक पेचीदा विकल्प उन सभी नेताओं को वापस बुलाने के लिए आवाज देना है जो कांग्रेस छोड़ चुके हैं। यह विचार बीच-बीच में उभरता रहा है। कांग्रेस कई सत्ताधारी पाॢटयों की अभिभावक रही है, जैसे कि राकांपा, तृणमूल कांग्रेस, वाई.एस.आर. कांग्रेस पार्टी। ऐसे सुझाव हैं कि एक ऐसी संयुक्त पार्टी एक सभापति मंडल तथा संयुक्त नेतृत्व के अंतर्गत कार्य कर सकती है। मगर अभिभावक पार्टी इस तरह के विचार को अपनाने में हिचक दिखा रही है। एक दुर्जेय संयुक्त कांग्रेस के मुकाबले एक विभाजित विपक्ष भाजपा के लिए एकमात्र लाभ है।-कल्याणी शंकर 
 


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